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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: निकरागुआ का सिनेमा- डॉक्युमेंट्री तथा फीचर दोनों में माहिर

सार

आजकल निकरागुआ में फिल्म निर्माण निजी हाथों में है क्योंकि सरकार के ओर से सहायता की कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्में बन रही हैं। 2008 में बनी फिल्म ‘ला युमा’ को 2011 में ऑस्कर पुरस्कार के लिए यहां से भेजा गया था, इसे 7 अन्य पुरस्कार मिले।
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निकरागुआ का सिनेमा - फोटो : Istock
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विस्तार
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निकरागुआ लैटिन अमेरिका का एक छोटा-सा देश है। सेंट्रल अमेरिका का यह देश प्रशांत महासागर तथा कैरिबियन सागर के बीच स्थित है तथा अपने अनोखे प्राकृतिक रूप- नहरों, ज्वालामुखियों तथा समुद्र तट के लिए जाना जाता है। लैटिन अमेरिका के इस सबसे अधिक गरीब देश का नाम यहां के प्रमुख मूल वासियों निकाराओ के नाम पर पड़ा है। एक जमाने में यह जनजाति निकारागुआ लेक के आसपास निवास करती थी। यह एक ऐसा देश है जिसे स्पेन तथा ब्रिटेन दोनों ने अपना उपनिवेश बनाया। फिर भी आज इस देश के पेशेवर तथा गैर पेशेवर सिने-निर्देशकों ने डॉक्युमेंट्री तथा फीचर फिल्म दोनों में बढ़त हासिल की है। आइए, प्रारंभ से इस देश का सिने-इतिहास देखते हैं।

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24 मार्च 1980 को जन्मी निकरागुआ के इतिहासकार कार्ली गैटन द्वारा लिखी किताब ‘कॉन्करिंग ए ड्रीम’ से यहां के सिने-इतिहास का पता चलता है, हालांकि पुरानी अधिकांश फिल्म रील नष्ट हो चुकी हैं।
 

कार्ली के अनुसार दिसम्बर 1899 में सिनेमाटोग्राफ के उपकरण लोहे के ट्रंक में यहां पहुंचे और इन्हें लाने वाला व्यक्ति एक मैक्सिको निवासी था, जिसका नाम लैगारेटा था। मगर इसके पहले से वहां परफॉर्मिंग आर्ट्स के लिए मुनिस्पल थियेटर था। सेंट्रल अमेरिका अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए फ्रेंच लोगों को यहां के लैंडस्केप्स, लोगों, गलियों-सड़कों तथा बिल्डिंग को शूटिंग केलिए आकर्षित कर रहा था और वे इन स्थानों की शूटिंग कर रहे थे। इन फिल्मों को ‘विसिटाज’ कहा जाता था। इसमें सेंट्रल अमेरिका की लड़कियों को संडे पार्टी ड्रेस में (1897) फिल्माने के चित्र भी थे।

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जब नुकरागुआ में फिल्म का अन्वेषण हुआ और जनता इसे जानने लगी, इस युग (1900-1929) को कार्ली अपनी किताब में ‘दि एज ऑफ लाइट’ की संज्ञा देती हैं। इस समय की फिल्मों में विभिन्न आकृतियां होती थी मगर कोई प्लॉट नहीं होता था। और इन दिनों फिल्में निजी हाथों में थीं। उत्सुकता के कारण अमीर-गरीब सब इन चित्रों को देखने आते थे।

सस्ता होने के कारण वर्किंग क्लास के लिए इसे देखना एक प्रमुख कार्य बन गया। और जब यह मंहगा हुआ तो सामाजिक प्रतिष्ठा बन गया क्योंकि लोग अपनी कीमती पोशाक पहन कर दूसरों को दिखाने के लिए आते थे। बाद में एक समय ऐसा आया जब इसे देखने सब तरह के लोग जाने लगे। असल में जल्द ही वहां करीब चालीस थियेटर थे और स्पर्द्धा में टिकट के दाम गिरने लगे।


तीस के दशक में बनने लगी थीं सवाक फिल्में

एक अन्य इतिहासकार के अनुसार 1900 में मानगुआ थियेटर में लुमियर सिनेमाटोग्राफ द्वारा प्राकृतिक दृश्यों से प्रेरित एक लघु फिल्म दिखाई गई थी। बाद में ‘द लेडी वियर्स द पैंट्स’, ‘सोसेरस अरब’, ‘द हार्ट इज स्ट्रोंगर दैन रीजन’ तथा ‘द मैरिज ऑफ द सन ऑफ द डेविल’ भी दिखाई गई।

1925 में पहली निकरागुआ फिल्म अकादमी की स्थापना हुई। यहां अभिनेताओं को प्रशिक्षण भी दिया जाता था। इन्हीं सालों में देश के उत्तरी क्षेत्र में हुई लड़ाई को यूएस मरीन सेना के फोटोग्राफर ने ऑफिसियल फिल्म के रूप में फिल्माया। 1929 में पैरामाउंट ने तीन सैकेंड की फिल्म बनाई जिसमें निकरागुआ का एक लीडर हैट उतार कर कैमरामैन का अभिवादन करता है। 

तीस के दशक में निकरागुआ में सवाक फिल्में बनने लगीं तथा चालीस के दशक में डॉक्युमेंट्री तथा फीचर दोनों बनने लगीं। इसी समय हॉलीवुड की फिल्में इस देश में पहुंचने लगीं। इनमें से कुछ में निकरागुआ की अभिनेत्री लिलियन मोलिएरी (‘एना एंड द किंग ऑफ सयाम’) भी काम कर रही थी। पूरी तरह निकरागुआ के लोगों के द्वारा पहली फिल्म निर्देशक बेन्जामिन जापाटा ने साठ के दशक के प्रारंभ में बनाई, इस श्वेत-श्याम फिल्म का नाम ‘एल नान्डिमेनो’ था।

सत्तर के दशक में विद्रोह के कारण मुख्यरूप से डॉक्युमेंट्री बनीं। इसे वे गोरिल्ला यौद्धाओं के साक्षात्कार को साझा करते हुए फिल्माते थे।

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विश्व सिनेमा का इतिहास - फोटो : istock

सत्तर-अस्सी के दशक का सिनेमा

सत्तर के दशक में द निकरागुआ फिल्म इंस्टीट्यूट स्थापित हुआ और परामर्शदाताओं तथा कैमरों को क्यूबा से आयात किया गया। नए निर्देशक आगे आए। मेहनताना, सरकारी तथा अनुदान के सहयोग से दिया जाने लगा। उन्हें हॉलीवुड की तर्ज पर काम करने की सारी सुविधाएं मिलने लगीं। वे फिल्मांकन की नई तकनीक सीखने लगे। अस्सी के दशक में चिली के सिने-निर्देशक मिग्युएल लिटिन निकरागुआ आए और उन्होंने अपनी सबसे अधिक प्रभावशाली फिल्म ‘एल्सीनो एंड द कोन्डोर’ बनाई।

निकरागुआ की इस पहली रंगीन फिल्म में एक 10-12 साल का लड़का एल्सीनो निकरागुआ के सुदूर इलाके में अपनी दादी मां के साथ रह रहा है। वह विद्रोहियों तथा सरकारी ट्रूप्स के बीच फंस जाता है। फिल्म सर्वोत्तम विदेशी फिल्म की श्रेणी में ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी।

अस्सी के दशक में एक और उल्लेखनीय फिल्म यहां बनी। यह फिल्म है सिने-निर्देशक रैमीरो लैकयो-देशोन की ‘द घोस्ट ऑफ वार’। 1988 की यह फिल्म म्युजिकल ड्रामा है। इस राजनैतिक थ्रिलर में रेनालो निकरागुआ के कैरिबियन तट के इलाके का एक युवा डॉन्सर है, लेकिन वह अपने पेशे को छोड़ कर देश के लिए लड़ना चाहता है।

1998 में फ्लोरेंस जौगे के निर्देशन में एक लघु डॉक्युमेंट्री ‘सिनेमा एल्काजार’ बनी। इस दस मिनट की डॉक्युमेंट्री में रोजा एक स्थान पर आती है। इस स्थान में कुछ देर पहले भूकंप आया था और एक बिल्डिंग मलबे में तब्दील हो गई थी। लोगों  के अनुसार यह सिनेमा हाल था मगर रोजा वहां बरसों-बरस रही थी मगर उसने अपनी जिंदगी में कभी फिल्म नहीं देखी थी। फिल्म में बहुत कुछ होता है। इसमें पिलर एक्युर ने अभिनय किया है। आईएमडीबी में इसे 6.9 स्टार दिया है। इसे बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दो पुरस्कार प्राप्त हुए।


वर्तमान का सिनेमा

आजकल निकरागुआ में फिल्म निर्माण निजी हाथों में है क्योंकि सरकार के ओर से सहायता की कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्में बन रही हैं। 2008 में बनी फिल्म ‘ला युमा’ को 2011 में ऑस्कर पुरस्कार के लिए यहां से भेजा गया था, इसे 7 अन्य पुरस्कार मिले। फ्लोरेंस जौगे द्वारा निर्देशित इस फिल्म की खूब प्रशंसा हुई है, इसमें निकरागुआ की अभिनेत्री अलमा ब्लैंको ने अभिनय किया है, मगर इसे बनाया है निकरागुआ में रहने वाली एक फ्रेंच स्त्री निर्देशक ने। इस 1 घंटा 30 मिनट की फिल्म में युमा नामक मजबूत इरादों वाली विद्रोही लड़की की कहानी है, जो बॉक्सर बनने का सपना देख रही है।

गैब्रिएल सेरा ने मैक्सिको में फिल्म अध्ययन किया, उसने 2015 में ‘ला पार्का’ (‘द रीपर’) बनाई इसे ऑस्कर में सर्वोत्तम डॉक्युमेंट्री केलिए नामांकित किया गया। फिल्म मैक्सिको के नए सिनेमा से प्रभावित है तथा क्रूर, अत्याचार भरे कथानक पर बनी है।

2017 में निकरागुआ के संगीत-लेखक पर एक नायाब डॉक्युमेंट्री ‘वाल-टेर’ नाम से बनी। ‘द ब्लैक क्रिओल्स’, ‘डॉटर ऑफ रेज’, ‘बिग ब्रदर वल्कैनो’, ‘पेइंग द प्राइज फार पीस’, ‘आइलैंड ऑफ लोस्ट चिल्ड्रेन’ इस सदी में निकरागुआ से आने वाली कुछ अन्य फिल्में हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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