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कोरोना की तीसरी लहर: क्या ये केवल आशंकाएं हैं?

सार

कोरोना वायरस की पहली लहर और उसके बाद दूसरी लहर ने भारत में जमकर कहर मचाया। वहीं, दूसरी तरफ विशेषज्ञ पहले ही कोरोना की तीसरी लहर को लेकर आगाह कर चुके हैं।

इस लहर से सबसे ज्यादा खतरा बच्चों को बताया जा रहा है। ऐसे में इस तीसरी लहर के आने की आशंका ने हर किसी की चिंता को बढ़ा दिया है। 
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कोरोना की तीसरी लहर को लेकर परस्पर विरोधी विचार सामने आ रहे हैं। - फोटो : istock
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विस्तार
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देश कोरोना की दूसरी लहर से उबर रहा है, कोरोना संक्रमण के आंकडें लगातार कम हो रहें हैं ऐसे में विशेषज्ञ कोरोनावायरस की तीसरी लहर की आशंका जता रहे हैं। इस वायरस ने अभी तक बुजुर्गों और युवाओं को अपना शिकार बनाया है। विशेषज्ञों के अनुसार कोरोना वायरस की तीसरी लहर में बच्चे ज्यादा शिकार होंगे।

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तीसरी लहर की आशंका कितनी चिंताजनक 
कोरोना वायरस की तीसरी लहर बच्चों के लिए खतरनाक साबित होगी या नहीं इसको लेकर अभी तक स्थिति पूरी तरह से साफ नहीं हुई है। अब इस संबंध में चिकित्सा विज्ञान क्षेत्र की प्रतिष्ठित पत्रिका लैनसेट की एक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बात के अब तक कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि कोविड-19 महामारी की तीसरी संभावित लहर में बच्चों के गंभीर रूप से संक्रमित होने की आशंका है। 

कोरोना की तीसरी लहर को लेकर परस्पर विरोधी विचार सामने आ रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, कोरोना की तीसरी लहर बच्चों को निशाना बनाएगी। जबकि दूसरे अनुमान के मुताबिक, तीसरी लहर का बच्चों पर अधिक असर नहीं होगा।
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तीसरी लहर के बारे में अतिवादी सोच हमें या तो लापरवाह बना देगी या अवसाद में डाल देगी। लेकिन हमें यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि तीसरी लहर आये या नहीं आए ,हमें इसकी पूरी तैयारी रखनी चाहिए क्योंकि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान लापरवाही की कीमत पूरे देश ने चुकाई थी। अचानक आई दूसरी लहर ने देश को संभलने का मौका ही नहीं दिया। 

लॉकडाउन के सहारे महामारी की पहली लहर का सामना बखूबी करने वाले भारत में कोविड की दूसरी लहर ने तबाही मचा दी। पिछले कुछ महीने में कोरोना से इतनी मौतें हुईं जितनी बीते एक साल में भी नहीं हुई थी। अब तीसरी लहर को लेकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की इकोरैप ( Ecowrap) रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना की दूसरी लहर से भी घातक तीसरी लहर हो सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कोविड की तीसरी लहर का असर देश में 97 दिनों तक यानी तीन महीने से भी ज्यादा समय तक रह सकता है। पांच पन्नों की रिपोर्ट में कोरोना वायरस की थर्ड वेव को लेकर काफी कुछ संभावनाएं जताई गई हैं। इसमें कहा गया है कि अगर देश तीसरी लहर के लिए बेहतर तरीके से तैयार रहे तो गंभीर मामले जिन्हें ऑक्सीजन, वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है, ऐसे मामलों की दर में गिरावट आएगी।

एसबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोरोना वायरस के खिलाफ टीकाकरण प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए। - फोटो : istock
क्या कहती है इस विषय पर रिपोर्ट
एसबीआई ने अपनी रिपोर्ट में आंकलन किया कि देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर 108 दिनों तक रही जबकि तीसरी लहर 98 दिनों तक रह सकती है। बेहतर स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और कोविड वैक्सीन में तेजी के सहारे तीसरी लहर में गंभीर मामलों के आंकड़े को 20 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत तक लाया जा सकता है।

इस तैयारी के साथ कोरोना वायरस से होने मौतों की संख्या वर्तमान की तुलना में 40,000 तक कम हो सकती है। एसबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कोरोना वायरस के खिलाफ टीकाकरण प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए। 12-18 आयु वर्ग में लगभग 150-170 मिलियन बच्चों के वैक्सीनेशन के लिए विकसित देशों द्वारा अपनाई गई पर विचार करने की आवश्यकता है।

तीसरी लहर के दौरान बच्चों के संक्रमित होने की आशंका के पीछे कई तर्क दिए जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कमज़ोर इम्यूनिटी के कारण हर तरह की बीमारियों का ख़तरा छोटे बच्चों को अधिक होता है। इसी तरह, जुलाई-अगस्त तक देशभर में अधिकांश लोगों को कोरोना का टीका लग जाएगा। लेकिन, चूंकि बच्चों के लिए अभी वैक्सीन नहीं आयी है। ऐसे में बच्चों के लिए ख़तरा बरकरार रहेगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कोविड की मौजूदा वैक्सीसन ना लगाने में ही बेहतरी है। क्योंकि इन वैक्सीन्स का ट्रायल अभी छोटे बच्चों पर नहीं किया गया है और इसीलिए वैक्सीन के प्रभावों और दुष्प्रभावों के बारे में अधिकांश जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

पहली लहर और दूसरी लहर के दौरान भी भारत में कई बच्चों में संक्रमण के लक्षण देखे गए। साल 2020 में अमेरिका जैसे बड़े देशों में भी कोरोना संक्रमण की चपेट में बहुत –से बच्चे आ गए थे। वहीं, भारत में भी बच्चों के लिए इंफेक्शन का ख़तरा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। ऐसे में एक्सपर्ट्स बच्चों को इस संक्रमण से बचाए रखने के लिए कुछ खास एहतियात बरतने की सलाह देते हैं।

कोरोना की तीसरी लहर की आशंकाओं के बीच राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने राज्यों से बच्चों के लिए हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर के आंकड़े आयोग में जमा करने का आदेश दिया है। पिछले दिनों एनसीपीसीआर के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने  कहा कि हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर की क्या हालत है यह कोरोना की दूसरी लहर में सामने आ गया है।
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तीसरी लहर के निशाने पर बड़ी आबादी - फोटो : पीटीआई
हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर की किल्लत से भी बड़ी दिक्कत यह है कि मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर भी पूरी तरह से चालू हालत में नहीं है। इसकी मुख्य वजह मेडिकल सिस्टम में टेक्निशियन की भारी किल्लत का होना और लापरवाह रवैया है। दूसरी लहर के दौरान कई ऐसे मामले खुलकर सामने आए जब वेंटिलेटर राज्यों में धूल फांकते रहे, कुछ वेंटिलेटर मरम्मत के अभाव में बेकार पड़े रहे।'

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने एक विस्तृत फार्म राज्यों को भेजा है, इसमें बच्चों के इलाज के लिए कुल अस्पताल, नर्सिंग होम, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, डॉक्टर, नर्सों के आंकड़ों देने को कहा गया है । दरअसल, पब्लिक डोमेन में मौजूद रिपोर्ट में चाइल्ड हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर के आंकड़े गायब नजर आते हैं। लिहाजा ऐसे में राज्यों को इतने बारीक आंकड़े आयोग को देना आसान नहीं होगा।

तीसरी लहर के निशाने पर बड़ी आबादी
2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लगाए गए अनुमान के मुताबिक 0-4 साल तक के बच्चों की जनसंख्या तकरीबन 11 करोड़ से ज्यादा यानी कुल आबादी का तकरीबन 11 फीसदी है।12 करोड़ से ज्यादा आबादी 5-9 साल तक के बच्चों की है। यानी कुल आबादी का तकरीबन 12.5 फीसद है। 10 से 14 साल तक के बच्चों की आबादी भी 12 करोड़ से ज्यादा है यानी तकरीबन 12 फीसद।

15-19 साल तक के किशोरों की आबादी 10 करोड़ से ज्यादा यानी कुल आबादी के मुकाबले तकरीबन 10 फीसदी के आसपास है। 2019 में जारी हुए सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के मुताबिक 46.9 फीसदी लोग भारत में 25 साल से कम उम्र हैं। लिहाजा इस रिपोर्ट के आंकड़ों को आधार बनाएं तो थर्ड वेव की जद में आने वाली आबादी तकरीबन 35-38 फीसदी होगी।

सरकारों के दावे और तैयारियां अपनी जगह हैं, पर जमीनी सच्चाई चिंताजनक है। गांव-देहात में पर्याप्त डाक्टर नहीं हैं और बाल विशेषज्ञों की तो भारी कमी है। यह कमी रातोंरात दूर नहीं की जा सकती, क्योंकि पहले से ही ग्रामीणों के लिए प्राथमिक शिक्षा-चिकित्सा की रीढ़ टूटी पड़ी है। कोरोना ने अभिभावकों, डॉक्टरों और सरकारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

संकट तो उन बच्चों पर भी आया है, जिन के माता-पिता पहली या दूसरी लहर की भेंट चढ़ चुके हैं। उनके पुनर्वास की समस्या तो है ही, इस बीच बच्चों की खरीद-फरोख्त करने वाले गिरोहों के भी सक्रिय होने के संकेत मिल रहे हैं। कोरोना काल में गरीबी बढ़ने के कारण कुछ माता-पिताओं द्वारा अपने बच्चे बेच देने की भी खबरें आई हैं। 

बच्चे राष्ट्र का भविष्य हैं, पर 'इच्छाशक्ति’ के अभाव में वंचित वर्ग के बच्चों को राष्ट्र का भविष्य न समझने की भूल अतीत के उदाहरण लिए खड़ी है। बाल कुपोषण, शारीरिक शोषण, अनाथ और गरीब बच्चों की विद्या विहीनता का घोर अंधकार छाया रहा रहा। आज सांविधानिक संस्थाएं बच्चों के मुद्दों का संज्ञान ले रही हैं, तो इसका कारण संविधान में बाल अधिकारों की व्यवस्था है।

इसके बावजूद लाखों बच्चे अशिक्षित और दोहरी शिक्षा नीति के तहत गुणकारी शिक्षा हासिल करने में असमर्थ हैं। एक ओर वे अनाथ बच्चे हैं, जिन्होंने पहली और दूसरी लहर में अपने माता-पिता को खोया है, जबकि तीसरी लहर में तो खुद बच्चों के संक्रमित होने की आशंका जताई जा रही है। बच्चों के बचाव के लिए नया आयोग, नई नीति अपनाने की आवश्यकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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