बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में सुधार की जरूरत
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कोरोना महामारी और यूक्रेन संकट का भी असर
बांग्लादेश की मौजूदा आर्थिक स्थिति पर कोरोना महामारी और यूक्रेन संकट ने भी व्यापक असर डाला है। इसके परिणामस्वरूप बिजली और ईंधन की कीमतों में बड़ी वृद्धि हुई है। मई 2023 तक ढाका में मुद्रास्फीति दर पिछले वर्ष के 5.7 प्रतिशत से बढ़कर 9.24 प्रतिशत हो गई। इसके अलावा, बांग्लादेश का भुगतान संतुलन (बीओपी) घाटा भी देश के लिए लगातार आर्थिक चिंता का विषय है। बीओपी घाटा 2022 में 5.3 बिलियन डॉलर से बढ़कर 7.2 बिलियन डॉलर हो गया है। इसके कारण बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार प्रभावित हुआ है। विदेशी मुद्रा भंडार 30 अरब डॉलर से नीचे गिरकर 29.85 अरब डॉलर पर आ गया है।
बांग्लादेश के लिए एक महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा स्रोत रेमिटेंस (प्रवासियों द्वारा भेजे जाना वाला धन) है। इसमें भी 16.2% की गिरावट दर्ज की गई है। इसके कारण चुनौतियां और भी जटिल हो गई हैं। रेडीमेड कपड़ों (आरएमजी) के निर्यात में भी गिरावट ने बांग्लदेश को परेशानी में डाला है। इसमें भी अप्रैल 2023 में 15.4% की गिरावट आई है।
अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए शेख हसीना सरकार ने जो कदम उठाए हैं उस पर तमाम देशों की नजर है क्योंकि जिस तरह के कदम सरकार उठा रही है वे कई पड़ोसी देशों के लिए आत्मघाती भी साबित हुए हैं। सरकार ने सबसे बड़ा कदम उठाया है विदेशी ऋण लेने की तरफ। वित्तीय वर्ष 2023 की दूसरी तिमाही में औसत बाहरी उधारी में 3.35 बिलियन डॉलर से अधिक की वृद्धि हुई है। ढाका ने हाल ही में विश्व बैंक से 2.25 बिलियन डॉलर, आईएमएफ से 4.7 बिलियन डॉलर और एडीबी से 3.0 बिलियन डॉलर के ऋण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।
आईएमएफ, विश्व बैंक और एडीबी जैसे आर्थिक संगठनों के साथ सरकार की भागीदारी को मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक संकट को दूर करने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय संगठनों से कर्ज लेना एक राजनीतिक रणनीति का संकेत भी देती है। पर इन सबके अलावा कर्ज के मामले में चीन से नजदीकियों ने बांग्लादेश के भविष्य के लिए कई गंभीर प्रश्न भी पैदा किए हैं।
कहीं चीन के जाल में न फंस जाए बांग्लादेश?
दरअसल चीन की विस्तारवादी नीति का सबसे अहम हिस्सा उसका कर्ज जाल (डेब्ट ट्रैप) है। इसके तहत वह गरीब और आर्थिक संकट से जूझ रहे देशों को भारी भरकम कर्ज देकर उन्हें ऐसे मकड़जाल में फंसा देता है जहां से निकलना आसान नहीं। पिछले साल श्रीलंका के मामले में पूरा विश्व यह देख चुका है। श्रीलंका जब कर्ज नहीं चुका पाया तो चीन ने उसका हंबनटोटा पोर्ट ही अगले 99 साल के लिए लीज पर रख लिया।
पाकिस्तान को भी चीन ने कर्ज के बोझ तले इतना दबा दिया है कि वहां कभी भी कुछ कर सकता है। इसीलिए हाल के दिनों में शेख हसीना से चीन की नजदीकियों के कारण सवाल उठना लाजिमी है।
असल में चीन गरीब देशों को इतना बड़ा कर्ज जानबूझकर देता है। उसे यह अच्छी तरह मालूम है कि वह देश कर्ज नहीं चुका पाएगा। ऐसे में वह उस देश के संसाधनों को परोक्ष और अपरोक्ष रूप से अपनी विस्तारवादी नीतियों के लिए उपयोग में लाता है।
हालांकि, पिछले दिनों एक मीडिया इंटरव्यू में शेख हसीना ने स्पष्ट कहा था कि हम सभी के करीब हैं, चाहे चीन हो या अमेरिका। जो भी हमें हमारे विकास कार्यों में सहयाता कर रहा है हम उनके साथ हैं। चीन भी हमारा एक बड़ा पार्टनर है। साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया था कि हमने किसी से भी फिजूल में कर्ज नहीं लिया है।
निश्चित तौर पर बांग्लादेश सरकार अपने तमाम आर्थिक प्रयासों से बेहद कम विकासशील देशों (एलडीसी) की श्रेणी से आगे बढ़ने की नीति पर काम कर रही है। पर यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या बांग्लादेश चीन की आर्थिक ऋण जाल रणनीति से सफलतापूर्वक छुटकारा पा लेगा या फिर श्रीलंका और पाकिस्तान की तरह अपना हाल कर लेगा?
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