पूरा दिन काम करके ये सभी चिड़िया जरूर थक जाती होंगी
- फोटो : विक्रम सिंह
मुझे हमेशा से ये लगता था के इंसान के बच्चों को पालना बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन जब मैंने इस मैना के जोड़े को अपने पांच भूखे बच्चों का पेट हर चार से पांच मिनट बाद भरते हुए देखा तो मेरा चेहरा देखने वाला हो गया था।
हर बार दोनों अपनी चोंच में अलग-अलग तरह के कीड़े लाकर इनके मुंह में ठूसते रहे। मैंने दोपहर से अंधेरा होने तक इनको कैमरे में कैद करने का सोचा। इनके खाने में ये सब चीजें शामिल थी, हरे, भूरे, पीले, सफ़ेद, काले रंग की ढेर सारी इल्लियांं, झींगुर, सूखे हुए केंचुए, चेरी का फल, ताज़ा टिड्डे, पतंगे। एक नई चीज जो मुझे अपनी बनाई गई वीडियो में देखने को मिली वो यह थी कि चिड़िया अपने बच्चों को पत्थर के टुकड़े भी खिलते हैंं।
अगर इन भुक्खड़ बच्चों के एक दिन के खाने का मेनू कार्ड बनाया जाए तो वो कुछ इस तरहं का होगा: (सुबह छह से शाम के छह बजे तक)
इल्लियांं: औसतन हर दस मिनट में तीन बार इल्लियांं खिलाना। हर बार में औसतन छह इल्लियांं, तो दस मिनट में अठारह इल्लियांं चट। हर घंटे में एक सोह छयासी इल्लियांं। इस तरह बारह घंटे में दो हजार दो सोह बत्तीस इल्लियांं। इनमे कुछ सोह झींगुर, टिड्डे, पतंगे भी जोड़ दे तो शायद आप अंदाजा लगा सकते है कि बिना बाजुओं के भी ये इतना कुछ कर लेती हैं।
इसी तरह एक और लंबी सफेद पूंछ वाली चिड़िया जिसको दूधराज (एशियाई पैराडाइस फ्लैकात्चेर) कहते हैं, के जोड़े को इसी मौसम में दोपहर के वक्त एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाते हुए देखा जा सकता है।
नर, हलके पीले-भूरे रंग की मादा के पीछे भागता रहता है, और ऐसा लगता है के कोई जंगल में सफेद रंग के झंडे को बीच-बीच में लहरा रहा हो। बेचारे इस सफेद सुंदर पक्षी का भी वही हाल होगा जो इस मैना का हुआ (मेरा मतलब अपने भुख्खड़ बच्चो का पेट पालने से है)।
इस समय अपने परिवार को और आगे बढ़ाने का जिम्मा एक और चिड़िया लेती है, जिसको देख कर ऐसा लगता हो मानो वो धुप से बचने के लिए आंखों में काला चश्मा पहने घूमती हो।
मुझे इनके चेहरे को देख कर सच में बहुत हंसी आती है, कई बार लगता है के मानोंं ये किसी खुफिया अभियान का हिस्सा हों, या ये इतना ज्यादा तनाव में रहती है कि इनकी आंखों के आस-पास काले दाग (डार्क सर्किल) पड़ गए हों। मैं बात कर रहा हूं मोर लिटकुरी (वेरडिटेर फ्लाईकेचर) नामक एक और चिड़िया की। इस जोड़े को जमीन से कीड़े-मकोड़े चुनते हुए देखा जा सकता है।
पूरा दिन काम करके ये सभी चिड़िया जरूर थक जाती होंगी क्यूंकि शाम होते होते अक्सर मैंने इन्हे पानी के छोटे -छोटे गढ़ो में नहाते हुए, पेड़ों के सबसे ऊंची छोटी पे, बिजली की तारों पे आराम फरमाते हुए देखा है। मैं भी इनको दिन भर देख के जब शाम को चाय पिने के लिए बाहर बैठता हूं तो अबाबील (बार्न स्वालो) चिड़िया जो अक्सर चार से पांच के झुंड में होती है, तारों पे बैठ जाती है।
इनको देख के ऐसा लगता है के जैसे ये अपनी थकान मिटने के साथ साथ अपने आप को सवारती भी रहती है। कभी कभी तो मैं ये भी सोचता हूं के अगर इनके हाथ होते और ये भी कंघी का उपयोग करते, तो कितना ही मजा आता इनको देखने में।
इन सभी लाजवाब, बेहद मेहनती और समझदार पक्षियों को देख कर मैंने अपना ये समय बहुत ही अच्छी तरह से गुजार लिया। लेकिन एक बात मेरे मन में बहुत ही चिंता पैदा करती जा रही है, और वो है हमारे आस पास काटे जा रहे पेड़ों की।
इन सभी उड़ने वाले पक्षियों, जो की लाखों-करोड़ो सालो से और यहाँ तक की हमारी प्रजाति के आने के भी लाखों सालो के पहले से इन्हीं पेड़ों पे अपना परिवार बनाती आई हैं, हम बिना उन से पूछे, बिना उनके बारे में सोचे, सिर्फ एक तेज धार वाले उपकरण को इस्तेमाल कर के कुछ ही पलों में उस पेड को जिसकी उम्र शायद हमसे भी ज्यादा हो, बहुत बेरहमी से काट फेंकते हैं।
मुझे डर लगता है अपनी आने वाली पीढ़ी के बारे में सोच कर, के क्या वो भी कभी मेरी तरह शाम को चाय पीते हुए इन चिड़ियों को देख पाएंगे भी या नहीं?
लेखक विक्रम सिंह एक प्रकृतिवादी और जीवन विज्ञान में खास रुचि रखते हैं। 2017 से लाइफ मीट्स द लेंस नामक परियोजना के अंतर्गत वह स्कूली बच्चों तथा बड़ों को जैवविविधता के बारे में प्रोत्साहित कर रहे हैं। साथ ही अपने गांव में पाए जाने वाली जैवविविधता का पिछले 4 वर्षों से अवलेखन भी कर रहे हैं। उन्हें 2019 और 2020 में नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी की तरफ से स्कूल के बच्चों को जैवविविधता की तरफ प्रोत्साहित करने के लिए अनुदान भी प्राप्त हुआ।
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