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कुरुक्षेत्र: हिंदुत्व की जमीन पर ब्राह्मण ध्रुवीकरण का दांव

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प्रमोद कृष्णम एवं जितिन प्रसाद - फोटो : Amar Ujala
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पिछले तीन दशकों से हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय (धर्म बनाम जाति) की राजनीति की प्रयोगशाला रहे उत्तर प्रदेश की गंगा जमुना पट्टी में कानपुर के बिकरू कांड की बोतल से ब्राह्मण ध्रुवीकरण का जिन्न निकालने की कोशिश तेज हो गई है। कांग्रेस के दो नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम और जितिन प्रसाद इस मुहिम में बेहद सक्रिय हैं।  पिछले कुछ दिनों से टीवी चैनलों में ब्राह्मण हितों के सबसे बड़े पैरोकार बनकर आचार्य प्रमोद कृष्णम जबर्दस्त चर्चा में हैं जबकि सोशल मीडिया पर जितिन प्रसाद तलवार भांज रहे हैं। 
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उधर बसपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भी एक बार फिर दलित ब्राह्मण समीकरण बनाकर उसमें मुसलमानों को जोड़कर 2022 के विधानसभा चुनावों की जंग जीतने का सपना संजो रही हैं। वहीं भाजपा और संघ परिवार अपने ब्राह्मण जनाधार को बचाए रखने की कवायद में जुट गया है और इसके लिए पार्टी ने अपने सारे ब्राह्मण नेताओं विधायकों और सांसदों को मोर्चे पर लगा दिया है। 

लेकिन इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा सुर्खियां आचार्य प्रमोद कृष्णम और जितिन प्रसाद ही बटोर रहे हैं। इन दोनों को कांग्रेस नेतृत्व का कितना समर्थन और आशीर्वाद प्राप्त है यह तो स्पष्ट नहीं है लेकिन कांग्रेस के भीतरी सूत्र कहते हैं कि कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी का किसी न किसी रूप में इनकी इस मुहिम का समर्थन है।  कृष्णम और प्रसाद की इस ब्राह्रमण मुहिम से भाजपा और संघ नेतृत्व भी चिंतित है और उसने अपने सभी ब्राह्मण महारथियों को मुकाबले के लिए मैदान में उतार दिया है। पिछले दिनों लखनऊ के गोमती नगर में संघ के पदाधिकारियों की एक बैठक में इस पर गंभीर चिंतन मनन किया गया।  
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कानपुर के बिकरू कांड में आठ पुलिस कर्मियों की हत्या में आरोपित विकास दुबे और उसके पांच साथियों के कथित पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद गाजियाबाद से गोरखपुर और सहारनपुर से ललितपुर तक उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण कार्ड   गरमाने की कोशिश तेज हो गई है।  ब्राह्रमण ध्रुवीकरण के दो प्रमुख चेहरों के रूप में सबसे ज्यादा मुखर और सक्रिय हैं कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम और पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद।  जहां टीवी चैनलों में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के शासन काल में ब्राह्मणों की उपेक्षा अनदेखी और उन पर चुन चुन कर अत्याचार का आरोप लगाते हुए आचार्य प्रमोद कृष्णम सबसे ज्यादा बुलंद आवाज में मोर्चा खोले हुए हैं तो सोशल मीडिया पर जितिन प्रसाद लगातार ज्यादा सक्रिय हैं।  

जितिन प्रसाद ने ब्राह्मण चेतना परिषद का गठन किया है।  वह खुद इसके संस्थापक हैं और पूर्व आईएएस अधिकारी वी पी मिश्र इसके अध्यक्ष हैं।  परिषद की ओर से जितिन प्रसाद ने राज्य के प्रमुख ब्राह्मण नेताओं, पूर्व अधिकारियों, सामाजिक व्यक्तियों, व्यवसायियों, बुद्धिजीवियों को छह जुलाई को एक पत्र भेजकर उनसे ब्राह्मण हितों की रक्षा के लिए संगठित होने का आह्वान किया है। 

इस पत्र में जितिन प्रसाद ने लिखा है कि, “आज विशेषकर उत्तर प्रदेश में समाज के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।  विगत कुछ वर्षों में प्रदेश में समाज को हाशिए पर पहुंचाने का का कुत्सित प्रयास जारी है।  यह सरकार उसके साथ सौतेला व्यवहार करती आ रही है, उसे न्याय के लिए भटकना पड़ रहा है। कहीं भी उसकी सही ढंग से सुनवाई तक नहीं हो रही है।  आज वर्तमान परिस्थितियों में समाज अपने आप को अपमानित और असहाय महसूस कर रहा है। 

हमारा समाज सदैव से समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चला है, समाज ने कभी दूसरे समाज के अधिकारों पर अतिक्रमण करने की चेष्टा नहीं की है।  लेकिन आज जब उसे अपने अधिकारों से वंचित किया जा रहा है तब उसे अस्तित्व के रक्षा के लिए आगे आना ही होगा।  वर्तमान सरकार में ब्राह्मण समाज के दर्जनों लोगों की हत्याएं एवं उन पर जानलेवा हमले हुए हैं, समाज के लोगों को न्याय नहीं मिला बल्कि विभिन्न मामलों में तो सरकार में शामिल लोगों ने उल्टे अन्याय करने वालों को ही संरक्षण दिया है। जिस कारण समाज के लोग प्रदेश में अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। 

मैने समय समय पर समाज को न्याय दिलाने के लिए प्रयास जारी रखे हैं। अब इस बात की आवश्यकता है हम सभी आपसी मतभेद भुला दें तभी खोए हुए गौरव को प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि हम सभी अपने सुझाव एक दूसरे से साझा करें समस्याओं को जाने एवं उनके निराकरण के लिए मिलकर सामूहिक प्रयास करें।  परिषद ने निर्णय लिया है कि ब्रह्म चेतना संवाद कार्यक्रम के माध्यम से अधिक से अधिक समाज के लोगों से सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से प्रत्येक जनपद में संपर्क स्थापित किया जाए, इस क्रम में शीघ्र ही आपसे भी वार्ता करने का भी अवसर प्राप्त होगा। “

जितिन प्रसाद के हस्ताक्षरों वाला यह पत्र पूरे प्रदेश में सभी जिलों के ब्राह्मण समाज के प्रमुख लोगों को भेजा गया है।  इनमें राजनेता, पूर्व नौकरशाह, वकील, शिक्षक, पत्रकार, सामाजिक संस्थाओं के पदाधिकारियों आदि को भेजा गया है।  जितिन प्रसाद कहते हैं कि वह सोशल मीडिया के जरिए अनेक लोगों के संपर्क में हैं और ब्राह्मण समाज के हितों की रक्षा के लिए बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के पूरे समाज को एकजुट करने में जुटे हैं।  यह पूछने पर उनकी यह मुहिम कितनी राजनीतिक है और कांग्रेस नेतृत्व का क्या इसे समर्थन है, जितिन प्रसाद कहते हैं कि यह राजनीतिक नहीं सामाजिक मुहिम है और पार्टी का इससे कोई लेना देना नहीं है। 

उधर विकास दुबे कांड के बाद टीवी चैनलों पर ब्राह्मण राजनीति को लेकर जितनी भी बहसे हुईं उन सबमें आचार्य प्रमोद कृष्णम ने खुलकर योगी सरकार के राज में ब्राह्मणों पर अत्याचार, उनकी हत्याएं और उनका अस्तित्व मिटाने जैसे गंभीर आरोप लगाए।  यहां तक कि आचार्य कृष्णम ने यह भी कह दिया कि अगर उनकी पार्टी कांग्रेस इस मुद्दे पर बोलने से उन्हें रोकेगी तो वह उसकी भी नहीं सुनेंगे। 

हर बहस में उन्होंने कहा कि वह जातिवादी नहीं हैं लेकिन किसी भी समाज पर अगर अत्याचार होगा तो वह चुप नहीं बैठेंगे और क्योंकि इस समय उत्तर प्रदेश में ब्राह्रमण समाज का दमन हो रहा है इसलिए ब्राह्मणों के हक में बोलना उनका फर्ज है। एक टीवी चैनल पर प्रमोद कृष्णम ने चुनौती देते हुए कहा कि उन पर अगर कोई ब्राह्मण राजनीति करने का आरोप लगाता है तो वह ब्राह्मण समाज से कहेंगे कि वह उनको वोट न दे, लेकिन वह समाज के लिए बोलेंगे और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। 

दरअसल पूरे उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं का प्रतिशत आठ से लेकर 12 फीसदी तक है।  पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह प्रतिशत आठ तो बुंदेलखंड में दस और मध्य व पूर्वी उत्तर प्रदेश में 12 फीसदी तक है। कभी पूरे प्रदेश में ब्राह्मण एक मुश्त कांग्रेस के साथ होता था।  लेकिन 1990 के बाद से धीरे धीरे ब्राह्मण भाजपा के साथ चला गया।  लेकिन 2007 के विधानसभा चुनावों में भाजपा से नाराज ब्राह्मणों ने बसपा को वोट दिया और मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।  2009 के लोकसभा चुनावों में ब्राह्मणों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस की तरफ घूमा और कांग्रेस ने आश्चर्य जनक रूप से 22 लोकसभा सीटें जीतीं। 

लेकिन कांग्रेस इसे संभाल नहीं सकी और 2012 में ब्राह्मण वोटों का झुकाव सपा की तरफ हुआ और 225 सीटें जीतकर समाजवादी पार्टी ने अपनी बहुमत की सरकार बनाई।  2014 में ब्राह्मणों का झुकाव फिर भाजपा की तरफ हुआ और लोकसभा चुनावो में जहां भाजपा और सहयोगी दलों ने मिलकर 73 सीटें और विधानसभा चुनावों में 326 सीटें जीतकर भारी सफलता पाई। 

अब कांग्रेस 2022 में अपने इस पुराने जनाधार को वापस पाना चाहती है। जब से कांग्रेस में प्रियंका गांधी राजनीति में आई हैं और उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी मिली है, वह हर हाल में 2022 के विधानसभा चुनावों में राज्य में कांग्रेस की वापसी चाहती हैं। प्रियंका जहां एक तरफ सोशल मीडिया के जरिए लगातार उत्तर प्रदेश सरकार पर हमलावर हैं, वहीं दूसरी तरफ वह राज्य के जातीय और सामाजिक समीकरणों को भी पार्टी के पक्ष में करना चाहती हैं। प्रियंका के करीबी कांग्रेसी बताते हैं कि उन्होंने अपनी दादी इंदिरा गांधी से बहुत कुछ सीखा है, इसलिए वह राज्य में एक बार फिर कांग्रेस के पक्ष में ब्राह्मण मुस्लिम और दलित जातियों का जिताऊ समीकरण बनाना चाहती हैं। इसके लिए एक तरफ तो उन्होंने अति पिछड़े जायसवाल समुदाय से आने वाले अजय कुमार लल्लू को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया तो दूसरी तरफ आचार्य प्रमोद कृष्णम और जितिन प्रसाद को ब्राह्मणों के बीच काम करने की खुली छूट दे दी है। 

रणनीतिकारों का मानना है कि अगर ब्राह्मण दलित और अति पिछड़े कांग्रेस के साथ जुड़ गए तो मुसलमान खुद ब खुद जुड़ जाएंगे।  इसलिए कांग्रेस उत्तर प्रदेश में इस बार सलीके से ब्राह्मण कार्ड खेलना चाहती है।  दरअसल 2017 में जब चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के प्रचार अभियान को संभाला था तब उनकी मूल योजना प्रियंका गांधी को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश करके किसी ब्राह्मण को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाकर ब्राह्मण मुस्लिम और अन्य का समीकरण बनाने की योजना थी।  लेकिन तब कांग्रेस नेतृत्व प्रियंका को सीधे राजनीति में उतारने के लिए तैयार नहीं हुआ और विकल्प के रूप में शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करके राज बब्बर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया और प्रमोद तिवारी और डा.संजय सिंह को उनके साथ प्रचार अभियान की जिम्मेदारी सौंपी गई।  लेकिन उड़ी सर्जिकल स्ट्राईक ने सारा खेल बिगाड़ दिया और दबा में आई कांग्रेस को सपा से गठबंधन करना पड़ा जो बुरी तरह विफल हुआ।   

लेकिन 2022 के विधानसभा चुनावों की कमान बतौर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी के पास है और इन चुनावों में कांग्रेस की सफलता प्रियंका के राजनीतिक भविष्य को भी तय करेगी। इसलिए एक तरफ टीम प्रियंका प्रदेश अध्यक्ष अजय लल्लू के जरिए पिछड़े और अति पिछड़े मतदाताओं को जोड़ने में जुटी है तो दूसरी तरफ आचार्य प्रमोद कृष्णम जितिन प्रसाद, प्रमोद तिवारी, आराधना मिश्रा, अनुग्रह नारायण सिंह, राजेश मिश्रा जैसे नेताओं को आगे करके सवर्ण मतदाताओं विशेषकर ब्राह्मणों और वैश्यों को अपनी ओर खींचना चाहती है।

इस बीच कानपुर के बिकरू कांड ने उत्तर प्रदेश में एक नई बहस छेड़ दी है। आचार्य प्रमोद कृष्णम कहते हैं कि कई हत्याओं और अपराधों में आरोपित विकास दुबे से किसी को सहानुभूति नहीं है लेकिन जिस तरह से पुलिस ने उसे और उसके साथियों को कथित मुठभेड़ में मारा है जिसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्व न्यायाधीश और राज्य के पूर्व डीजीपी से जांच कराने का आदेश दिया है, उससे उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं।  कुछ ब्राह्मण संगठन राज्य सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगाते हुए सरकार के खिलाफ ब्राह्मणों को गोलबंद करने में जुट गए हैं।

कांग्रेस भी इसका फायदा उठाना चाहती है। जबकि भाजपा और संघ परिवार में इस मुद्दे को लेकर चिंता है।  कांग्रेस में एक खेमा चाहता है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में या तो पार्टी प्रियंका गांधी को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत करके अकेले चुनाव लड़े और अगर प्रियंका को नहीं करना है तो आचार्य प्रमोद कृष्णम या जितिन प्रसाद जैसे किसी ब्राह्मण नेता को अपना चेहरा बनाकर चुनाव लड़ना चाहिए। 

राज्य के कथित ब्राह्मण संगठनों के नाम से फेसबुक, व्हाट्स एप, ट्विटर आदि पर इन दिनों योगी सरकार के दो साल के कार्यकाल के दौरान पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों की हत्याओं और हुए हमलों की पूरी सूची वायरल हो रही है। जितिन प्रसाद की ब्राह्मण चेतना परिषद सोशल मीडिया पर पूरी मुहिम चला रही है। राषट्रीय परशुराम परिषद के महासचिव पं.देवदत्त शर्मा की मांग है कि भगवान परशुराम के जन्मदिवस की छुट्टी फिर से बहाल की जाए।  ब्राह्मण नेता आचार्य राजीव नारायण शर्मा के मुताबिक ब्राह्मण समाज आदि काल से ही सबको साथ लेकर चलने वाला और समाज व देश को दिशा दिखाने वाला समाज रहा है। उसमें जातीय संकीर्णता नाम मात्र को भी नहीं है।  लेकिन पिछले कई वर्षों से ब्राह्मणों की उपेक्षा जिस तरह हो रही है, उससे इस समाज को अपने आत्म सम्मान और अधिकारों के प्रति सचेत होना पड़ेगा। 

आचार्य प्रमोद कृष्णम कहते हैं कि उन्हें विकास दुबे जैसे अपराधी से कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन पांच दिन पहले ब्याह करके आई अमर ने दुबे की पत्नी खुशी ने क्या अपराध किया था जो उसे जेल भेजा गया। फिर जो पांच लड़के मारे गए उनमें से किसी की भी कोई हिस्ट्रीशीट नहीं थी और एक प्रभात मिश्रा तो नाबालिग था जो इंटरमीडिएट की बोर्ड परीक्षा में प्रथम श्रेणी में पास हुआ। प्रमोद कृष्णम कहते हैं कि बिना अदालत में मुकदमा चलाए जुर्म साबित हुए पुलिस कैसे किसी को मारने का फैसला कर सकती है। 

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी अपने ब्राह्मण जनाधार को सहेजे रखने की कोशिश शुरु हो गई है। पार्टी ने अपने सभी ब्राह्मण नेताओं और प्रवक्ताओं को मैदान में उतार दिया है। भाजपा के केंद्रीय और प्रदेश प्रवक्ता लगातार कांग्रेस और बसपा के ब्राह्मण कार्ड को विफल करने के लिए दलील दे रहे हैं कि विकास दुबे जैसे अपराधी ब्राह्मणों का प्रतीक और आदर्श नहीं हो सकते।  प्रदेश भाजपा प्रवक्ता शलभ मणि त्रिपाठी, प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष डा.लक्ष्मीकांत वाजपेयी, केंद्रीय मंत्री महेंद्रनाथ पांडे, उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा, ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री शिवप्रताप शुक्ला जैसे भाजपा के कई ब्राह्मण नेता इस मुद्दे पर योगी सरकार के बचाव में सक्रिय हैं। बताया जाता है कि भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने पार्टी के सभी ब्राह्मण विधायकों जिनकी संख्या लगभग 55 है और सांसदों से राज्य सरकार से ब्राह्मणों की नाराजगी को लेकर फीड बैक लिया है। 

उधर कांग्रेस के अलावा बसपा ने एक बार फिर दलित ब्राह्मण गठजोड़ का दांव चलना शुरु कर दिया है।  2007 में बसपा ने इसी जातीय गठजोड़ से चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल करके सत्ता पाई थी। मायावती ने यह बयान देकर कि सरकार को ध्यान देना चाहिए कि उसके किसी भी कदम से ब्राह्मण समाज आहत न हो, इसका संकेत दे दिया है।  लोकसभा में भी पार्टी ने अपने संसदीय दल के नेता पद से दानिश अली को हटाकर रितेश पाठक को जिम्मेदारी देकर यह जता दिया था कि बसपा 2022 में पुराना दलित ब्राह्मण मुस्लिम गठजोड़ बनाने की तैयारी में है।

बिकरू कांड का मुख्य सूत्रधार विकास दुबे एक समय बसपा में बहुत सक्रिय था।  कांग्रेस ने ब्राह्रमण वोटों का ध्यान रखते हुए हाल ही में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष रहे और लंबे समय तक पार्टी में कई पदों पर रहे मोहन प्रकाश को एक बार फिर राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाकर ब्राह्मणों को संदेश दिया है। इसके साथ ही कनिष्क पांडे को पूर्वी उत्तर प्रदेश युवक कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया है। इसके साथ ही कांग्रेस के भीतर मांग हो रही है कि उत्तर प्रदेश में कुछ महीने पहले निकाले गए पुराने कांग्रेसी नेताओं जिनमें सत्यदेव त्रिपाठी, भूधऱ नारायण मिश्र, नेकचंद पांडे, डा.संतोष सिंह जैसे कई दिग्गज ब्राह्मण औऱ सवर्ण नेता हैं, उन्हें वापस पार्टी में लिया जाए और उनके साथ साथ पार्टी के सभी ब्राह्मण औऱ सवर्ण नेताओं को पूरे प्रदेश में सक्रिय किया जाए। 

लेकिन लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र के पूर्व प्रोफेसर और जाने माने राजनीतिक विश्लेषक डा.रमेश दीक्षित इससे सहमत नहीं हैं कि कांग्रेस ब्राह्मण या किसी और जाति के ध्रुवीकरण का कार्ड खेले।  डा. दीक्षित के मुताबिक कांग्रेस अपनी स्थापना से ही सभी वर्गों जातियों धर्मों और वर्णों का प्रतिनिधित्व करती रही है। यही उसकी मूल ताकत है। उसे इसे नहीं छोड़ना चाहिए।

कांग्रेस को गांधी नेहरू पटेल मौलाना आजाद अंबेडकर की विचारधारा पर चलते हुए समाज के सभी वर्गों जिनमें हर वर्ग के वंचित समूह शामिल हैं उन्हें साथ लेकर राजनीति करनी होगी तभी वह सपा बसपा और भाजपा से खुद को अलग कर पाएगी और पूरे समाज को स्वीकार्य होगी। रमेश दीक्षित कहते हैं कि जब से कांग्रेस ने अपनी मूल प्रकृति को छोड़ा है वह कमजोर हुई है। जाति और धर्म के ध्रुवीकरण की राजनीति कांग्रेस की मूल विचारधारा के विपरीत है।  उसे इससे बचना चाहिए। 
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