उन्हीं दिनों एक बहुत ही रोचक किस्सा हुआ, जब पापा ने फिर से मुझे छत पर से आवाज लगाई और बोले बेटा यह कौवा इतना परेशान क्यों है? हमारे घर में जो गुलमोहर का पेड़ है उस पर काफी देर से एक कौवा शोर मचा रहा था, जब मैंने ध्यान से देखा तो पता चला कि वो एक शिकारी को भगाने की कोशिश कर रहा है क्योंकि पास में ही एक घोंसले में उसके बच्चे हैं। मैं यह बात बता ही रही थी कि पापा बोले, पर ये बच्चे कौवे के तो नहीं लगते, काफी अलग हैं। फिर क्या था जब मैंने ध्यान से अपनी दूरबीन से देखा तो पता चला कि वह कोयल के बच्चे थे जो कांव-कांव करना सीख रहे थे। मैंने मम्मी को भी आवाज लगाई और फिर कोयल एवं कौवे के इस व्यवहार के बारे में बताया, जिसे 'ब्रूड पैराटिसिस्म' कहा जाता है।
यह एक प्रकार का परजीवी व्यवहार है, जिसमें कोयल अपने अंडे कौवे के घोंसले में देती हैं और फिर कौवा उन्हें अपने अंडे समझ कर उनकी देखभाल करता है। यह एक बहुत ही अद्भुत व्यवहार है जो कोयल की लगभग सभी प्रजातियों में पाया जाता है। इस घटना के बाद रोज शाम को मेरे मम्मी पापा गुलमोहर की ओर अपनी कुर्सी करके बैठ जाते थे और फिर उस घोंसले में होने वाली सभी गतिविधियों को देखते थे। अब मैं वापस देहरादून आ गई हूं, पर टेरेस बर्डिंग का यह सिलसिला आज भी जारी है, हर शाम ग्वालियर और देहरादून में चाय की चुस्कियों के साथ अब पक्षियों का भी इंतजार रहता है और उसके बाद उन पक्षियों पर हमारी चर्चाओं का।
सृष्टि मोदी, भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून में शोधकर्ता है। इनकी रुचि कीस्टोन प्रजातियों के परस्पर प्रभाव को समझने, टेक्सोनोमी, बिहेवियर एवं कंजर्वेशन जेनेटिक्स में है। वर्तमान में यह महाराष्ट्र के पांच व्याघ्र प्रकल्प में बाघ, तेंदुआ एवं ढोल पर आवास विखंडन से होने वाले दुष्परिणामों को जेनेटिक्स के माध्यम से समझने एवं रोकने के संदर्भ में शोध कर रही है।
यह श्रृंखला ‘नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन’ द्वारा चालित ‘नेचर कम्युनिकेशन्स’ कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से संबंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है।