हम दीर्घ काल तक यूरोपीयन राजनीति के सर्वग्रासी शक्ति को काटकर फिर से मिलने के लिए एकत्र हुए हैं। हम अलग राष्ट्र हैं, हमारा अलग राष्ट्रीय व्यक्तित्व हैं, किंतु हमारी जनता की नाड़ी में एक ही तरह का रक्त बह रहा है। मनुष्य का जो कुछ उत्तम है, धर्म में आचरण में, भावना में, सौंदर्यबोध में उसका पूर्ण रूप संस्कृति है।
आचार्य द्विवेदी हमें सावधान करते हुए बताते हैं-
हम अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सम्बन्धों को बहुत कम जानते हैं। जो कुछ जानते हैं वह अधूरे ज्ञान के आधार पर अधूरे विश्वास के साथ लिया गया है। इस समय और सावधानी के साथ इस काम को करना होगा। धर्म का आधार सत्य है। हमारी संस्कृति को अभिव्यक्ति का माध्यम।
एक जमाने तक दुनिया की लगभग दो तिहाई हिस्से को अपने प्रभाव में आवृत करने वाला बौद्ध धर्म- सत्य, अहिंसा-करुणा-मैत्री-अपरिग्रह-अस्तेय के आचरण के बदौलत टिका रहा। पर जब बौद्ध विहारों में बौद्ध भिक्षुओं के आचरण में शिथिलता आ गई, बौद्ध विहार बिना श्रम के महज दिखावे के ध्यान-साधना और विलासिता के केंद्र बनते गए। महान अशोक-कनिष्क और हर्ष का राजाश्रय समाप्त हो गया। बड़े-बड़े राजपरिवारों की स्त्रियों का बेरोकटोक प्रवेश बौद्ध विहारों में होने लगा।
महात्मा बुद्ध के बनाए नैतिक नियमों को ताक पर रखकर वह सब कुछ किया जाने लगा जिससे परहेज की शिक्षा महात्मा बुद्ध ने दिया। तब महात्मा बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद को बताया कि-
अब यह धर्म पांच सौ साल से ज्यादा नहीं टिक पाएगा। एक ऐसा धर्म जिसने इस संसार में दुःख से पीड़ित आम जनता को चार आर्य सत्यों के द्वारा मुक्ति के सर्वथा व्यवहारिक उपाय बताया। यह कि इस दुनिया में दुःख है। इस दुःख का कारण है। दुःख का निरोध भी संभव हैं। दुःख निवारण के उपाय भी हैं।
महात्मा बुद्ध ने ज्ञान-इच्छा, क्रिया के इस त्रिपुटी जगत में दुःख का मूल कारण मानवीय तृष्णाओं को बताया है। मनीषी कवि कालिदास ने अपनी रचना 'मेघदूत' में यह उदघोष किया है कि-
उत्तम मनुष्य की जितनी भी संपत्ति है उसका एकमात्र फल दुखियों का दुःख दूर करना है।
ज्ञान प्राप्ति के बाद एक बार महात्मा बुद्ध के मन में भी आया कि मौन साध लें (जैसा कि उस युग में प्रचलन में था। साधु- सन्यासी ज्ञानी -गुनी सिर्फ अपने लिए निवृत्त मार्ग चुनते थे। दूसरों के दुखों के निवारण से उनका उतना सरोकार नहीं था।) ऐसे में महात्मा बुद्ध महात्मा बुद्ध नाम को चरितार्थ नहीं करते।
इस तथ्य की पुष्टि बोधिचर्यावतार ग्रंथ में किया गया है- दूसरे प्राणियों के दुखों को छुड़ाने में जो आनंद का समुद्र उमड़ता है, वही सब कुछ है। अपने लिए नीरस मोक्ष प्राप्त करने में क्या रखा है, क्योंकि मानव जीवन दुर्लभ है। मार्कण्डेय पुराण में कहा भी गया है- मनुष्य: कुरुते ततु यन्न शक्यं सुरासुरैः (मनुष्य जो कर सकता है वह स्वर्ग के देवता भी नहीं कर सकते।)
बौद्ध धर्म की व्यवहारिक शिक्षा में भी जीव मात्र के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने अपील सर्वत्र दिखाई देती है।
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