सरकारी दफ्तर और उसमें काम करने वाले लोगों को लेकर अक्सर हमारे मन में एक धारणा होती है कि वहां 'कुछ' दिए बिना काम नहीं होगा।
- फोटो : Istock
उस कहानी को सुनकर मैंने दादी से पूछा था- इतना धन मिलने के बाद तो आपके पापा को काम करने की जरूरत ही नहीं रही होगी। उनकी कई पीढ़ियां तर गई होंगी?
और दादी ने मुस्कुराते हुए कहा था-
बिना मेहनत के मिलने वाले धन की गति भी तेज होती है। जब तक पिताजी रहे उन्होंने धन का सही जगह उपयोग किया और अपने पैर जमीन पर बनाए रखे। वो वैसा ही जीवन जीते रहे जैसा पहले जीते थे लेकिन जैसे ही पिता जी गुजरे, हमारे रिश्तेदारों ने उस पैसे को हथियाने के प्रपंच किए और आखिरकार वो पैसा हवा हो गया। जिन्होंने प्रपंच किए थे उनके पास भी नहीं टिका। दादी हमेशा कहतीं- बिना मेहनत का खाये तो कैसे पचाये?
कुछ महीने पहले उत्तरप्रदेश के इत्र कारोबारी पीयूष जैन की चर्चा देशभर में रही। बताया गया कि उनके घर की दीवारों व अन्य जगहों से 184 करोड़ कैश, 23 किलो सोना और अन्य सामान मिला। इतना धन देखकर जांच और रेड में शामिल अधिकारी भी सकते में थे। दीवारों से टपकती उन नोटों की गड्डियों को देखकर मुझे दादी का किस्सा याद आया।
अंतर यह था कि दादी के किस्से में धन छल कपट या किसी का अधिकार मार कर नहीं कमाया गया था। और उसका उपयोग समाज कार्यों में हुआ। और जब उस धन को गलत तरीके से हथियाया गया तो वह बचा ही नहीं। यही खास बात है। पीयूष जैन के मामले में सबसे बड़ी बात यह है कि उस धन का उपयोग पीयूष जैन खुद पर भी नहीं कर रहा था।
ये मामला फिलहाल कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत जारी है। प्रश्न यह उठता है कि पीयूष जैन जैसे लोग आखिर किस सीमा तक पैसों की हवस रखते हैं और उससे भी बड़ी बात यह कि क्या पहली-दूसरी बार ऐसे लोगों के गलत काम करते ही इन्हें अधिकृत तौर पर रोकने के लिए कोई नहीं होता?
भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, ऊपरी कमाई का लालच या रातों-रात अथाह सम्पत्ति खड़ी कर लेना सब इन्टरलॉक्ड हैं। ये एक ही लक्ष्य के अलग अलग शॉर्टकट्स हैं। वो रास्ता जिसकी मंजिल अंततः जेल या किसी न किसी सजा तक जाकर ही खत्म होती है। मुश्किल यह है कि यहां इन रास्तों पर चलने वालों के लिए अक्सर डामर और पैचेस का काम दूसरे करते हैं।
और इनमें घर-परिवार के या करीब के लोग भी शामिल होते हैं। गलत तरीके से कमाने वाला व्यक्ति अधिकांश मामलों में जिंदगी भर डर और झूठे ओवरकॉन्फिडेंस के साथ जीता है। डर पकड़े जाने का और झूठा ओवरकॉन्फिडेंस उस डर को छुपाने का। यही कारण था कि पीयूष जैन पुरानी बाइक पर ही चला करता था।
सरकारी दफ्तर और उसमें काम करने वाले लोगों को लेकर अक्सर हमारे मन में एक धारणा होती है कि वहां 'कुछ' दिए बिना काम नहीं होगा। जो व्यवस्था बनी हुई है सालों से वो ऐसी ही तस्वीर पेश करती है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा कि इस व्यवस्था को बढ़ावा कौन देता है? हम खुद।
जब हम जल्दी जाने के चक्कर में सिग्नल पर खड़े सिपाही के हाथ में 50 (या आज के समय मे 100, ज्यादातर यही रेट है) का नोट पकड़ाते हैं तो, लाइन में लगकर दर्शन करने की बजाय किसी भी तरह 'जुगाड़' करके वीआईपी दर्शन करते हैं तो, आप अपना काम पहले और थोड़े हेर-फेर के साथ करने के लिए फाइल पर वजन रखते हैं तो...इन सारे 'तो' के साथ जुड़ा है भ्रष्टाचार। बस इसी 'तो' पर विराम लगाने की जरूरत है जो एक झटके में नहीं होगा। भ्रष्टाचार अब हमारे देश में नमक के जैसा हो गया है। लोग इसका स्वादानुसार उपयोग करते हैं। कुछ कम खाते हैं तो कुछ ऊपर से एक्स्ट्रा डालकर।
इसलिए अगर इस पर लगाम लगाना है तो कड़े कानूनों के साथ आम जनता की नीयत को भी सुधरना होगा, ताकि टेबल के नीचे से या फाइल के ऊपर वजन रखने के लिए कहने को किसी की हिम्मत ही न पड़े। अगर भगवंत मान इस समस्या को नकेल डाल साध लेते हैं तो एक अच्छी शुरुआत तो होगी ही।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।