सर्वाधिक चर्चित और जनमत बटोरने वाली यात्रा तो 1990 में बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या यात्रा थी।
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चंद्रशेखर की अधिकार यात्रा
लेकिन सुनीलदत्त से पहले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की 1983 में की गई पदयात्रा को भी नहीं भुलाया जा सकता। वह कन्याकुमारी से दिल्ली तक की पदयात्रा थी। उस यात्रा में करीब सौ किलोमीटर तक पत्रकार के रूप में पदयात्रा के कवरेज का अवसर मुझे भी मिला था। उन दिनों मैं इंदौर से प्रकाशित नईदुनिया में सह-संपादक था। वह एक विलक्षण यात्रा थी।
चंद्रशेखर की इस यात्रा के सिर्फ़ पांच बुनियादी मसले थे। देश के हर नागरिक को पीने का पानी मिले, कुपोषण दूर हो जाए,प्रत्येक बच्चे को पढ़ने का समान अवसर मिले। हर नागरिक को स्वास्थ्य और इलाज की बेहतर सुविधाएं मिलें और प्रत्येक भारतवासी को सम्मान से जीने का अधिकार मिले। ये सब आसमानी चाहतें नहीं थीं,बल्कि संवैधानिक गारंटी थी,जो संविधान निर्माताओं ने इस देश को दी थी।
आडवाणी की रथ यात्राएं
एक बार सियासी यात्राओं के बारे में जानना भी दिलचस्प होगा। हालांकि इनमें कुछ पदयात्राएं और कुछ वाहन यात्राएं हैं। सर्वाधिक चर्चित और जनमत बटोरने वाली यात्रा तो 1990 में बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या यात्रा थी। श्री आडवाणी अपने विशेष रथ में निकले थे और चालीस दिनों में 23 प्रदेशों तथा चार केंद्र शासित राज्यों में घूमे थे।
अयोध्या में राममंदिर निर्माण के मुद्दे को पहली बार गंभीरता से भारतीय जनता पार्टी ने उठाया, जिसने बाद में सियासी माहौल बदल कर रख दिया। यात्रा के दरम्यान आडवाणी जी को बिहार में गिरफ़्तार कर लिया गया था। इस यात्रा ने अगले साल लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ा लाभ पहुंचाया था। इसके बाद 1997 में लाल कृष्ण आडवाणी ने स्वर्ण जयंती रथयात्रा की थी। यह भी चुनावी यात्रा ही थी। इसके बाद 2004 में उनकी एक और भारत उदय यात्रा हुई।
यह भी चुनावी यात्रा थी। दो साल बाद 2006 में उन्होंने भारत सुरक्षा रथ यात्रा और 2009 में चुनावी जनादेश यात्रा निकाली। बताने की ज़रुरत नहीं कि इनके मिश्रित परिणाम मिले थे। लाल कृष्ण आडवाणी के अलावा पार्टी के एक पूर्व अध्यक्ष डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी ने भी 1991 -1992 में एक बड़ी यात्रा की थी।
इसे एकता यात्रा नाम दिया गया था और यह कन्याकुमारी से कश्मीर तक आयोजित थी। कश्मीर में आतंकवाद उन दिनों सर उठा रहा था। उन दिनों श्रीनगर के लाल चौक में तिरंगा फहराने के ऐलान का प्रतीकात्मक महत्त्व था।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे चंद्रबाबू नायडू ने 1989 में पद यात्रा की थी।
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सियासी यात्राएं और नेता
इसी दौर में दोनों राष्ट्रीय दलों के अलावा क्षेत्रीय दल भी पद यात्राओं से अछूते नहीं रहे। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे चंद्रबाबू नायडू ने 1989 में पद यात्रा की थी।
इसके पश्चात् 2013 में उन्होंने 1700 किलोमीटर की पदयात्रा की। यह यात्रा चुनावी थी। वहां के एक और मुख्यमंत्री रहे वाई एस राज शेखर रेड्डी ने 2003 में दो महीने की पद यात्रा की थी। उन्होंने करीब 11 जिलों में 1500 किलोमीटर पद यात्रा की और अगले ही बरस उनकी पार्टी सत्ता में थी। उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी ने 2017 में अपने पिता की शैली में एक पद यात्रा की और 341 दिनों में 3648 किलोमीटर की दूरी तय की। इसका लाभ उन्हें मिला और 2019 में उनकी पार्टी ने शानदार जीत हासिल की।
एक आध्यात्मिक-धार्मिक नर्मदा यात्रा कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने की ,लेकिन वह विशुद्ध धार्मिक परिक्रमा थी। अपने दूसरे विवाह के बाद पत्नी के साथ उनकी यह पारिवारिक परिक्रमा भी थी और इसमें उनके साथ अन्य दलों के लोगों ने भी सहयोग दिया था। अब राहुल गांधी के ऐलान से ठीक पहले बिहार में प्रशांत किशोर ने भी बिहार से पदयात्रा के ज़रिए अपने राजनीतिक भविष्य का आग़ाज करने का निर्णय लिया है।
सियासत में पद यात्राओं का जहां विशुद्ध चुनावी जीत का स्वार्थ होता है, वहीं गैर सियासी यात्राएं देश की लोकतान्त्रिक सेहत के लिए हमेशा लाभप्रद रहती हैं। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा पार्टी के अपने अस्तित्व और जनाधार की भी परीक्षा होगी।
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