देश की आजादी के लिए भगत सिंह ने खुद के प्राण न्योछावर क दिए थे।
- फोटो : Twitter/@Singhfarmer1313
22 अक्टूबर 1929 के ट्रिब्यून (लाहौर) में प्रकाशित
दुनिया की आजादी का इतिहास हो या फिर भारत की स्वतंत्रता का लंबा संघर्ष, युवाओं की शक्ति और साहस से गुलामी की बेड़ियां पिघली हैं। इस बात को भगत सिंह 23 वर्ष की आयु में जान चुके थे इसलिए आजादी की मशाल कोने कोने में पहुंचाने की ज़िम्मेदारी वे युवा पीढ़ी को सौंपने की वकालत करते थे।
भगत सिंह का (मैं नास्तिक क्यों हूं एवं अन्य लेख) शहादत के पहले साथियों को अंतिम पत्र 22 मार्च 1931
साथियों,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए। मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूं कि मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है। और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियां ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया। इतना ऊंचा की जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊंचा मैं हरगिज नहीं हो सकता।
आज मेरी कमजोरी जनता के सामने नहीं है। अगर मैं फांसी से बच गया तो वह जाहिर हो जाएंगी और क्रांति का प्रतीक चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा। या संभवतः मिट ही जाए। लेकिन दिलेराना ढंग से हंसते-हंसते मेरे फांसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरजू किया करेंगी।
वहीं, देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी की क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी। हां, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हजारवां भाग भी पूरा नहीं कर सका।
अगर स्वतंत्र जिंदा रह सकता तब शायद उन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता। इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फांसी से बचे रहने का नहीं आया। मुझसे अधिक भाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।
आपका साथी- भगत सिंह
निसंदेह भगत सिंह का यह सन्देश भारत के युवाओं को सन्देश भी है और हिदायत भी। भारत की मिट्टी में जन्में शेर का सपना सिर्फ़ आज़ादी नहीं बल्कि आजादी के साथ सामाजिक न्याय और शोषण मुक्त स्वतंत्रता थी जो मानवता से भरी हुई हो।
बहुत गहरा सन्देश है भगत सिंह का जीवन, जिसे युवाओं को समझना और अमल में लाना होगा, स्वंम से पहले देश है और अपने सुख से पहले राष्ट्र हित। तभी उनका सन्देश सही मुकाम हासिल कर पाएगा और उनकी शहादत सही मायने में सार्थक हो पाएगी। भारत की आजादी, एकता और अखंडता को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी अब देश के युवाओं पर है। जय हिन्द!
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