सड़क हादसों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
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उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक सड़क हादसे में बिहार के 6 मजदूरों की मौत हो गई थी। यह सभी मजदूर बिहार के गोपालगंज, आरा और पटना के रहने वाले थे तथा हरियाणा से पैदल ही चल कर अपने घरों को लौट रहे थे। जिन्हें एक तेज रफ्तार बस ने रौंद दिया था।
मध्य प्रदेश के गुना जिले में एक सड़क हादसे में 8 मजदूरों की जान चली गई थी। वहां पर मजदूरों से भरे एक ट्रक की एक खाली बस से टक्कर होने से मौके पर ही 8 मजदूरों की मौत हो गई थी। गुड़गांव के कुंडली मानेसर पलवल हाई वे के पास एक कंटेनर की चपेट में आकर 5 मजदूरों की मौत हो गई।
तेलंगाना में सड़क पर चल रहे 8 मजदूर एक सड़क हादसे में मारे गए। लखनऊ के शहीद पथ पर साइकिल से छत्तीसगढ़ लौट रहा एक परिवार हादसे का शिकार हो गया। इस हादसे में पति-पत्नी की मौत हो गई लेकिन उनके दो बच्चे बच गए। साधन नहीं मिलने के कारण 4 लोगों का यह परिवार साइकिल से अपने गांव जा रहा था।
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर के पास ट्रक पलटने से 5 मजदूरों की मौत हो गई। यह लोग हैदराबाद से उत्तर प्रदेश जा रहे थे। बिहार के समस्तीपुर जिले में बस और ट्रक की टक्कर में दो मजदूरों की मौत हो गई थी। यह सभी मजदूर मुंबई से स्पेशल ट्रेन से मुजफ्फरपुर स्टेशन उतरे थे और वहां से अपने गृह जिला कटिहार और बेगूसराय जा रहे।
आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में मजदूरों को ले जा रहा एक ट्रैक्टर हाईटेंशन बिजली पोल के चपेट में आ गया, इस हादसे में 9 मजदूरों की मौत हो गई। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से पैदल ही अपने गांव लौट रहे मजदूरों को रोडवेज बस ने रोंद दिया जिसमें 6 मजदूरों की मौत हो गई। यह सभी मजदूर पंजाब में काम कर रहे थे और तालाबंदी की वजह से अपने घर गोपालगंज बिहार जा रहे थे।
देश में तालाबंदी के बाद हर गुजरते दिन के साथ ही सड़क हादसों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 25 मार्च से 16 मई तक देश में करीबन 2000 सड़क हादसे हुए हैं। जिनमें 368 लोगों की मौत हुई है। उन 368 में से 139 तो सिर्फ प्रवासी मजदूर थे जो तालाबंदी की वजह से परेशान होकर अपने घरों को वापस जाने के लिये सड़कों पर चल रहे थे।
तालाबंदी से सबसे अधिक प्रभावित देश का मजदूर वर्ग हुआ है।
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देखे तो देश में मजदूर वर्ग आज सबसे अधिक मजबूर हालात में है। तालाबंदी से सबसे अधिक प्रभावित देश का मजदूर वर्ग ही हुआ है। काम धंधे बंद हो जाने के कारण उनके सामने रहने व खाने की समस्या उत्पन्न होने के चलते अधिकतर मजदूरों ने परेशानी में अपने घर लौटना ही बेहतर समझा।
हालांकि तालाबंदी की घोषणा करते वक्त सरकार ने कहा था कि जो व्यक्ति जिस स्थान पर है वहीं रहे। सरकार द्धारा उसके रहने खाने की समुचित व्यवस्था की जाएगी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। हालात खराब होने पर मजदूरों को जो भी साधन मिला उसी से वे अपने घरों की तरफ लौटने लगे। सड़क पर रात दिन पैदल चलने से उनके साथ लगातार हादसे हो रहे हैं जिसमें उनको जान से भी हाथ धोना पड़ रहा है।
सरकार लगातार कह रही है कि हम सभी मजदूरों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाएंगे। कोई भी मजदूर पैदल यात्रा न करें। लेकिन 50 दिनों तक सरकार के हाथ पर हाथ धरे रहने से मजदूरों के धैर्य का बांध टूट गया और उनको अब सरकार की बात पर विश्वास नहीं हो रहा है। इसलिए अपनी जान बचाने के लिए वह पैदल ही अपने घरों की तरफ लौट रहे हैं।
तालाबंदी के समय सरकार ने मजदूरों को जाने से तो रोक तो लिया था मगर उनके रहने, खाने के समुचित उपाय नहीं कर पाई। मजदूरों के रहने के लिए सरकार द्धारा बनाए गए राहत केंद्रों की हालत बहुत खराब थी। मजदूरों को समय पर भोजन तक नहीं मिल पा रहा था। ऐसे में मजबूरन मजदूरों को भयंकर गर्मी के मौसम में भी अपने परिवार सहित पैदल ही सड़कों पर चलने को मजबूर होना पड़ रहा है।
देश की सड़कों पर भूखे, प्यासे चल रहे मजदूरों की मदद करने के लिए देश का कोई भी राजनीतिक दल आगे नहीं आया। सभी राजनीति दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं। इसे हम केंद्र व राज्य सरकारों की नाकामी ही कह सकते हैं कि देश का जो मजदूर वर्ग रात दिन मेहनत कर देश के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।
उन्हीं मजदूरों को आज सड़कों पर तपती धूप में पैदल ही घर जाने को मजबूर होना पड़ रहा है। देश के नीति निर्माताओं के मन में यदि जरा भी संवेदनाएं बाकी है तो उन्हें इस बात का अहसास होना चाहिए व जितनी जल्दी हो सके सभी मजदूरों को सुरक्षित उनके घरो तक पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए। साथ ही भविष्य में कभी ऐसी घटनाओं की पुनरावृति ना हो इसका भी समुचित प्रबंध करना चाहिए।
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