कोरोना संकट की इस घड़ी में केंद्र व राज्य सरकार इस महामारी से छुटकारा पाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं।
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गांव में स्थिति बहुत खराब मानी जा रही है।
भारत गांवों का देश है। चिकित्सा की दृष्टि से आज भी गांव में स्थिति बहुत खराब मानी जा रही है। इस समय कोरोना का सबसे अधिक प्रसार- प्रभाव गांव में हो रहा है। जहां ना तो कोरोना की जांच की कोई सही व्यवस्था है। ना ही उपचार के कोई साधन है। सरकार का पूरा ध्यान शहरों की तरफ रहने से वहां की छोटी घटना को भी मीडिया में प्रमुखता से स्थान मिलता है। जबकि गांव में बड़ी से बड़ी घटना घट जाए तो भी मीडिया का ध्यान नहीं जाता है।
कोरोना से सबसे अधिक मौतें भी ग्रामीण क्षेत्रों में हो रही है। मगर उनमें से अधिकांश को तो प्रशासन कोरोना से मौत होना स्वीकार ही नहीं कर रहा है। चिकित्सा विभाग द्वारा उनको सामान्य मौत बताकर उनका अंतिम संस्कार करवा दिया जाता है।
राजस्थान के झुंझुनू जिले के सूरजगढ़ उपखंड के एक छोटे से गांव श्यालू में एक ही दिन में 89 कोरोना संक्रमित मरीज मिलते हैं। जिसके वास्तविक कारणों को जानने की किसी को फुर्सत नहीं है। सीकर जिले के खीरवा गांव में 26 लोगों की मौत हो जाती है। मगर वहां भी प्रशासन बीमारी को आगे और अधिक फैलने से रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठा पाया हैं।
सरपंच राशिदा बानो कहती है कि गांव में जिला कलेक्टर अविचल चतुर्वेदी सिर्फ आश्वासन देकर चले गए किया कुछ नहीं। खाटू गांव में श्याम बाबा मेले के दौरान लाखों लोगों की भीड़ जुटी थी। मेले के दौरान 23 मार्च को वहां पहला पाॅजिटिव केस मिला था। उसके बाद से अब तक 244 लोग पाॅजिटिव आ चुके हैं। यहां पांच लागों की मौत होने से गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है।
कोरोना से सबसे अधिक मौतें भी ग्रामीण क्षेत्रों में हो रही है।
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ग्रामीण आबादी कोरोना वैक्सीन लगवाने से वंचित
देश के अधिकांश गांवों में बीमारी से उपचार के लिए छोटे चिकित्सालय हैं। जहां एक डॉक्टर, कंपाउंडर या नर्स तैनात है। मगर उनके पास समुचित साधन व दवाइयों का अभाव रहता हैं। जिस कारण वो गांव वालों का समुचित उपचार नहीं कर पाते हैं। यदि गांव के सभी प्राथमिक व सामुदायिक चिकित्सालय केंद्रों पर कोरोना उपचार की व्यवस्था करवा दी जाए तथा ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध करवा दिया जाए तो बहुत से कोरोना मरीजों का गांव में ही उपचार हो जाएगा। जिससे शहरों पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ेगा। मगर ना जाने क्यों सरकार ऐसा नहीं कर पा रही है।
कोरोना वैक्सीन लगाने में भी गांव की बजाय शहरों को प्राथमिकता दी जा रही है। जिससे बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी कोरोना वैक्सीन लगवाने से वंचित है। सरकार को ऐसा ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि आबादी के अनुपात में कोरोना वैक्सीन का वितरण हो। जिससे सभी क्षेत्रों में समान रूप से कोरोना की वैक्सीन पहुंच सके।
देश में एम्स जैसे बड़े चिकित्सा संस्थान, मेडिकल कॉलेज, बड़े चिकित्सा रिसर्च केंद्रों की संख्या बहुत कम है। जो है वहां भी मरीजों का दबाव इतना अधिक रहता है कि और अधिक मरीजों को भर्ती करने की स्थिति में नहीं रहते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को हर जिले में बड़े चिकित्सा संस्थान भी बनवाने चाहिए ताकि लोगों को अपने जिले में ही समुचित उपचार मिल सके। लोगों को उपचार के लिये महानगरों की तरफ नहीं जाना पड़े।
अभी भी समय है सरकार को जिला, उपखंड व तहसील स्तरीय स्वास्थ्य केंद्रों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध करवाने चाहिये। प्रदेशों में जहां भी मेडिकल कॉलेज स्वीकृत है उनका निर्माण कार्य तुरंत प्रारम्भ करवाना चाहिए। केंद्र व राज्य सरकारें अपने पिछले बजट में शामिल विकास योजनाओं में कटौती कर स्वास्थ्य संबंधित योजनाओं पर ही अधिकांश पैसा खर्च करें ताकि आने वाले समय में देश इससे भी बड़ी महामारी का मुकाबला करने में खुद को सक्षम बना पाए।
लोगों को भी अपने नेताओं से पुल, सड़क, भवन बनवाने के स्थान पर सबसे पहले अस्पताल बनवाने की मांग करनी होगी। तभी आये दिन विभिन्न प्रकार की बिमारियों से होने वाली अकाल मौतों को रोका जा सकेगा। सरकार को भी अपने विकास का ऐजेंडा बदल कर उसमें स्वास्थ्य को सबसे उपर रखना होगा।
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