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चीन के राष्ट्रपति की भारत यात्रा: जिनपिंग कुछ देंगे या सिर्फ कुछ हासिल करने की चाहत में आ रहे हैं

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तामिलनाडु के महाबलिपुरम में जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनौपचारिक बैठक होगी। - फोटो : ANI
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आखिरकार जिस दौरे पर असमंजस की स्थिति थी वो खत्म हो गई। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आ रहे हैं। तामिलनाडु के महाबलिपुरम में जिनपिंग और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनौपचारिक बैठक होगी। समुद्री के किनारे बसे इस शहर में जिनपिंग और मोदी के बीच होने वाली वार्ता का महत्व इसलिए है कि समुद्रतटीय महाबलिपुरम का महत्व पल्लव और चोलों के काल में काफी बढ़ा।

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यह शहर चीन और दक्षिण एशिया से व्यापार के लिए बड़ा केंद्र बना। यह शहर समुद्र के रास्ते चीन से जुड़ा था। महाबलिपुरम के बंदरगाह से चीनी बंदरगाहों के लिए सामान जाता था। दक्षिण भारतीय समुद्रतटीय शहर में बैठक का मुख्य उद्देश्य दक्षिण पूर्व एशिया और चीन से भारत के व्यापार संबंधों को और मजबूत करना है। हालांकि बैठक से पहले कश्मीर को लेकर तनाव की स्थिति है।

कश्मीर राज्य को धारा 370 के तहत मिले विशेष अधिकार को खत्म किए जाने के बाद पाकिस्तान के साथ चीन अंतराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ मोर्चा खोल बैठा है। वहीं, भारत और चीन के बीच व्यापार संतुलन को लेकर लगातार तनाव है। इस बीच भारत के अरुणाचल प्रदेश में सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है। सैन्य अभ्यास हिमविजय शुरू हो चुका है, इस कारण चीन खासा नाराज है।
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हालांकि तमाम तनावों के बीच मंदी के संकट में आने की संभावना के डर से चीन भारतीय बाजार को खोना नहीं चाहता है। महाबलिपुरम में दोनों नेताओं के बीच व्यापार असंतुलन और सीमा विवाद पर बातचीत होने की संभावना है। लेकिन जिनपिंग का भारत आने का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीए मुक्त व्यापार समझौता है, जिसे जल्द से जल्द चीन लागू करवाना चाह रहा है। इसमें भारत की सहमति होगी तो मंदी के मार झेल रहे चीनी उत्पाद भारतीय बाजार में डंप हो जाएंगे।

कश्मीर को लेकर अंतराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी बयान
कश्मीर से धारा 370 के तहत मिलने वाले विशेष अधिकार को हटाए जाने के बाद अंतराष्ट्रीय मंचों पर चीन पाकिस्तान के साथ खड़ा है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का मसला उठाया। चीनी अखबाल लगातार कश्मीर को लेकर भारत विरोधी लेख लिख रहे हैं।

लेखों में कहा जा रहा है कि कश्मीर भारत का आंतरिक मसला नहीं है। कश्मीर में चीन के आर्थिक हित हैं। भारत के किसी भी कार्रवाई से चीनी हित प्रभावित हो रहे हैं। लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश घोषित किए जाने से भी चीन नाराज है। दिलचस्प बात है कि मोदी और जिनपिंग के बीच होने वाली दूसरी अनौपचारिक बैठक से पहले चीन ने एक सस्पेंश रखा। ये सस्पेंश जानबूझकर चीनी लीडरशीप ने रखा था। चीन पिछले सत्तर साल से भारत के साथ लगभग इसी तरह का व्यवहार करता रहा है।

यही नहीं, जिनपिंग के भारत दौरे से पहले पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान और आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा चीन पहुंचे। खबर ये है कि जिनपिंग मामललपुरम की बैठक के बाद नेपाल जाएंगे। भारत आने से पहले और भारत से जाते हुए पाकिस्तान और नेपाल के नेताओं से जिनपिंग की बैठक साफ संकेत देते है कि भारत से आर्थिक हितो को साधने के लिए चीन सिर्फ बैठक कर रहा है। चीन अपने आर्थिक हितों को साधते हुए भारत विरोधी मोर्चा पूरे इलाके में बना रहा है। क्योंकि इमरान खान के पाकिस्तान दौरे से ठीक पहले इस्लमाबाद में तैनात चीनी राजदूत ने कश्मीर मसले पर भारत के खिलाफ जोरदार बयान दिया।

अमेरिका से उच्च टैरिफ की मार झेल रहा चीन अपने सामानों को भारतीय बाजार में डंप करना चाहता है। - फोटो : PTI
चीन ने बढ़ाया भारत का व्यापार घाटा
भारत के व्यापार घाटे में अहम भूमिका चीन की है। इसका अर्थ यह है कि भारतीय बाजार में चीनी उत्पादों का आयात भारत के व्यापार घाटे को लगातार बढ़ा रहा है। इसका सीधा असर भारतीय उद्योगों को हो रहा है। भारत के कृषि क्षेत्र से लेकर तमाम दूसरे क्षेत्रों को भारी नुकसान चीनी उत्पादों के कारण हो रहा है।

2018-19 में भारत का कुल व्यापार घाटे 176 अरब डॉलर था। इसमें से 53 अरब डॉलर के व्यापार घाटे की जिम्मेदारी चीन पर थी। सीधी भाषा में भारतीय निर्यात को भारी नुकसान चीन से है। हालांकि, पिछले साल वुहान में मोदी और जिनपिंग के बीच हुई पहली अनौपचारिक बैठक में चीनी राष्ट्रपति ने भारतीय प्रधानमंत्री को वादा किया था कि चीन भारत के व्यापार घाटे को कम करेगा।

लेकिन स्थिति सिर्फ वादे तक ही है। वादा जमीन पर नहीं उतरा है। अभी भी भारत के साथ चीन का व्यापार घाटा पहले जैसी स्थिति में है। चीन ने सिर्फ भारत से चावल और चीनी आयात में बढ़ोतरी की है। चीनी बाजार अभी भी भारतीय दवाइयों के लिए नहीं खुला है। दूसरी तरफ चीन के साथ व्यापार घाटा कम करने का सबसे खतरनाक इलाज डोनाल्ड ट्रंप ने शुरू किया। उन्होंने चीनी उत्पादों पर अमेरिका में हाई टैरिफ लगाना शुरू कर दिया है। क्योंकि अमेरिका का व्यापार घाटा भी चीन के साथ 400 अरब डॉलर के करीब पहुंच चुका है।

रीजनल कंप्रिहेंसिव इकनोमिक पार्टनरशीप को लेकर जिनपिंग का खेल
16 देशों के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार संधि (क्षेत्रीए व्यापक आर्थिक साझेदारी) को लेकर चीन काफी तेजी दिखा रहा है। इस व्यवस्था में भारत भी भागीदार बनने वाला है, लेकिन भारत की अपनी चिंता है। भारत की खराब होती आर्थिक स्थिति के बीच अगर भारत इस क्षेत्रीय मुक्त व्यापार सहयोग व्यवस्था में शामिल होगा तो भारत के किसानों और उधोगों को भारी नुकसान पहुंचेगा।

इसमें आसियान देशों के अतिरिक्त चीन भी शामिल होगा। लेकिन इस संधि से सबसे ज्यादा नुकसान भारत को होना वाला है। क्योंकि इससे सबसे ज्यादा प्रभावित भारत का कृषि औऱ डेरी उधोग को होगा। वहीं भारतीय मैनुफैक्चरिंग सेक्टर को भी भारी नुकसान होगा। इस संधि के भागीदार बनने के बाद भारत में आने वाले चीनी सामानों पर आयात शुल्क न के बराबर हो जाएगा।

अमेरिका से उच्च टैरिफ की मार झेल रहा चीन अपने सामानों को भारतीय बाजार में डंप करना चाहता है। लेकिन इससे भारतीय बाजार तबाह हो जाएंगे। बताया जा रहा है कि जिनपिंग महाबलिपुरम की बैठक में भारत पर जल्द से जल्द इस संधि में शामिल होने का दबाव बनाने वाले है। क्योंकि अगर भारत इसमें भागीदार बना तो चीन से आयात होने वाले लगभग 28 प्रतिशत सामानों पर लगने वाली कस्टम डयूटी तरंत हटा देगा। जबकि दूसरे सामानों पर लगने वाली डयूटी अगले 5,10,15 और 20 साल में हटाएगा। इस संधि का विरोध भारत में शुरू हो गया है। खुद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने इसका जोरदार विरोध किया। भारत को इससे दोगुना घाटा होगा। अगर भारतीय उधोग जगत पूरी तरह से तबाह हुआ तो इसका सीधा असर सरकार को मिलने वाले कारपोरेट टैक्स और जीएसटी पर पड़ेगा। इससे भारत की आर्थिक स्थिति ही नहीं चरमराएगी, बल्कि सरकार का राजकोषिय़ घाटा भी बढ़ेगा।
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मोदी और जिनपिंग के बीच दोनों मुल्कों के बीच लंबे समय से चल रहे सीमा विवाद पर बातचीत होगी।
सीमा विवाद पर बातचीत होगी
मोदी और जिनपिंग के बीच दोनों मुल्कों के बीच लंबे समय से चल रहे सीमा विवाद पर बातचीत होगी। हालांकि यह बातचीत के फ्रेमवर्क तैयार करने तक ही सीमित हो सकती है। चीन और भारत के बीच लंबे समय से सीमा विवाद है। लगभग पैंतीस सौ किलोमीटर लंबी सीमा पर कई जगह चीन भारत को परेशान करता है। कई भारतीय इलाकों पर चीन अपना दावा जताता है। अरुणाचल प्रदेश से लेकर कश्मीर के लद्दाख इलाके में चीन लगातार भारतीय इलाकों में घुसपैठ करता रहा है। हालांकि दोनों मुल्कों के बीच सीमा विवाद को लेकर बातचीत होती रही है, लेकिन अभी तक इसका कोई हल नहीं निकला है।

हालांकि भारत के अन्य पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी सीमा विवाद है। लेकिन सफलतापूर्वक सीमा विवाद भारत सिर्फ बांग्लादेश से हल कर पाया है। जिनपिंग के दौरे से पहले अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमा में चीनी सैनिकों दवारा सड़क बनाने की खबर खुद भाजपा के अरुणाचल प्रदेश के अरुणाचल पूर्व के सांसद तापिर गाओ ने दी। हालांकि भारत ने जिनपिंग के दौरे के मद्देनजर इस मुद्दे को गर्म नहीं होने दिया। लेकिन एक खबर भूटान से भी आ रही है। बताया जाता है कि भूटान और चीन के बीच डोकलॉम विवाद को हल करने की स्थिति बन गई है। दोनों मुल्कों के बीच समझौता होना वाले है। डोकलॉम को लेकर चीन की शर्तें भूटान मानने वाला है। यह एक तरह से भारत के लिए झटका होगा।  

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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