बलदेव सिंह देश के पहले रक्षामंत्री रहे।
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बलदेव सिंह का जिंदगीनामा
बलदेव सिंह पंजाब में रोपड़ जिले के रहने वाले थे और उनके पिता इंदर सिंह पहले सरकारी अधिकारी थे, फिर एमपी में कांट्रेक्टर बन गए और फिर जमशेदपुर चले गए, जो तब बिहार में था, अब झारखंड मे है। धीरे-धीरे वो स्टील किंग बन गए, उनका स्टील का बिजनेस काफी ऊंचाइयों पर पहुंच गया था।
इधर बलदेव सिंह पहले अम्बाला में पढ़े, फिर अमृतसर के खालसा कॉलेज में पढ़ने चले गए। उसके बाद उन्होंने अपने पिता की स्टील फर्म ज्वॉइन कर ली और डायरेक्टर के ओहदे तक पहुंच गए। तीस के दशक में वो पंजाब लौटे और धीरे धीरे पंजाब की राजनीति में हिस्सा लेना शुरू कर दिया।
चूंकि उनका परिवार अपने जिले में काफी समाजसेवा के कामों में लगा था, सिख समुदाय के बीच काफी लोकप्रिय था, सो फायदा बलदेव सिंह को मिला और वो पैंथिक पार्टी के बैनर तले 1937 में एक चुनाव जीत गए। फिर आया क्रिप्स मिशन, उससे बातचीत के लिए सिख समुदाय के कुछ लोगों को चुना जाना था। मास्टर तारा सिंह, सरदार जोगेन्द्र सिंह, सरदार उज्जवल सिंह के साथ सरदार बलदेव सिंह को भी इस कमेटी में चुन लिया गया।
जून 1942 में उनकी पार्टी और मुस्लिम लीग के बीच एक समझौता हुआ और पंजाब में लीग के सिकंदर हयात खान की अगुवाई में सरकार बनी, जिसमें सरदार बलदेव सिंह ने 26 जून 1942 को डेवलपमेंट मिनिस्टर पद की शपथ ली। सबसे दिलचस्प बात थी कि उसी साल अगस्त में गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन का ऐलान किया था और उनकी गिरफ्तारी हो गई थी, लेकिन उन दिनों सरदार बलदेव सिंह मुस्लिम लीग के साथ संयुक्त सरकार में मंत्री थे, और कांग्रेस के इस आंदोलन का विरोध सभी विरोधी पार्टियों ने किया था।
सिख नेता इसलिए नाराज थे, क्योंकि कांग्रेस उनकी मांगों को अपनी राष्ट्रीय मांगों में शामिल नहीं कर रही थी, हिंदू महासभा के सावरकर गांधी से इसलिए नाराज थे क्योंकि गांधीजी ने उनके प्रार्थना करने के बावजूद निजाम प्रशासन हैदराबाद में हिंदुओं को सरकारी नौकरी में आनुपातिक आरक्षण देने की मांग के आंदोलन को समर्थन नहीं दिया था। कम्युनिस्टों ने भी आंदोलन का विरोध किया था। ऐसे में सरदार बलदेव सिंह का विरोध उस दौर में कोई बड़ी बात नहीं थी।
पंडित जवाहर लाल नेहरू बलदेव सिंह को समझाने में कामयाब रहे।
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बलदेव सिंह, रक्षामंत्री का पद और नेहरू जी
फिर 1946 में आया केबिनेट मिशन, अब भारत की आजादी की घड़ियां धीरे-धीरे नजदीक आ रही थीं। कांग्रेस के नेताओं को जेल से छोड़ने की तैयारियां चल रही थीं। जो 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद से ही जेलों में बंद थे। ऐसे में कैबिनेट मिशन के समक्ष सिख समुदाय की मांगें रखने के लिए प्रतिनिधिमंडल में सरकार बलदेव सिंह को भी शामिल किया गया। वो लंदन भी गए। उन्होंने अलग से भी मिशन के लोगों से मुलाकात की, ताकि सिखों को सुरक्षा जैसे विषय पर बात कर सके।
कैबिनेट मिशन ने जब सिखों के लिए कोई स्पेशल प्रावधान नहीं किया तो सिख नेता भड़क उठे, और पैंथिंक प्रतिनिधि सभा बोर्ड ने जून 1946 में एक बड़ी सभा अमृतसर में बुलाकर केबिनेट मिशन की सिफारिशों को खारिज कर दिया।
ऐसे में बीच में कूदे पंड़ित जवाहर लाल नेहरू। सरदार बलदेव सिंह को समझाया बुझाया और आंदोलन वापस ले लिया गया। उसके बाद 2 सितम्बर 1946 को बनने वाली भारत की पहली अंतरिम सरकार में भी उनको नेहरू केबिनेट में बतौर सिख समुदाय के प्रतिनिधि, शामिल कर लिया गया।
वायसराय की एक्जीक्यूविट काउंसिल की जगह इस सरकार ने ले ली थी। इसमें बलदेव सिंह को डिफेंस पोर्टफोलियो मिला। उस वक्त कमांडर इन चीफ से लेकर सभी सेनाओं के चीफ अंग्रेज ही थे और उनके ऊपर आ गए थे बलदेव सिंह।
जब 3 जून 1947 को बंटवारे की योजना पर हस्ताक्षर हो गए तो वायसराय के बाद तीन ही लोगों ने रेडियों सम्बोधन दिया था, एक थे नेहरू, दूसरे थे जिन्ना और तीसरे सिख समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर सरदार बलदेव सिंह। ये जो अंतरिम सरकार बनी, पहले उसमें भी लीग शामिल थी, लेकिन बाद में वो निकल गई। सो ये जो सरकार बनी, वो आम लोगों के वोट से नहीं बनी थी। ऐसे में जब कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में आई तो उसने बाकी विचारधाराओं के लोगों को सरकार से बाहर कर दिया।
बंटवारे के हालात में बलदेव सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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सरदार बलदेव सिंह का जिक्र बंटवारे की आफत
आमतौर पर दिग्गज नेताओं की चर्चाओं के बीच सरदार बलदेव सिंह का जिक्र बंटवारे की आफत, आजाद देश के शुरूआती सिस्टम को खड़ा करना आदि में होता नहीं है, लेकिन सच ये था कि बंटवारे में दोनों देशों की सेनाओं और साजो-सामान को विभाजित करना, नया इनफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना, नई सैन्य व्यवस्था बनाना आदि में सरदार बलदेव सिंह की बड़ी भूमिका थी।
आजादी के बाद भी अंतरिम सरकार में उनको रक्षा मंत्री का प्रभार मिला था, एक तरफ वह सरदार पटेल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर कश्मीर में कबाइलियों के बहाने पाक घुसपैठ से उपजे संकट का मुकाबला कर रहे थे, दूसरी तरफ देश भर में फैले पाकिस्तान से आए सिख हिंदू शरणार्थियों के इंतजामों में सेना को भी लगाना था। उनके सर पर भी कम जिम्मेदारियां नहीं थी। लेकिन उनको श्रेय कम ही मिला।
हैदराबाद विलय के लिए पटेल के ऑपरेशन पोलो में भी उनकी बड़ी भूमिका रही। हालांकि जूनागढ़ विलय में भी उन्होंने काफी रणनीति बनाई थी, लेकिन वो थोड़ा आसान हो गया था। जब देश में पहली बार चुनाव हुए तो कांग्रेस की टिकट पर बिना अकालियों के विरोध के वह चुनाव तो लड़े, जीत भी गए, लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया। ये
समझना पड़ेगा कि अंतरिम सरकार आजादी के बाद कई दलों और समुदायों के प्रतिनिधियों से मिलाकर बनाई गई थी, उसमें जो लोग कांग्रेस नेता नहीं थे, वो भी शामिल किए थे, जैसे डॉ. अम्बेडकर, श्यामा प्रसाद मुख्रर्जी और सरदार बलदेव सिंह भी शामिल थे, जो किसी ना किसी वजह से बाद में सरकार में शामिल नहीं हुए।
हालांकि सरदार बलदेव सिंह 1957 के चुनावों में भी जीतकर लोकसभा के सदस्य बन गए थे, इस बार टिकट अकाली दल से मिला था।।लेकिन फिर उनकी तबियत खराब होती चली गई और 1961 में 29 जून को उनकी बीमारी से मृत्यु हो गई। उनका बेटा सरजीत सिंह प्रकाश सिंह बादल की सरकार में मंत्री था, जबकि भतीजा रवि इंदर सिंह पंजाब विधानसभा का विधानसभा अध्यक्ष रहा है।
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