‘सुजाता’ के पहले कुछ फ़िल्में देखी थीं। उसके बाद बहुत सारी फ़िल्में देखीं। अच्छी-बुरी, देसी-विदेशी सब तरह की फ़िल्में देखीं। लेकिन मेरे बालमन पर इसकी जो छवि पड़ी वो अभी तक जीवित है। मैं जब यह आलेख लिखने बैठी तो मेरी बेटी ने पूछा, ‘तुम इतनी और फ़िल्मों पर लिख सकती हो, पर सुजाता पर ही क्यों?’ प्रश्न वाजिब था। मैंने भी इस पर विचार किया। इतने बरसों बाद भी ‘सुजाता’ के मेरी स्मृति में धंसे रहने का क्या कारण हो सकता है? यह सही है कई अन्य फ़िल्मों पर लिखा जा सकता है, पहले भी लिखा है, आगे भी लिखूँगी मगर आज तो बस ‘सुजाता’ पर।
सुजाता की कहानी और हमारी दुनिया
एक समय था जब किशोरावस्था में ‘सुजाता’ मुझे मेरी अपनी ही कहानी लगती थी। अपने गहरे रंग के कारण, परिवार के दुभाँति व्यवहार के कारण। तब मैं कल्पना किया करती थी कि किसी दिन मैं टेलीफ़ोन का चोंगा उठाऊँगी तो मेरे कानों में सुनाई देगा, ‘जलते हैं जिसके लिए, तेरी आंखों के दिए, लाया हूँ वही गीत मैं तेरे लिए...’ लेकिन तभी मेरे बालमन में कुछ समस्याएं उठ खड़ी होतीं।
एक तो मेरी आंखें नूतन जैसी खूबसूरत और भावप्रवण न थीं (मेरी आंखों पर भी तंज कसा जाता था) दूसरे उस समय हमारे घर में टेलीफ़ोन था ही नहीं। इसके बावजूद इस मनभावन सपने ने मेरे किशोरमन को बहुत दिन खुश रखा। जब पहली बार (उसके बाद यह फ़िल्म दो बार और देखी है) यह फ़िल्म देखी, तब मेरी वय मुश्किल से ग्यारह-बारह साल की रही होगी। इस फ़िल्म ने मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव डाला था। बात पिछली सदी के साठ के पूर्वार्द्ध की है। उन दिनों मनोरंजन के बहुत ही कम साधन थे, टेलीविजन-मोबाइल न था। हालाँकि हम आज की बनिस्बत अधिक मगन रहा करते थे। सादगी की जादूभरी यह फ़िल्म मेरे बालमन पर खुब गई।
उन दिनों फ़िल्म देखना एक बड़ी घटना हुआ करती थी। कई दिन पहले से हम फ़िल्म देखने की बात सोच कर रोमांचित रहा करते थे। यह इतना विरल होता था कि हर देखी गई फ़िल्म बहुत दिनों तक मन में घर किए रहती और हम उसकी जुगाली करते रहते। वयस्कों की स्क्रीनिंग के बाद कभी-कदा बच्चों को फ़िल्म देखने की अनुमति मिला करती थी।
आज की तरह नहीं कि ड्राइंगरूम/बेडरूम में चौबीस घंटे सब तरह की फ़िल्में चल रही हैं और बच्चे-बड़े-बूढ़े सब एक साथ देख रहे हैं। या सब अपने-अपने मोबाइल पर मजे कर रहे हैं। आज पेनड्राइव और मोबाइल ने फ़िल्म देखना आसान कर दिया है मगर आज अक्सर यह व्यक्तिगत क्रिया बन कर रह गया है, सामूहिकता समाप्त हो गई है। समूह में फ़िल्म देखने का मजा कुछ और ही होता है।
जिन दिनों ‘सुजाता’ देखी थी उन दिनों हीरो-हिरोइन का नाम जानना काफ़ी होता था हमें न तो यह मालूम था कि फ़िल्म निर्देशक की होती है या निर्देशक का नाम भी महत्व रखता है। हमें निर्देशक किस चिड़िया का नाम है पता न था। हमारे लिए नूतन-सुनील दत्त बहुत बड़े लोग थे। ललिता पवार से हम परिचित थे। अभी जब फ़िर से यह फ़िल्म देखी तो न केवल निर्देशक पर ध्यान गया बल्कि सिनेमाटोग्राफ़र, एडीटर, आर्ट डॉयरेक्टर सबके नाम पर ध्यान गया। जब ‘सुजाता’ देखी थी तब फ़िल्म का क ख ग नहीं जानती थी। असल में मेरे कहने का मतलब है एक अच्छी फ़िल्म देखने के लिए, उसका असर होने के लिए फ़िल्म का पंडित होना आवश्यक नहीं है। यह चाक्षुक कला है। ‘सुजाता’ जैसी फ़िल्मों की सादगी अपको अपनी ओर स्वत: आकर्षित करती है। तब यह नहीं मालूम था कि यह क्लासिक फ़िल्म है।
बाद में बहुत-सी अच्छी और कलात्मक देसी-विदेशी फ़िल्म देखने का अवसर मिला। फ़िल्म एप्रिसिएशन का कोर्स किया, फ़िल्म साहित्य पढ़ा, फ़िल्म सिद्धांत पढ़े। फ़िल्म की थोड़ी बहुत समझ विकसित हुई। फ़िल्मों पर लिखा भी, फ़िल्म लेखन की पुस्तकें भी आईं। फ़िल्म की चकाचौंध भरी दुनिया में बिमल राय की सादगी भरी फ़िल्मों का अपना अलग जॉनर है।
गालिब के शब्द उधार लें तो बिमल राय का अंदाजे बयाँ कुछ और है। उनकी बनाई ‘मधुमति’ में वैजंतीमाला की सादगी भरी खूबसूरती देख कर युवा होते मेरे छोटे भाई ने आश्चर्य से कहा था, क्या बिना तामझाम के कोई लड़की इतनी सुंदर हो सकती है! सच उस समय फ़िल्मों में इतना ग्लैमर न था फ़िर भी बिमल राय अपनी नायिकाओं की खूबसूरती को निखार कर दिखा पाते थे। उनके ग्लैमर को उभार पाते थे। यह एक दूसरी तरह का ग्लैमर होता था। मन में गहरे उतर जाने वाला, मन को सकून पहुँचाने वाला। मन को भड़काने वाला नहीं। सकारात्मक भाव जगाने वाला। सौंदर्य जगाते थे बिमल राय।
फिल्म सुजाता का पोस्टर
- फोटो : मुंबई टीम
फिल्म सुजाता की कहानी और हमारा समाज
‘सुजाता’ फ़िल्म का मन्तव्य कास्टिंग से प्रारंभ हो जाता है। मलबे में खिला खूबसूरत फ़ूल, विशुद्धता का प्रतीक बन कर उभरता है जो पूरी फ़िल्म का भी मन्तव्य है। पूरी फ़िल्म प्रतीकों और कल्पना का एक बेजोड़ नमूना है। फ़िल्म बिम्बविधान को शुरु से साथ लिए चलती है। बताना मुश्किल है ‘सुजाता’ बिमल राय की फ़िल्म है अथवा नूतन की। परिकल्पना बिमल राय की है, तो साकार उसे नूतन ने किया है। इस फ़िल्म को यदि सैल्युलाइड पर लिखी एक सुंदर कविता की संज्ञा दी जाए तो यह अतिशयोक्ति न होगी। ‘सुजाता’ बिमल राय की अंतिम फ़िल्मों में से एक थी। इसके बाद उन्होंने मात्र दो और फ़िल्में ‘परख’ तथा ‘बन्दिनी’ बनाई। ‘परख’ को भी विशिष्ट फ़िल्म होने का दर्जा हासिल है और ‘बन्दिनी’ तो मील का पत्थर है। लेकिन अभी बात करते हैं ‘सुजाता’ की।
‘सुजाता’ की कहानी अशोक कुमार-देविका रानी पर फ़िल्माई गई ‘अछूत कन्या’ से मिलती-जुलती होने के बावजूद इसका ट्रीटमेंट और अंत बहुत भिन्न है। स्वतंत्रता मिले अभी एक दशक से दो साल ऊपर हुए थे लोगों पर गाँधी और उनके अछूतोद्धार का प्रभाव था। लोगों के मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा था। सपने अभी टूटने शुरु नहीं हुए थे। आज की तरह सपने टूटे नहीं थे। स्वतंत्रता के बाद बनी अछूतोद्धार की यह पहली महत्वपूर्ण फ़िल्म है।
फ़िल्म में गांधी प्रमुखता से आए हैं। गांधी घाट पर बैठना पिता उपेंद्रनाथ चौधुरी (तरुण बोस) और सुजाता (नूतन) दोनों को सकूनदेह लगता है। एक बार जब रमा की माँ को अधीर के प्रेम की बात पता चलती है तो वह सारा दोष सुजाता पर मढ़ती है।
सुजाता चारू को बहुत मान देती है, उसका बहुत आदर करती है। जब देखती है कि उसके कारण चारू दु:खी है तो परेशान हो कर सुजाता अपना जीवन समाप्त करना चाहती है, तब उसका पल्लू गांधी के मुरल में अटक जाता है, वह उसे छुड़ाने लगती है और उसकी दृष्टि वहाँ लिखे कोटेशन पर पड़ती है, वहाँ लिखा है, ‘मरें कैसे? आत्महत्या करके? कभी नहीं। आवश्यकता हो तो जिन्दा रहने के लिए मरें।’ बारिश की बूँद गाँधी की आँख से आँसू बन पर टपकती है। इतना संवेदनशील चित्रण हुआ है गांधी का।
आज की सामाजिक विकृतियाँ देख गांधी जार-जार रोते। पता नहीं हम प्रगति कर रहे हैं अथवा पीछे जा रहे हैं। आज यदि विजातीय युवा शादी कर लेते हैं तो पंचायत बिठा कर उनके घर वाले ही उन्हें फ़ंदे से झुला देते हैं। आज भी पढ़े-लिखे, बौद्धिक लोग जाति प्रथा से जकड़े हुए हैं वे एक निम्न जाति और एक उच्च जाति के युवा के प्रेम करने अथवा विवाह की बात सोच नहीं पाते हैं। इस फ़िल्म में बिमल राय पढ़े-लिखे, समझदार लोगों की हिचक दिखाते हैं, क्योंकि उनके मन में सामाजिक-धार्मिक संस्कार जड़ जमा कर बैठे हुए हैं। बुआ जी अनपढ़-दकियानूसी थीं पर वे भी नायक के तर्क के सामने हताश-हार जाती हैं और अपनी समस्त संपत्ति अपने नाती अधीर को देकर तीर्थयात्रा पर चली जाती हैं। उनसे इससे अधिक की उम्मीद की भी नहीं जानी चाहिए।
बिमल राय और सुजाता का ट्रीटमेंट
बिमल राय सादगी और सच्चाई की प्रतिमूर्ति थे उन्होंने साठ के दशक में न केवल अछूत और उच्च सवर्ण का प्रेम दिखाया वरन पूरे परिवार की सम्मति से उनका विवाह भी करवाया। 1859 में बिमल राय ने यह फ़िल्म बनाई उस समय तक वे ‘पहला आदमी’, ‘नौकरी’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘परिणीता’, ‘बिराज बहु’, ‘देवदास’, ‘यहूदी’, ‘मधुमति’ आदि कई नामी फ़िल्में बना कर फ़िल्म जगत में अपना मजबूत झंडा गाड़ चुके थे। ‘पहला आदमी’ तथा ‘नौकरी’ को छोड़ कर सब हिट फ़िल्में थीं।
ये फ़िल्में आज भी किसी निर्देशक की ईर्ष्या एवं चुनौती का कारण बन सकती हैं। वे ऐसी साफ़-सुथरी और सादगी भरी फ़िल्में बनाते थे कि उस समय भी हम बच्चों को ‘दो बीघा जमीन’, ‘देवदास’, ‘मधुमति’, ‘परिणीता’, ‘परख’, ‘बंदिनी तथा ‘सुजाता’ फ़िल्में देखने की अनुमति मिल गई थी।
मातृहीन बालक पंत को प्रकृति में सुकून मिलता था, अनाथ, ममता की प्यासी सुजाता प्रकृति के सानिध्य में अपने मन की शांति खोजती है। प्रकृति प्रेम का इस फ़िल्म से खास नाता है। फ़िल्म की कास्टिंग एक फ़ूल के इर्द-गिर्द होती है, एक ऐसा फ़ूल जिस पर किसी का ध्यन न जाए। यह गुलाब या चमेली का फ़ूल नहीं मलबे पर खिला हुआ फ़ूल है।
निर्देशक पूरी फ़िल्म की थीम शुरु में दर्शक के हाथ में थमा देता है। फ़िल्म के भीतर भी प्रकृति का बहुत सुंदर और संवेदनशील फ़िल्मांकन है। जब नायक (सुनील दत्त) पीछे से आकर नायिका (नूतन) को पुकारता है तो लजीली सुजाता अपने आप में सिमट जाती है। नायिका की भावनाओं को दरशाने के लिए फ़िल्म छूईमुई (लाजवंती) की पत्तियों को सिकुड़ते हुए दिखाती है। जब नायक अपने प्रेम का इजहार करता है तो संकोची नायिका की ओर से समूची प्रकृति झूम उठती है। लताएँ लहराने लगती हैं, उड़हुल के फ़ूल आपस में बतियाने लगते हैं।
प्रकाश और छाया का अनूठा प्रयोग। यह प्रयोग श्वेत-श्याम फ़िल्म को एक खास ऊंचाई प्रदान करता है। ‘काली घटा छाई...’ गीत खिड़की से दीखते आकाश से प्रारंभ हो पूरी प्रकृति में विस्तार पाता है। निर्देशक सुजाता को बार-बार प्रकृति की संगत में ले जाता है, कभी वह पेड़-पौधों को पानी दे रही है कभी बागीचे में गा रही है, कभी बाग में दु:खी, चिंतन-मगन खड़ी है। मनुष्यों द्वारा उपेक्षित सुजाता प्रकृति में शांति पाती है। वह नदी किनारे अपना सुकून पाती है।
‘सुजाता’ का गीत-संगीत और फ़िल्मांकन गजब का है।
- फोटो : Social Media
‘सुजाता’ फ़िल्म की कहानी उतनी विशिष्ट नहीं है जितनी विशिष्टता उसके फ़िल्मांकन में है। उसके ट्रीटमेंट में है। यह बिमल राय का कमाल है कि वे साधारण-सी कहानी को एक ऊँचाई पर ले जाते हैं। हालाँकि कहानी लेखक को भी उस साल का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। कहानी (साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त सुबोध घोष) कुछ यूँ है, प्लेग के दौरान हुई एक अछूत-अनाथ कन्या कुछ लोगों द्वारा एक ब्राह्मण परिवार में पहुँचा दी जाती है। इंजीनियर उपेंद्रनाथ चौधुरी (तरुण बोस) तथा उनकी पत्नी चारू (सुलोचना) धनी लेकिन सहृदय हैं।
सुजाता की हम उम्र अपनी बच्ची रमा (शशिकला) के साथ इस अनाथ बच्ची का वे पालन करते हैं। ममतामयी चारू बच्ची को प्यार करती है मगर अपनी बच्ची जैसा व्यवहार उसके साथ नहीं कर पाती है। उपेंद्रनाथ ने बच्ची का नाम सुजाता रखा है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है, अच्छी जात अथवा अच्छा जन्म। दोनों बच्चियों में अंत तक बहनापा बना रहता है।
रमा खिलंदड़ी है, पियानो बजाना, टेनिस-बैडमिंटन खेलना उसका शगल है। वह सुजाता को अपनी बड़ी बहन मानती है और उसके साथ छोटी बहन-सा व्यहार करती है। रमा को पढ़ाया-लिखाया जाता है जबकि बड़ी होते ही सुजाता दिन-रात घर के काम में लगी रहती है। वह सदा गुमसुम रहती है क्योंकि परिवार से प्रेम मिलने के बावजूद वह अपनी स्थिति जान गई है। परिवार उसे अनाथालय भेजना चाह कर भी भेज नहीं पाता है, मगर माँ उसे बेटी न कह कर ‘बेटी जैसी’ कह कर ही सबसे परिचित कराती है। सुजाता मन मसोस कर रह जाती है। वह माँ के मुँह से बेटी शब्द सुनने के लिए तरसती है।
सुजाता का संगीत और गीत
हिन्दी फ़िल्मों की बात गीत-संगीत के बिना पूरी नहीं हो सकती है। ‘सुजाता’ का गीत-संगीत नायाब है और उनका फ़िल्मांकन गजब का है। याद कीजिए नायक का फ़ोन पर गाया गाना, ‘जलते हैं जिसके लिए...’ जिसका जिक्र मैंने ऊपर किया है। इस गीत के दौरान नूतन के चेहरे के भाव उसके हृदय की समस्त पीड़ा निचुड़ कर आँसू के रूप में उसकी आँखों से ढ़लती जाती है। उसको मिली उपेक्षा, उसकी बेबसी सब नि:शब्द उसके चेहरे से बयान होती है। तलत महमूद के इस गीत के इन आँसुओं में दर्शक भींगता है और सुजाता के प्रेम में सराबोर हो जाता है।
हिन्दी फ़िल्म का बेमिसाल प्रेम गीत है यह। तलत ने बहुत गीत गाए, बहुत सुंदर गीत गाए मगर उनका यह गीत सर्वोत्तम है। अक्सर गीत हिन्दी फ़िल्मों के प्राण हर लेते हैं, मगर कई बार वे उसके प्राण होते हैं। ‘सुजाता’ के गीत कहीं भी फ़िल्म पर थोपे हुए नहीं हैं। वे उसके अंग हैं, प्राण हैं। फ़िल्म के गीत कहानी की भावप्रवणता और संवेदनशीलता को निखार कर आगे बढ़ाते हैं।
हिन्दी फ़िल्मों में एक-से-एक लोरी आपको मिलेगी। ‘सुजाता’ की लोरी ‘नन्ही कली सोने चली...’ का फ़िल्मांकन बहुत अर्थपूर्ण है। चारू अपनी बेटी रमा को लोरी गाकर, थपकी देकर सुला रही है और दूसरे कमरे में उसी की बेटी की उम्र की एक और बच्ची बिस्तर पर अकेली पड़ी हुई है। कुछ बिना कहे चारू का दोनों लड़कियों के प्रति रुख स्पष्ट हो जाता है। पर बच्ची मासूम है, अबोध है, वह अनजाने में अपने पास पहुँचे लोरी के उस स्वर से सम्मोहित हो जाती है और धीरे-धीरे नींद की गोद में चली जाती है।
हां, चारू के मन की कोमलता-संवीदनशीलता को निर्देशक इस गीत के माध्यम से व्यक्त करता है। चारू अपनी बेटी सुलाने के बाद सुजाता के पास आती है और उसे चादर ओढ़ाती है। अपनी बेटी हर हाल में उसकी प्राथमिकता है। आगे चल कर हम चारू के मन की यह दशा कई बार देखते हैं, वह दिल की बुरी नहीं है, पर अपनी बच्ची की कीमत पर सुजाता को नहीं अपना सकती है। उसमें ममता की कमी नहीं है अगर ऐसा होता तो सुजाता कब की अनाथालय पहुँच चुकी होती। जलतरंग की सहायता से गाई गीता दत्त की सुरीली ध्वनि इस लोरी को अद्भुत मधुरता देती है।
और ‘सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा...’ की सुमधुर-सुकोमल तान तो स्वयं सचिन दा ने छेड़ी है। सचिन देव बर्मन ने न केवल इस फ़िल्म का संगीत दिया है वरन अपना स्वर दे कर इसे अमर कर दिया है। और यह मधुर गीत मुझे उनकी वाणी में सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है। वह शाम भुलाए नहीं भूलती है जब एडीटोरियम में एस. डी. बर्मन ने ढ़ेर सारे गीत सुनाए और हम मंत्रमुग्ध बैठे सुनते रहे। ‘सुन मेरे बंधु...’ गीत के बोल जितने सार्थक हैं उसका फ़िल्मांकन उतना ही सुकोमल तरीके से हुआ है।
नदी बह रही है, हल्की-हल्की लहरें किनारे को छू रही है। नदी के मंद बहाव को अनुभव किया जा सकता है, इसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। किनारे पर नायक-नायिका चुप बैठे हैं, क्या बोले? कैसे बोले? जैसे वे चुप हैं, उनका प्रेम भी वैसा ही नि:शब्द है। उनके प्यार को वाणी देता है एक माँझी जो दूर कहीं गाता जा रहा है। पूरी फ़िल्म में चुप नायिका अपने प्रेम को कैसे अभिव्यक्त करे? उसके मन की बात कहता है एक माँझी। प्रेमिका का समूचा अस्तित्व अपने प्रेमी के लिए उत्सर्ग है, सब कुछ मौन में समर्पित है। मौन की अपनी मुखर भाषा में। सचिन दा की जादू भरी आवाज का जादू यहाँ खूब चला है।
और आशा भोंसले का गाया ‘काली घटा छाए...’ तो कमाल का गीत है और उसका फ़िल्मांकन भी कमाल का है। काली घटा के साथ उठते नायिका के दिल के जज्बात सीधे दर्शक के दिल में उतर जाते हैं। सुजाता बादलों की गड़गड़ाहट सुन खिड़की खोलती है जिससे बादल और उड़ते पंछी नजर आते हैं और उसके मुँह से बोल फ़ूटते हैं, ‘ऐसे में कहीं कोई...’ वह चुपचाप दरवाजा बंद कर लेती है, उसने दूसरों से खुद को अलग कर प्रकृति से स्वयं को जोड़ लिया है और तब वह गुनगुनाती है, गाती है, ‘काली घटा छाए...’ वह कविता की पत्रिका ‘दीपिका’ उठा कर सीने से लगाती है, खिड़की के नजदीक आकर एक बार फ़िर बाहर का बादल भरा आकाश निहारती है और फ़िर अपनी प्रिय जगह बागीचे में आ जाती है। उसका लहराता आँचल, हिलता परदा, पौधे-फ़ूल सब उसके मन की भावना की गवाही दे रहे हैं। उसे प्यार हुआ है। उसकी स्थिति ऐसी है कि न वह जागी हुई है और न सोई हुई है। वह सीढ़ियाँ चढ़ कर छत पर पहुँच जाती है। उसका सीढ़ियाँ चढ़ना सांकेतिक है।
इसी तरह आशा भौंसले और गीता दत्त दोनों की आवाज में गाया मस्त बेफ़िक्र गीत, ‘बचपन के दिन भी क्या दिन...’ बहुत दिन तक मन में गूँजता है। मजरूह सुलतानपुरी के लिखे ‘सुजाता’ फ़िल्म के गीत सदाबहार हैं। और इसी तरह बिमल राय ने मानवीय स्पर्श देने के लिए रवींद्रनाथ टैगोर की नृत्य-नाटिका ‘चांडालिका’ का खूबसूरत उपयोग इस फ़िल्म में किया है। यहाँ बाऊल संगीत-नाट्य भी है। लोक का सटीक उपयोग।
निर्देशक बिमल रॉय की नायिका प्रधान फ़िल्म
- फोटो : सोशल मीडिया
क्यों खास है यह फिल्म?
फ़िल्म की कहानी में असल दिक्कत तब आती है जब रमा का विवाह तय होता है। यहीं से कहानी में ट्विस्ट आता है। बहुत दिन से रिश्तेदारी के एक ब्राह्मण परिवार, बुआ जी के पोते अधीर से उसके विवाह की बात चल रही है। वे लोग चाहते हैं कि सुजाता की शादी रमा से पहले कर दी जाए ताकि रमा के विवाह के वक्त सुजाता दिखाई न दे और उन लोगों को समाज में किसी अप्रिय स्थिति का सामना न करना पड़े। चारू को भी अपनी बेटी रमा के विवाह में सुजाता एक बाधा की तरह नजर आने लगती है।
वह भी किसी तरह सुजाता की शादी कर उससे छुटकारा पाना चाहती है। सुजाता के लिए आए रिश्ते का क्या होता है, यह एक अलग किस्स है मगर कहानी में एक और ट्विस्ट तब आता है जब रमा के लिए तय लड़का अधीर सुजाता को चाहने लगता है। इतना ही नहीं वह बुआ जी अर्थात अपनी नानी की मर्जी के खिलाफ़ सुजाता से विवाह करने का एलान कर देता है। प्रगतिशील विचारों का अधीर जात-पाँत नहीं मानता है। निर्देशक का कमाल है कि वह इस नायिका प्रधान फ़िल्म में नायक को हावी नहीं होने देता है। यह सुनील दत्त के अभिनय और व्यक्तित्व का कमाल है कि वे कहीं भी नूतन पर हावी होने का प्रयास नहीं करते हैं। उन्होंने अंडरप्ले करते हुए बेहतरीन शॉट्स दिए हैं।
बिमल राय ने अपनी कई फ़िल्मों में मजबूत स्त्रियां गढ़ी हैं। फ़िल्म ‘सुजाता’ की बात करें तो यहाँ सुजाता जैसी स्त्री है जो अपने अस्तित्व को जानना-समझना चाहती है। वह जानना चाहती है उसे बेटी न कह कर बेटी जैसी क्यों कहा जाता है। वह चारू की आँख में आँख डाल कर अपनी पहचान जानने के लिए प्रश्न करती है। वह चुप रहती है लेकिन उसके मौन में उसके मुखरता है। वह पालित अभिभावकों को बहुत प्यार करती है, उनका कोई नुकसान नहीं करना चाहती है। उनके लिए अपने प्रेम को बलिदान करने को तत्पर है।
फ़िल्म दिखाती है कि वह अपना खून दे कर चारू की प्राण रक्षा करती है और इस कार्य से वह चारू का दिल जीतने, उसे परिवर्तन करने में भी सफ़ल होती है। चारू न केवल उसे बेटी स्वीकारती है वरन खुशी-खुशी अधीर से उसकी शादी करवाती है। सुजाता कई बार टूटने की कगार पर पहुँचती है मगर फ़िर उठ खड़ी होती है। वह अपने प्यार, लगन, समर्पण, बलिदान से सबका दिल जीतती है।
सुजाता के अलावा रमा है। रमा सुजाता की हम उम्र है, वह सुजाता को अपनी बड़ी बहन मानती है और उससे वैसा ही व्यवहार करती है। जब उसे सुजाता के प्रति अधीर के आकर्षण का पता चलता है तो वो बहुत खुश है और दोनों को मिलने का अवसर देती है। चूँकि वह चौधुरी परिवार की अपनी बेटी है अत: उसे पढ़ाया-लिखाया गया है, यह खुशमिजाज अल्हड़ लड़की खिलंदड़े स्वभाव की है जिसे पियानो बजाने में आनंद आता है।
रमा की मां चारू एक संवेदनशील स्त्री है वह सुजाता को प्यार करती है मगर सुजाता उसकी बेटी के रास्ते की बाधा बने यह इस माँ को सहन नहीं है। चारू के कारण सुजाता को इस घर में शरण मिली हुई है। वह परम्पराओं से बंधी हुई है। वह बुरी स्त्री नहीं है पर समाज के कहने-सुनने की चिंता उसे है। बुआ जी के सिखाए पर वह चाहती है कि सुजाता की शादी रमा से पहले हो जाए। जब उसे पता चलता है कि सुजाता से शादी करने को आया व्यक्ति न केवल उम्रदराज है वरन वह किसी दृष्टि से सुजाता के योग्य नहीं है तो वह उस व्यक्ति को भगा देती है। सुजाता का रक्त पा कर जब वह पुनर्जीवित होती है तो उसका हृदय परिवर्तित होता है। वह सुजाता को हृदय से अपनाती है।
फ़िल्म ‘सुजाता’ में परम्परागत, रूढ़िवादी स्त्री के रूप में बुआ जी को प्रस्तुत किया गया है। हिन्दी फ़िल्मों में खलनायिका के रूप में प्रसिद्ध ललित पवार इस फ़िल्म में खलनायिका न हो कर अंधविश्वास की अपनी बेड़ियों में जकड़ी स्त्री के रूप में चित्रित है। अधीर और रमा यदि नए जमाने के हैं तो चारू उसकी पिछली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है। उससे भी एक पीढ़ी पहले की बुआ जी पुरानी सोच को दिखाती हैं।
वे बिना सिर-पैर की बातों पर आंख मूंद कर विश्वास करती हैं, तर्क को भावनाओं से काटती हैं। नाती अधीर को बेहद प्यार करने के बावजूद उसकी प्रगतिशील सोच को समझ और स्वीकार नहीं पाती हैं। उनसे बदलने की उम्मीद करना उचित नहीं है। वे रमा और सुजाता में उनके रूप-गुण के कारण भेदभाव नहीं बरतती हैं। वे सुजाता से उसके अछूत परिवार में जन्म लेने के कारण घृणा करती हैं। वे अछूत का छुआ खा-पी नहीं सकती हैं। निर्देशक जबरदस्ती उनका हृदय परिवर्तन नहीं कराता है बल्कि वे हार पर काशीवास के लिए चली जाती हैं।
सुजाता और बिमल रॉय
- फोटो : Social media
बिमल राय के सामाजिक सरोकार
बिमल राय स्वभाव से दयालु थे सामाजिक अत्याचार या अन्याय स्वीकारना उनके स्वभाव में न था। उन्होंने ‘सुजाता’ पूरे मन से बनाई। नतीजन अछूत समस्या पर यह अब तक कि बनी सर्वाधिक संवेदनशील फ़िल्म है। उन्होंने एक अछूत और एक ब्राह्मण के विवाह संबंध को दिखाया आज भले ही यह असंभव न लगता हो लेकिन जब फ़िल्म बनी थी उस समय यह एक असंभव विचार था। फ़िल्म में उन्होंने दिखाने की चेष्टा की है कि जाति जन्म से नहीं वरन वातावरण से निर्मित होती है।
व्यक्ति जिस वातावरण में रहता है, उसका जैसा लालन-पालन होता है वैसी ही उसकी जाति हो जाती है। वे पात्र में मुंह से कलवाते हैं, जब एक ब्राह्मण का बच्चा शूद्र परिवार में पल कर शूद्र बन जाता है तो उच्च जाति के परिवार में पल कर निम्न जाति का बच्चा निम्न कैसे रह जाएगा। इतना ही नहीं सबमें, उच्च और निम्न जाति के लोगों में समान रुधिर प्रवाहित होता है यह भी सिद्ध कर दिया। सबमें एक जैसा रक्त दौड़ता है इस बात को बाद में एक अन्य फ़िल्म में नाना पाटेकर बहुत क्रूर तरीके से सिद्ध करते हैं। बाद की फ़िल्म में अंगुली कुचल कर दिखाया गया है कि सबका खून लाल होता है। ‘सुजाता’ ने यह रक्तदान करके सिद्ध किया है। हालाँकि आज के दर्शक को यह थोड़ा अटपटा लगेगा। मूल कहानी में भी यह नहीं है। यह बिमल राय की अपनी कल्पना है, जातिप्रथा का उपहास करने की।
‘सुजाता’ की श्वेत-श्याम रंगों की छायाकारी और सादगी मन मोह लेती है। इसका श्रेय कमल बोस की कुशल सिनेमाटोग्राफ़ी को जाता है। क्लोज शॉट्स, लॉन्ग मिड शॉट्स, मिड शॉट्स, व्याज ओवर फ़िल्म की भावनाओं को दर्शक तक पहुँचाने में सफ़लता में योगदान करते हैं। न आज के जमाने की तड़क-भड़क भरी सेट सज्जा, न मेकअप का भड़काऊ प्रदर्शन। सादगी का अपना ग्लैमर होता है जो इस फ़िल्म में भरपूर है। भावप्रवण कलाकार नूतन का अपना ग्लैमर है। इस फ़िल्म के लिए उनका मेकअप सांवली लड़की के रूप में किया गया है।
वे ‘डस्की ब्यूटी’ लगती हैं। बिमल राय के यहां ही उन्होंने ‘बन्दिनी’ में भी नायिका के रूप में काम किया है। इसमें शक नहीं वे सुजाता के रूप में अधिक खुली-खिली हैं। दोनों फ़िल्मों में उनका अभिनय चरम पर है। अछूत, अकेली, उदास, मन से दु:खी सुजाता और उसके मन की कचोट सीधे दर्शक के मन में उतर जाती है। सुजाता (नूतन) की एक नजर इतना कुछ कह जाती है जिसके लिए किसी अन्य अभिनेता को लंबे-लंबे संवाद बोलने पड़ेंगे और शायद तव भी बात न बने। वे आँखों से ही दर्शक से संवाद जारी रखती हैं और मौअन रह कर अपनी बात बखूबी कह जाती हैं।
फ़िल्म कई बार सूक्तियों का उपयोग करती है। कभी गाँधी के विचार दिखाती है, कभी अधीर सुजाता के मन को ऊँचा उठाने के लिए कहता है, ‘आत्मनिन्दा आत्महत्या से भी बड़ा पाप है।’ जब यह फ़िल्म बनी थी लोगों के मन में असंतोष पनपना प्रारंभ नहीं हुआ था, उनके मन में एक आशा थी, सामाजिक न्याय की धारणा थी। शायद इसीलिए निर्देशक कहीं भी सुजाता से विद्रोह नहीं करवाता है। चौधुरी परिवार के लोग सुजाता से प्यार करते थे।
सुजाता उनकी आश्रिता थी, यह भी ध्यान देने की बात है कि वह पढ़ी-लिखी नहीं थी, स्वावलम्बी नहीं थी इसीलिए भी विद्रोह का सवाल नहीं उठता है वह बार-बार गांधी की शरण में जाती है। लोगों के हृदय परिवर्तन की प्रतीक्षा करती है। अधीर उससे कहता है, वह उपेन बाबू की बेटी है और रहेगी। अधीर, उपेन और रमा सब सुजाता के पक्ष में हैं। बाद में पुरानी पीढ़ी के विचार में भी परिवर्तन आता है। बुआ जी से बदलने की आशा नहीं की जानी चाहिए इसीलिए निर्देशक उन्हें तीर्थयात्रा पर भेज कर आगे बढ़ जाता है।
पूरी फ़िल्म में प्रतीकों-बिम्बों का प्रभावशाली उपयोग किया गया है। नदी का मंद प्रवाह, अलस लहरें, हवा का कभी धीरे और कभी जोर से बहना। जब सुजाता की आशाएँ मर जाती हैं तो उसका कमरे की लाइट का स्विच ऑफ़ करना, रमा (बाद की फ़िल्मों की खलनायिका शशिकला) का जात-पात के पार जा सुजात को प्यार करना। अपनी इस संकोची, लजीली दीदी की आड़ बन कर खड़ी होना। अधीर के सुजाता के प्रति प्रेम से ईर्ष्या न कर खुश होना। पूरी उदास फ़िल्म में नटखट, प्यारी, बेफ़िक्र रमा खुशनुमा हवा का झोंका है। उसकी मासूम चंचलता सुजाता की स्थिरता का विलोम रचती है।
फ़िल्म की संवेदनशीलता अधीर और सुजाता के प्रेम दृश्यों में खिल कर आई है। लगता है सैल्यूलाइड पर कविता रची गई हो। नबेन्दु घोष की स्क्रीनप्ले वाली इस फ़िल्म को उस वर्ष के चार – सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशन, सर्वश्रेष्ठ कहानी – फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार प्राप्त हुए। पाल महेंद्र के संवाद वाली फ़िल्म ‘सुजाता’ मानवीय पक्षधरता की फ़िल्म है। एक ऐसी फ़िल्म जो कभी पुरानी नहीं पड़ती है। आज भी एक सार्थक फ़िल्म देखने का सुखद अनुभव प्रदान करती है।
अभी जब आलेख समाप्त किया तो याद आया आज नूतन का जन्मदिन है। अच्छा संयोग है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।