इमरान खान ना तो ठीक से फैसला ले पा रहे हैं ना प्रबंधन कर पा रहे हैं।
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शुक्रवार को प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने संवाददाताओं से माना कि मुल्क में इस बीमारी से लड़ने के ख़राब प्रबंध हैं। ईरान से सटे इलाक़े की एक सरकारी रिपोर्ट उन्होंने देखी तो वे चौंक गए। वहां ख़राब इंतजाम होने की कौन कहे,वहां तो कोई इंतजाम ही नहीं है। इसी तरह बलूचिस्तान के हाल भी बदतर हैं। अवाम का सवाल यह है कि अगर वहां कोई सुविधाओं का ढांचा ही नहीं है तो दो बरस से इमरान ख़ान क्या कर रहे हैं ?
इस देश की धड़कनों पर नियंत्रण रखने वाली फ़ौज इन दिनों केवल अपना ख्याल रख रही है। कश्मीर सीमा पर अंतराल के बाद छुटपुट पटाख़ेनुमा गोलीबारी छोड़कर वह क्या काम कर रही है - यह पाकिस्तान में किसी को नहीं पता। सेना से लोग बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे थे कि वह अपने अस्पताल, दवाएं,संसाधन और सैनिक उनकी मदद के लिए झौंक देगी,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
अब नागरिक फौज को कोस रहे हैं। हालांकि न्यूयॉर्क टाइम्स पर भरोसा करें तो खबर है कि कोरोना के मसले पर सेना और इमरान ख़ान के बीच गंभीर मतभेद उभरे हैं ।इमरान संपूर्ण लॉक डाउन के पक्ष में नहीं हैं और फ़ौज ऐसा चाहती है। इसलिए अब फ़ौज सरकार के आदेश के बिना ही सड़कों पर उतरने का फ़ैसला कर चुकी है। वह अब लॉक डाउन कराएगी।
दरअसल नीति विकलांगता पाकिस्तान का स्थाई भाव है। चाहे जंग के दरम्यान हो या किसी बड़ी आफ़त का मुक़ाबला करना हो। देश को आगे ले जाने वाली तरकीबें हों या फिर भारत के साथ रिश्तों का सिलसिला। हर मामले में इस देश ने बुद्धिहीन होने का परिचय दिया है। हिंदुस्तान से नफ़रत भाव पाकिस्तान का चरित्र है,जो उससे ऊपर उसे कभी उठने नहीं देता। कोरोना के मामले में भी यही हुआ है।
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