गांवों में लगातार मौतों का बढ़ता आंकड़ा बेहद डराता है
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गांवों में मौतों के आंकड़े बेहद भयावह
भला कौन इंकार कर सकता है कि देश के कोने-कोने से गांवों में अचानक हो रही मौतों के आंकड़े बेहद भयावह हैं। यह असाधारण हैं। इन्हें सहजता से लिया जाना अगले खतरे को न्यौता देना जैसा है। जबकि हम अभी से कोरोना की तीसरी लहर को लेकर कुछ ज्यादा ही डरे हैं या ऐसा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि निपटने को तैयार हैं? यह तो पता नहीं, पता बस इतना है कि गांव के गांव और वहां के सीधे, साधे ग्रामीण अभी भी कोविड से लक्षणों को सिवाय सर्दी, जुकाम, बुखार से ज्यादा कुछ ना समझ नीम हकीमों से इलाज को मजबूर हैं।
गांवों की भयावह तस्वीरें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम, मणिपुर, तमिलनाडु जैसे राज्यों सहित लगभग पूरे देश से आ रही हैं। गांवों में कोरोना जिस तरह से पैर पसार रहा है बावजूद इसके अनदेखी करना बेहद चिंताजनक है।
गांवों में लगातार मौतों का बढ़ता आंकड़ा बेहद डराता है। ऑक्सीजन और डॉक्टरों की कमी, तो मरीजों की देखरेख में लापरवाही, अधिक बिलिंग को लेकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, गुजरात सहित देश को हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने सख्त चेतावनी दी है। लेकिन संसाधन हो तभी, तो कुछ नतीजा निकले।
बहरहाल, गांवों में हो रही ताबड़तोड़ मौतों को कोविड की श्रेणी में रखना या ना रखना, उन पर क्लीन चिट देना अलग विषय हो सकता है। लेकिन जिस गांव के इतिहास में कभी लगातार इतनी मौतें ना हुई हों, वहां पर मौतों की बढ़ती फेहरिस्त को नजर अंदाज करना और जांच तक नहीं करना ही क्या कोरोना से जंग जीतना है?
भले ही आंकड़ों में कोरोना रोज कम होते जाएं, स्वस्थ होने वालों का आंकड़ा बढ़ता जाए, यह अच्छा है सुकून की बात है। लेकिन हकीकत से मुंह मोड़ा जाए यह समझ से परे है। लगता नहीं कि यह कुछ उसी तरह है जैसा कि पहली लहर के बाद हुआ?
गांवों की बेहाली किसी से छुपी नहीं
जहां शहरों की बदहाली की तस्वीरें खूब दिखीं वहीं गांवों की बेहाली किसी से छुपी नहीं। शहर और गांव का फर्क इस बार संक्रमण ने नहीं किया। दोनों तस्वीरें एक सी है। शहरों में ऑक्सीजन का टोटा, वेन्टीलेटर की कमीं, आईसीयू बेड, जीवन रक्षक इंजेक्शन ना होने का रोना तो है। वहीं गांव में बीमार अस्पताल और बदबू मारते कमरे, स्टाफ और डॉक्टर की कमीं, रोज नहीं आना, दवाओं का टोटा। मतलब गांवों में ऑक्सीजन तो बहुत दूर की बात सर्दी, बुखार की गोली तक नहीं मिलती। यानी सब कुछ ठनठन गोपाल।
ग्रामीण मरता क्या न करता। कुछ अंधविश्वास के सहारे तो कुछ झोलाछापों से पेड़ों के नीचे बोतल लगवाते तो कहीं पीपल के पेड़ के नीचे चारपाई डाल और कहीं पेड़ पर ही बैठकर लोग प्राण वायु लेते दिखे। कहीं झाड़-फूंक का मनोविज्ञान, तो कहीं देशी कोशिशों के बाद भी तड़पती मौतों का ताण्डव सबने देखा, देख रहे हैं। उसके बाद लकड़ी की कमीं ऊपर से सरकारी अनदेखी। हारे थके ग्रामीण के पास अंततः किसी बड़ी नदी में शव बहाकर मोक्ष की कामना के अलावा शायद कुछ नहीं रह जाता? तमाम पंच, सरपंच भले ही कोविड जैसे लक्षणों से हुई मौतों के हिसाब-किताब की सूची मीडिया को दिखाते फिरें, लेकिन सरकारी आंकड़ों में इन्हें वह जगह कहां?
स्व. डॉ. अग्रवाल के एक-एक शब्द के बहुत गहरे मायने हैं। बेहद कम और संतुलित शब्दों में जैसे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना दिखा दिया।
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स्व. डॉ. अग्रवाल के एक-एक शब्द के बहुत गहरे मायने हैं.
आइए फिर बात करते हैं जो शुरू में अधूरी रह गई थी। पिक्चर अभी बाकी है, द शो मस्ट गो ऑन....! स्व. डॉ. केके अग्रवाल ने कम शब्दों में बड़ी बात कही है। "मैं केके अग्रवाल नहीं, मैं मेडिकल प्रोफेशन में हूं। हमारा जॉब है जुगाड़ू ओपीडी बनाना। मतलब आप 100-100 पेशेंट बुलाना, जिनमें एक तरह के लक्षण हों। उन्हें 15 मिनट में कंसल्टेशन देकर भेज दीजिए। इसी तरह माइल्ड और दूसरे केसेज को इकट्ठा बुलाइए, लेकिन अब वन-वन कंसल्टेशन का समय चला गया है।”
स्व. डॉ. अग्रवाल के एक-एक शब्द के बहुत गहरे मायने हैं। बेहद कम और संतुलित शब्दों में जैसे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था का आईना दिखा दिया। यह बेहद चिंतनीय है, लेकिन सौ फीसदी सच है। जाते-जाते उन्होंने जुगाड़ ओपीडी कहकर स्वास्थ्य सुविधाओं की हकीकत भी कह दी। हो सकता है कि उन्हें कोविड की भयावहता की चपेट में आने से अपनी मौत का अहसास भी हो।
डॉ. अग्रवाल ने मरकर भी उन्होंने व्यवस्था की बेबाक और दो टूक सोचनीय स्थिति कहकर अपना बहुत बड़ा फर्ज निभाया। ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहते हुए भी जिस पीड़ा को बयां किया, काश वह हमारे जनप्रतिनिधि समझ पाते...?
खुश न हों कि संक्रमण घट रहे हैं, मौतों के रिकॉर्ड आंकड़े भी तो बढ़ रहे हैं। अभी भी नींद से जाग जाएं, क्योंकि इसी दर्द में डूबे हुए भारतीय चिकित्सक संघ के पूर्व अध्यक्ष, हार्ट केयर फाउंडेशन के पूर्व प्रमुख, 2005 में चिकित्सा क्षेत्र के क्षेत्र के बेहद प्रतिष्ठित बीसी रॉय पुरस्कार से सम्मानित, इसी वर्ष हिंदी सम्मान के अलावा डॉक्टर डीएस मुंगेकर नेशनल आईएमए अवॉर्ड, नेशनल साइंस कम्युनिकेशन अवॉर्ड, फिक्की हेल्थकेयर पर्सनालिटी ऑफ द ईयर अवॉर्ड और राजीव गांधी एक्सीलेंस अवॉर्ड से सम्मानित होने के बाद वर्ष 2010 में भारत सरकार की ओर से पद्मश्री से सम्मानित और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी नाम दर्ज करा चुके पद्म श्री स्व. डॉ. केके अग्रवाल ने कोरोना से ग्रसित होने के बाद ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहते हुए भी मरीजों की सेवा की और जब उन्हें लगने लगा कि स्थिति ठीक नहीं है, तो जाते-जाते चंद शब्दों में बहुत बड़ी बात कह दी पिक्चर अभी बाकी है, द शो मस्ट गो ऑन....! अभी भी वक्त है काश समझने वाले समझ पाते!