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मजदूर संकट: क्या राज्यों ने नहीं समझी अपनी जिम्मेदारी? आखिर कितनी है केंद्र की जवाबदेही?

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40 दिनों से ऊपर के लॉकडाउन में राज्य मजदूरों की व्यवस्था करने में विफल रहे हैंं। - फोटो : ANI
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महाबंदी के तीसरा दौर खत्म हो चुका है। राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से जान और जहान – दोनों को बचाने पर फोकस किया, उससे स्पष्ट रहा की महाबंदी का चौथा चरण उस तरह से लागू नहीं हुुुुआ, जैसे पिछले तीन चरण लागू हुए हैं।

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जाहिर है केंंद्र नेे राज्यों को अपने-अपने हिसाब से चीजों को खोलने और बंद करने का अधिकार दे दिया। दिल्ली में बहुत सी चीजें पटरी पर लौटी हैं जबकि वहीं कुछ जगह तालाबंदी है। 

बहरहाल, लॉकडाउन-4 तक आते-आते यह बात तो स्पष्ट है कि मजदूर रुकते और अपने काम पर जाने के अवसर का इंतजार करते। लेकिन राज्य सरकारों और उनके अधीन आने वाले प्रशासन ने जैसा रवैया इन मजदूरों के लिए अख्तियार किया है, उससे उन्हें कम से कम फिलहाल सरकारी तंत्र पर भरोसा नहीं रह गया है।
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यकीनन उन्हें गांव की उस टूटी खपरैल या झोपड़ी में ही उम्मीद नजर आने लगी है, जिसे छोड़कर सिर्फ पेट पालने और तन ढंकने के लिए वे हजारों किलोमीटर दूर पहुंच गए।

श्रमिक रेल चल रही है, लेकिन सड़कों पर मजदूरों का हुजूम अब भी पैदल ही हजारों किलोमीटर की यात्रा करने को मजबूर है। मजदूरों की इस हालत ने साबित किया है कि औद्योगीकृत राज्य अपनी जिम्मेदारी निभाने और खुद के प्रति भरोसा बनाए रखने में नाकाम साबित हुए हैं।

24 मार्च को महाबंदी की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने मजदूरों के नियोक्ताओं और मकान मालिकों से अपील की थी कि बंदी के दौरान वे ना सिर्फ मजदूरों को उनकी तनख्वाह तो दे हीं, मकान मालिक किराया भी ना लें।

प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मजदूरों से अपील की कि वे दिल्ली ना छोड़ें और उन्हें उनके घरों पर ही खाना मुहैया कराया जाएगा।

उन्होंने मकान मालिकों से भी अपील की कि वे दो-एक महीने किराया ना लें। सांस्कृतिक परंपराओं वाले भारत में ऐसे सदिच्छु हर जगह नहीं हैं।

अब हालत यह है कि मजदूरों से मकान मालिक किराया मांगने लगे हैं और ना देने की स्थिति में घर खाली कराने की धमकी देने लगे हैं। इसी तरह कुछ नियोक्ताओं ने एक महीने तो तनख्वाह दे दी, लेकिन दूसरे महीने का वेतन देने से इनकार करने लगे हैं।

राज्य सरकारें मजदूरों की इस स्थिति के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। - फोटो : अमर उजाला।

केजरीवाल जैसी राज्य सरकारें दावा तो कर रही हैं कि 72 लाख लोगों को वह राशन मुहैया करा चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर जब 72 लाख लोगों को राशन दे ही दिया गया तो फिर अपनी और अपने मासूमों की जान की कीमत पर मजदूर पैदल ही घरों को लौटने को मजबूर क्यों हैं?

यह सवाल केजरीवाल ही नहीं, हर उस राज्य सरकार को खुद से पूछना चाहिए, जहां औद्योगीकरण हो चुका है और जिनकी आर्थिक गाड़ी के महत्वपूर्ण पहिए ये मजदूर ही रहे हैं। 

भारतीय संविधान में श्रम कल्याण को समवर्ती सूची में रखा गया है। इसका मतलब यह हुआ कि इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने हिसाब से कानून बना सकती हैं और उन्हें लागू कर सकती हैं।

विवाद की स्थिति में संसद द्वारा बनाया गया केंद्रीय कानून ही मान्य होगा। दुर्भाग्यवश मजदूरों के मामले में हर औद्योगीकृत राज्यों की सरकारें नाकाम साबित हुई हैं। वे मजदूरों को उनके घरों पर राशन नहीं मुहैया करा पाईं, उनके मकान मालिकों पर दबाव नहीं बना पाईं कि वे किराया ना लें और इस वजह से वे खुद के प्रति उन मजदूरों में भरोसा नहीं जता पाईं। 

दरअसल, भारत में एक चलन बार-बार दिखता है। जब भी राज्यों की बदहाल व्यवस्था को केंद्र सरकार की तरफ से सुधारने की कोशिश होती है, हर राज्य संघवाद के सिद्धांत का हवाला देने लगता है।

यह प्रवृत्ति खासतौर पर उन राज्यों में जहां दिखती हैं, जहां केद्र सरकार के विपक्षी दल की सरकार होती है। लेकिन जब हालात बिगड़ने लगते हैं तो वही सरकार अपने राज्य प्रशासनिक तंत्र की बजाय केंद्रीय मशीनरी की सहायता हासिल करने के लिए संघवाद के ही नाम पर दुहाई देने लगते हैं।

महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सरकारें इसका उदाहरण हैं। वहां जब कोरोना और मजदूरों के मामले बढ़ने लगे तो वे केंद्रीय सहयोग की रट लगाने लगीं। 

भारत में शासन-प्रशासन का जो त्रिस्तरीय ढांचा है, वह भले ही लोकतंत्र के लिहाज से अच्छा हो, कई बार प्रशासनिक लिहाज से बहुत खराब होता है। अगर एक मत की केंद्र और राज्यों में सरकारें ना हों और स्थानीय स्वशासन की इकाई में विपक्षी दल का बहुमत हो तो हर स्तर पर अड़ंगेबाजी होती है।

दुर्भाग्यवश मजदूरों के मामलों में भी ऐसा ही दिख रहा है। राज्य सरकारें मजदूरों की इस स्थिति के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। लेकिन अपनी ओर से उनकी तरफ से मजदूरों की स्थिति सुधारने या बेहतर बनाने की कोई गंभीर कोशिश नहीं दिख रही है।

क्षेत्रीय दलों से शासित राज्य पश्चिम बंगाल हो, या तेलंगाना या आंध्र या फिर कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र या पंजाब या भाजपा शासित कर्नाटक, सब जगह से मजदूर भाग रहे हैं।

देश की राजनीति बदलने वाली दिल्ली की केजरीवाल सरकार पर तो आरोप ही है कि एक तरफ उसने प्रत्यक्ष रूप से मजदूरों के हितों की बात की तो परोक्ष रूप से उसके कार्यकर्ताओं ने मजदूरों के बीच अफवाह फैलाई कि उत्तर प्रदेश से बसें जा रहीं और वे दिल्ली सीमा से बाहर निकलकर उत्तर प्रदेश पहुंचें।

राजनीतिक दलों को कवर करने वाले लोग जानते हैं कि उनके नेताओं का दो रूप होता है। एक तो वे कैमरे के सामने ऑन रिकॉर्ड खूब अच्छी-अच्छी बातें करते हैं। लेकिन ऑफ द रिकॉर्ड वही नेता अपनी और अपनी पार्टी की सारी गंदगी निकाल बाहर करता है।

राजनीतिक दलों का शुरू से यह रवैया रहा है कि किसी समस्या के समाधान के प्रति वे ऑन द रिकॉर्ड जो रवैया दिखाते हैं, ऑफ द रिकॉर्ड या हकीकत में उससे उलट विचार रखते हैं।

सोशल मीडिया के दौर में चूंकि ज्यादातर लोग अपने-अपने वैचारिक चश्मे से लैस हैं, लिहाजा वे किसी भी समस्या को संपूर्णता में देखने की कोशिश नहीं करते।

लिहाजा मजदूरों की समस्याओं के लिए वे उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों को भी जिम्मेदार ठहरा देते हैं। लेकिन दोनों राज्यों का दुर्भाग्य रहा है कि उन्नीसवीं सदी से वे लगातार मजदूरों के निर्यातक राज्य ही रहे हैं।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में फिजी, गुयाना, त्रिनिडाड, मारीशस जैसी जगहों पर एग्रीमेंट के तहत जो मजदूर ले जाए गए, उनमें से ज्यादातर इन्हीं दोनों राज्यों के थे। इसी एग्रीमेंट शब्द का भोजपुरीकरण गिरमिट हुआ और उसके तहत गए मजदूरों को गिरमिटिया मजदूर कहा गया।
 

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राज्य शासन और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं निभा पाया। - फोटो : अमर उजाला।

आजादी के बाद उम्मीद थी कि इन राज्यों की किस्मत बदलेगी और कम से कम ये राज्य मजदूरों के निर्यातक नहीं रहेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दुर्भाग्य देखिए कि मोरारजी देसाई, पीवी नरसिंह राव, देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल को छोड़ दें तो देश की राजनीति के सर्वोच्च प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने वाले राजनेता उत्तर प्रदेश से ही रहे।

लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि इतना होने के बावजूद अब तक दोनों ही राज्य मजदूरों के सिर्फ निर्यातक बने हुए हैं। इन दोनों राज्यों का संकट यह है कि अगर इनके समूचे प्रवासी घरों को लौट आएं तो भी चाहकर ये दोनों ही राज्य अपनी भारी जनसंख्या के चलते सबको शायद ही काम मुहैया करा पाएं। हां, खाद्य सुरक्षा कानून से मिली सुविधा के चलते राशन जरूर उपलब्ध करा सकते हैं।

उल्टा पलायन ने देहाती इलाकों में कोरोना संक्रमण के खतरे को भी बढ़ाया है। इसे ही रोकने को लेकर अचानक महाबंदी की घोषणा की गई थी। केंद्र सरकार ने मान लिया कि उसकी अपीलों का असर होगा। वह भूल गई कि जिस देश की नस-नस में राजनीति घुस गई है, जिसे सोशल मीडिया के दौर ने और बढ़ा दिया है, वहां आम लोगों की जिंदगी की कीमत पर राजनीति नहीं होगी। राज्य सरकारों की नाकामी कई बार अनचाही लग रही है तो कई बार जानबूझकर ओढी गई लग रही है। 

राजनीतिक दलों के साथ ही मजदूरों का पलायन नौकरशाही की भी नाकामी है। भारतीय नौकरशाही की वह दिक्कत एक बार फिर सामने आई है कि वह सही मायने में कल्पनाशील नहीं है। वह हकीकत से दूर की कल्पना करती है।

वह यह समझने में नाकाम रही कि उसकी बनाई नीतियों और किए गए वायदों पर मजदूर भरोसा नहीं भी कर सकते हैं। वह मजदूरों को जमीनी स्तर पर राहत देने में भी विफल रही। यह उसकी भी जिम्मेदारी थी कि वह जमीनी स्तर पर मजदूरों को सहयोग कर सके। सीमा पार करने देने में राज्यों के प्रशासन द्वारा लगाई जा रही रोक का कोई मतलब नहीं रहा है।

आखिर जिनके मकान मालिकों ने घर खाली करा लिए हैं, जिनके पास खाने तक के इंतजाम नहीं हैं, आखिर वे किस भरोसे और किस छत्र के नीचे रह पाएंगे। ऐसे में प्रशासनिक तंत्र को समन्वित नीति बनाकर सहयोगी रूख रखना चाहिए था।

लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा हो रहा है। इससे मजदूरों में जो निराशा और क्षोभ बढ़ रहा है, निश्चित तौर पर उसके लिए वे अफसरों या प्रशासनिक तंत्र की बजाय राजनीति को जिम्मेदार मानेंगे। नौकरशाही की सोच की सीमाएं बार-बार उजागर हुई हैं।

श्रमिक ट्रेनें तो नौकरशाही ने चला दी, लेकिन संबंधित स्टेशन जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करना वह भूल गई। इसी तरह अपने गंतव्य पहुंचे लोगों को स्टेशन से घर पहुंचाने के लिए भी नौकरशाही ने माकूल इंतजाम करने की नहीं सोची।

नौकरशाही की सोच की इस सीमा ने जाहिर किया है कि उसे कल्पनाशीलता के स्तर पर काफी काम करना होगा। कोरोना काल के मजदूर संकट का एक सबक यह भी है कि जवाबदेह नौकरशाही की दिशा में भी आगे बढ़ा जाय। 

इस पूरी समस्या में राजनीतिक दलों की नाकामी एक और मोर्चे पर साबित हुई है। माना कि केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी की सरकार मजदूरों को रोकने में नाकाम हुई है। लेकिन दूसरे राजनीतिक दल भी इनकी सहायता के लिए सड़कों पर सहयोग लेकर खड़े नजर नहीं आए।

राजनीतिक दलों के आकाओं का एकमात्र काम यह रह गया है कि वे ट्वीटर पर अपने ज्ञान और दर्द की चाशनी अपनी प्रतिक्रियाओं के रूप में बांटते रहें।

राजनीतिक दल यह भूल गए हैं कि जो मजदूर उनकी सरकारों और उनकी कथित कल्याण योजनाओं पर भरोसा नहीं कर पा रहा है, वह ट्वीटर नहीं देखता और पढ़ता। वह ट्वीटर से अपने विचार और अपनी अवधारणा नहीं बनाता।

कबीर जिस तरह कहते हैं, मैं कहता आंखिन देखी, कुछ उसी तरह मजदूर अपने अनुभवों से अपनी अवधारणा विकसित करता है और अपनी राय बनाता है। इसलिए राजनीतिक दलों को अब चेत जाना चाहिए। सरकार और भाजपा अगर नाकाम रही है तो मजदूर यह भी जानता है कि उसके आंसू पोंछने का दावा करने वाले विपक्षी दल भी सिर्फ हवाबाजी कर रहे हैं। 

आने वाले दिनों में जब शहरों या औद्योगिक केंद्रों में काम शुरू होगा, तब वही औद्योगीकृत राज्य इन मजदूरों की तलाश करेंगे, जिनका गाढ़े वक्त में उन्होंने ध्यान नहीं रखा। तब उन्हें बिहार और उत्तर प्रदेश की गलियों की ओर रूख करना होगा, ताकि उनके धंधे को आगे बढ़ाने के लिए कुशल, परिश्रमी और जवाबदेह हाथ मिल सकें।

जब दिल्ली, महाराष्ट्र या कर्नाटक के खजाने में औद्योगिक उत्पादन के जरिए पर्याप्त रकम नहीं आएगी, तब उन्हें आज के दिन मजबूर दिख रहे मजदूरों की ही याद आएगी। याद तो उन मकान मालिकों को भी इनकी आएगी, जब उनके मकान खाली पड़े होंगे। डर इस बात का है कि तब तक कहीं देर ना हो जाए।

देश में मजदूरों की हालत सुधारने के लिए अव्वल तो होना यह चाहिए कि केंद्रीयकृत राशन कार्ड बने। ताकि वे जहां भी रहें, वहीं उन्हें राशन मिल सके। इसके लिए उन्हें अपने राज्यों की ओर मुंह ना देखना पड़े।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद एक के खंड एक में भारत के हर व्यक्ति को देश का नागरिक बताया गया है। लेकिन मजदूरों की समस्या देखकर लगा कि हर कोई अपने राज्य का नागरिक है, वह बाकी जगह प्रवासी है। दूसरे राज्यों में वह व्यक्ति भारत का नागरिक कम, बाहरी ज्यादा है।

आने वाले दिनों में इस दिशा में भी सोचा जाना होगा कि किस तरह पूरे देश में भारत के नागरिक को एक जैसा सम्मान मिल सके। अब औद्योगिक इकाइयों को भी प्रेरित किया जाना चाहिए कि आने वाले दिनों में अपने यहां काम करने वाले लोगों की काम की जगह के नजदीक ही अपने संरक्षण में रिहायश का इंतजाम करें। यदि ऐसा होगा तो भावी दुर्भाग्य के दिनों में मजदूरों को कम से कम ऐसे अमानवीय हालात में अपने घरों को इस तरह वापस ना लौटना पड़ेगा। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

 

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