किताब ‘फ़िल्म एप्रिसिएशन’ सिने-प्रेमियों को अवश्य पढ़नी चाहिए।
- फोटो : विजय शर्मा
प्रो. के. सी सुरेश एवं डायोरमा सिनेमा के चेयरमैन मनोज श्रीवास्तव की भूमिकाएं तथा अनुवादक की टिप्पणी किताब को समझने में सहायक है। कवर का गैर पारम्परिक रेखांकन (रुक्साना तबस्सुम) आकर्षित करता है और किताब पढ़ने का आमंत्रण देता है।
हर अध्याय के प्रारंभ में उद्धृत सिनेमा से जुड़े भारतीय और विदेशी व्यक्तियों (यथा सेकिया, त्रुफ़ो, कुरोसावा आदि) की विभिन्न पंक्तियां इसे रोचक बनाती हैं, जैसे अलफ्रेड हिचकॉक की पंक्ति, ‘एक अच्छी फिल्म को तीन चीजें चाहिए होती हैं, स्क्रीनप्ले, स्क्रीनप्ले तथा स्क्रीनप्ले’।
फिल्म के मुख्य बिन्दुओं, खासतौर पर विभिन्न प्रकार के शॉट्स (डायनमिक शॉट, वाइड एंगल, स्टेटिक कॉम्पोजीशन, लीड रूम आदि) को समझाने करने के लिए फिल्म, डॉक्युमेंट्री के स्टिल फोटोग्राफ का प्रयोग तथा भावों को स्पष्ट करने के लिए असमी, बांग्ला, हिन्दी, एवं अन्य भाषाओं की फिल्म से लिए गए प्रचुर उदाहरण किताब को महत्वपूर्ण बनाते हैं।
इसी तरह आज की पीढ़ी को ध्यान में रखते हुए विभिन्न नेटसाइट के लिंक दिए गए हैं ताकि पाठक अपनी जानकारी में इजाफा कर सकें।
किताब से गुजरने पर पता चलता है कि लेखक न केवल सिनेमा से जुड़ा है वरन उसे विषय की अधुनातम जानकारी है जिसे वह पाठक से साझा करता है। 100 फिल्मों की सूची देखने के लिए उत्सुकता जगाती है और यदि आपने देखी है तो देखी गई फिल्म का लिस्ट में होना खुशी देता है।
किताब ‘फ़िल्म एप्रिसिएशन’ सिने-प्रेमियों को अवश्य पढ़नी चाहिए। वैसे यह किताब हर उस स्कूल-कॉलेज में होनी चाहिए जहां सिनेमा का अध्ययन-अध्यापन होता है। यह प्रत्येक सिने-विद्यार्थी/जिज्ञासु के पास अवश्य होनी चाहिए। किताब के लिए मैं उत्पल दत्त और दीपशिखा भगवती को बधाई सेती हूं और भविष्य में और किताबों की उनसे उम्मीद करती हूं।
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