90 के दशक में बनीं कई सुपरहिट ब्रिटिश फिल्में
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द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का सफर
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सिनेमा में साहित्याधारित फिल्मों की बहार थी। लॉरेंस ओलिविएर ने ‘हेनरी फिफ्थ’, ‘हेमलेट’, ‘रिचर्ड थर्ड’ (शेक्सपियर), डेविड लीन ने ‘ग्रेट एक्स्पेक्टेशन्स’, ओलिवर ट्विस्ट’ (चार्ल्स डिकेंस) बनाई। कई और फ़िल्म निर्देशक भी अपनी फ़िल्म के लिए साहित्य का सहारा ले रहे थे। इसी समय लिंडसे एंडरसन (ओ ड्रीमलैंड), टोनी रिचर्डसन (मोमा डोन्ट अलाउ) जैसे निर्देशक कम बजट वाली डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे।
ये नवयथार्थवादी शैली में तत्कालीन समाज को प्रस्तुत कर रहे थे। इसी समय ब्रिटेन के वर्ग-संघर्ष को दिखाता हुआ ‘फ्री सिनेमा’ जैसा सामाजिक आंदोलन चला। इसके तहत ‘सटरडे नाइट एंड सनडे मोर्निंग’ फिल्म बनी। ‘एंग्री यंग मैन’ ने अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को आकर्षित किया। रिचर्डसन की ‘ए टेस्ट ऑफ़ हनी’, ‘टॉम जोन्स’ तथा ‘द लोनलीनेस ऑफ द लोन्ग डिस्टेन्स रनर’ तथा एंडरसेन की ‘दिस स्पोर्टिंग लाइफ’ को लोग आज भी याद/पसंद करते हैं।
अब ब्रिटेन दूसरे देशों से खूब फिल्में आयात कर रहा था। रोमन पोलांस्की की ‘रिपल्सन’ त्रूफ़ो की ‘फ़ेरनहीय़ 451’, स्टेनली क्यूब्रिक की ‘2001: ए स्पेस ओडिसी’, ‘ए क्लॉकवर्क ओरेंज’ जैसी फ़िल्में ब्रिटिश दर्शकों को खूब भा रही थीं, लेकिन जल्द ही ब्रिटिश अर्थव्यवस्था में गिरावट आई और 1980 के दशक में यह सबसे अधिक निम्न स्तर पर पहुँच गई।
इसी समय ब्रिटेन के कई फ़िल्म निर्देशकों ने हॉलीवुड का रुख किया। ब्रिटेन फ़िल्म इंडस्ट्री को ऑस्ट्रेलिया से भी इसी काल में चुनौती मिलनी शुरू हुई, पर इसी समय टेलीविजन नेटवर्क के चैनल 4 की शुरुआत हुई और ब्रिटेन के सिनेमा को एक नया जीवन मिला। चैनल 4 के कारण ‘ए रूम विद अ व्यू’ (1986), ‘द क्राइंग गेम’ (1992), ‘फ़ोर वेडिंग्स एंड ए फ़ुनरल’ (1994), ‘सिक्रेट्स एंड लाइज’ (1996) तथा ‘द फ़ुल मोन्टी’ (1997) जैसी फ़िल्में दुनिया भर के दर्शकों तक पहुंचीं और सराही गईं।
माइक ली तथा केन लोच जो पहले टेलीविजन के लिए फ़िल्म बन रहे थे, इक्कीसवीं सदी में वे फ़िल्म निर्माण की ओर लौटे। माइक ली ने 1999 में ‘टोप्सी-टर्वी’, 2004 में ‘वेरा ड्रैक’, 2008 में ‘हैप्पी-ग-लकी’, 2010 में ‘अनदर ईयर’, 2014 में ‘मिस्टर टर्नर तथा 2018 में ‘पेटरलू’ बनाई। इसी तरह केन लोच ने 2006 में ‘द विंड दैट शेक्स द बार्ले’, 2012 में ‘द एंजेल्स’ शेयर’ तथा 2016 में ‘आई, डैनियल ब्लैक’ बनाई।
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक ब्रिटेन में कई बहुत अच्छी फ़िल्में बनी हैं। ’28 डेज लेटर’, ‘डन्किर्क’, ‘गॉड’स ओन कंट्री’, ‘डैनियल ब्लैक’, ‘सिंग स्ट्रीट’, ‘हंगर’, ‘स्नैच’, ‘इन दिस वर्ल्ड’, ‘लव, एक्चुअली’, ‘एटोनमेंट’ ऐसी ही फ़िल्में हैं, यदि नहीं देखी हैं तो देख लें।
‘ड्राकुला’, ‘गाँधी’, ‘सेंस एंड सेंसिबिलिटी’, डॉ जिवागो’, ‘लॉरेंस ऑफ़ अरेबिया’, ‘फ़ोर वेडिंग्स एंड ए फ़ुनरल’ तो आप देख चुके होंगे और हाँ, यदि ‘द ब्रिज ऑन द रिवर क्वाई’, ‘मोन्टी पायथन एंड द होली ग्रेल’ फ़िल्मों को यदि नहीं देखा है तो इन्हें झटपट देख लीजिए। आप कुछ अच्छी ब्रिटिश फ़िल्मों से अपना मनोरंजन अवश्य करें।
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