चांद उदास है। उदास क्या गुस्से में है। यह भी कोई जीवन है। शाम को चलो। चलते ही रहो। सीधे सुबह रुको। पूरब का ध्यान पश्चिम की भी चिंता। इन कवियों को देखो। बैठे बैठे क्या क्या लिख डालते हैं। अब दिनकर ने तो मुझे मां से झबले की मांग करते हुए लिख डाला। ठंड से बचने के लिए। वाह। कल्पना की उड़ान देखिए। पंत ने बूढ़ा ही घोषित कर दिया। वैसे ज्यादातर कवियों ने युवतियों को चंद्रमुखी कहते हुए मेरी तारीफ की है। सच भी है। नारियां तो प्रशंसा में मेरे जैसा मुखड़ा सुनने को लालायित रहती हैं। झूठ मूठ ही सही। कोई कह तो दे। चांद सा मुखड़ा। लीटर दो लीटर खून बढ़ जाता है।
विचारों में खोया चांद बढ़ता रहा। काम में नयापन ना हो तो मन नहीं लगता। कभी कभी तो शीतल किरणें भी गर्मी देने लगती हैं। तन से ज्यादा मन को झुलसाती हैं। पसीना पसीना हो जाता हूं। चिंतन में उलझा चांद बादलों की ओट लेते दिखा। बादल रास्ता देने को जगह बनाने लगते हैं। चांद बड़बड़ाया, अब इन्हें कैसे बताऊं। यहां से निकलने नहीं, छुपने आया हूं।
इस ओस ने जीना ही दूभर कर दिया। फूलों की पंखुड़ियों और पत्तों पर बूंदें चमक रही हैं। छत पर सूखने डाले कपड़े फिर जस के तस हो गए। चांदनी को कौन समझाए। यह ठीक नहीं। वो बया का घौंसला देख रहे हैं। ओस की बूंदें घौंसले से रिस रिस कर जमीन गीली कर रही हैं। बेचारे, चूजों पर क्या बीत रही होगी? वैसे तेज हवाओं वाली रातें ठंडी ही होती हैं।
चांद ख्यालों में खोया रहा। बादल हवा के साथ आंख-मिचौली खेलते खेलते आगे बढ़ गए। चांद फिर धरती के सामने आ गया। बड़े बूढ़े आंगन में बच्चों को खिलाते दिखे। चांद फिर बुदबुदाया। इन बच्चों को भी क्या सूझी। मुझे मामा बना लिया। रिश्तों के बंधन मुझे नहीं भाते। बच्चे मामा कहते हैं और बड़े
मिशन मंगल रच रहे हैं। इन्हें यहां खुरदरी जमीन मिली है। चांद पर घूमेंगे। रहेंगे। पानी की खोज करेंगे।
अरे, जब शीतलता मेरी किरणों में है तो यहां पानी क्यों नहीं होगा? ये तो बताओ धरती पर पानी की बर्बादी कब रोकोगे? सुना है अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। युद्ध टालने के लिए कुछ किया? ऊपर से साफ साफ दिखता है। अब तक कुछ खास नहीं हुआ। 'सेव द वाटर' जैसे दो- चार कार्यक्रमों से क्या होगा। पता तो है। बढ़ते बढ़ते 147 करोड़ के आस पास हो गए हो। अभियान तेज करो। दिखावा कम, काम ज्यादा करो। पानी बचाओ। और कृपा करके यहां मत आओ। धरती की तरह चांद को भी पानी के संघर्ष में झोंक दोगे। इंसान का क्या भरोसा?
रास्ता साफ देख चांद मंथर गति से बढ़ चला। बड़बड़ाना जारी रहा। निर्भयाओं पर हैवानियत रोक नहीं पा रहे। मुझे दागदार कहेंगे। चरित्र को लेकर मुझ पर उंगली उठाएंगे। अपने दामन की तरफ तो नजर घुमा लो। कितने दाग हैं? मेरे चेहरे की ओर बाद में तांक झांक करना।
चांद का चेहरा लाल हो गया। चलते-चलते चीख पड़ा। पता लगाया। कितने बूढ़े माता पिता वृद्धाश्रम में पड़े हैं। आंखें खोलो। देखो मेरी मां अभी भी मेरे साथ है। चरखे पर सूत कात रही है। मतलब स्वस्थ है और खुश भी।
चांद का बड़बड़ाना जारी रहा। ये इंसान कब सुधरेगा। जिस डाल पर बैठा है। उसे ही काट रहा है। चांद पर जीवन खोजने चले हैं। धरती पर तो जीवन सुरक्षित करने का ठिकाना नहीं। हरियाली उजाड़ना, पहाड़ खोदना और नदी नाले प्रदूषित करना कब रुकेगा। यह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। पेड़, पहाड़ और पानी बिना जीवन कैसे बचेगा। मानव हो या जीव जंतु। बिन पानी सब सून। विद्वत्ता झाड़ते हो। शास्त्रों के हवाले देते हो। लेकिन स्वयं के विचारों, उपदेशों पर अमल कब करोगे। विश्वगुरु बनना है कि नहीं। प्रकृति से प्यार करो। अगर नहीं करोगे तो संकट में पड़ोगे। बड़बड़ाते हुए चांद आगे बढ़ता रहा।