नूतन का अभिनय आपको बेसाख्ता उनकी तरफ खींचता है।
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नूतन की इन्हीं असंख्य बार दिखी खूबियों के चलते उस अनजान शख्स के लिए मन श्रद्धा भर जाता है, जिसने पहली बार उनके लिए 'नूतन:एक संपूर्ण अभिनेत्री' लिखा था। 'लाट साब' और 'पेइंग गेस्ट' की चुलबुलाहट से लेकर 'सरस्वतीचंद्र' या 'मेरी जंग' के दर्द को नूतन ने जिस तरह अजर-अमर बना दिया, वह अद्भुत है। 'छलिया' एक औसत फिल्म थी। यदि उस दौर के इस जैसे ही बाकी चित्रों को आपने देखा हो तो यह जल्दी ही समझ आ जाता है कि छलिया में भी नायिका अंततः पति के साथ ही चली जाएगी।
मेरा मत है कि निर्देशक मनमोहन देसाई एक दृश्य से इस फिल्म का अंत 'भीतर तक छू जाने वाला' बना सकते थे। चित्र की शुरूआत में ट्रेन की खिड़की की धुंध को साफ करती हुई नूतन का मासूमियत के साथ खिलखिलाता चेहरा दिखता है। यदि फिल्म के अंत में पति के साथ जाती नूतन को मुड़कर आखिरी बार राज कपूर को देखते हुए बताया जाता तो छलिया के शुरू वाले और अंत वाले उनके किरदार के भावों का जबरदस्त वैपरीत्य दर्शकों के दिमाग को यकीनन मथ सकता था।
नूतन की अभिनय क्षमता के चलते यह पूरी तरह संभव था। यह प्रयोग वैसे ही किया जा सकता था, जैसा सत्यजीत रे ने 'देवी' में किया था। फिल्म का एक दृश्य सीधी-सादी गृहस्थन शर्मिला टैगोर द्वारा बच्चे को सुनाई जा रही कहानी के पहले वाक्य 'एक थी डायन' पर पर खत्म हो जाता है।
फिर फिल्म के अंतिम पलों में उसी बच्चे की मौत पर उसकी मां जब शर्मिला टैगोर के लिए कहती है, 'उस डायन ने मेरे बेटे को मार डाला' तो आप आरंभ तथा अंत के दो दृश्यों के बीच वाले इस कंट्रास्ट से हिल जाते हैं। ये दोनों ही चित्र वर्ष 1960 में बने थे और इस एक दृश्य की बदौलत ही सार्थक सिनेमा तथा मुख्य धारा की सिनेमा के बीच की सोच के विराट अंतर को समझा जा सकता है।
नूतन का अभिनय आपको बेसाख्ता उनकी तरफ खींचता है। ठीक वैसे ही, जैसे आप किसी प्लेटफॉर्म के किनारे पर खड़े हों और ठीक बगल से गुजरती ट्रेन आप को अपनी तरफ खींचती है। मैं हमेशा जिस तरह ऐसी ट्रेन से बचता आया, वैसा ही नूतन की फिल्मों को देखते समय भी बचता हूं। क्योंकि यदि उनके द्वारा निभाए गए किसी एक चरित्र की ही 'चपेट' में आ गया तो फिर नूतन के बाकी वाले चरित्रों का रसास्वादन कैसे कर सकूंगा!
'यादगार' फिल्म में 'जिस पथ पे चला' में नायक के पदचिन्ह से लेकर उसकी पेशानी तक के लिए समर्पण का जो भाव नूतन ने दिखाया, वह उनके अभिनव अभिनय की एक और मिसाल है। नूतन मानव जीवन के उस पथ पर चली गई, जहां से फिर कोई वापस नहीं आता है, लेकिन उस पथ पर बेहद उम्दा अदाकारी के जो पदचिन्ह उन्होंने छोड़े हैं, वह आने वाले कई युगों तक किरदार में ढल जाने की मिसाल बनकर कायम रहेंगे।
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