क्या आपने कभी सोचा है कि टीवी, रेडियो या मोबाइल पर आप जो संगीत सुन रहे हैं, आपके कमरे में मौजूद चूहा उसके बारे में क्या सोचता होगा? मुमकिन है कि वह चूहा सोचता हो, कि वह इससे ज्यादा अच्छा गा सकता है। 15 हजार साल से चूहे मनुष्य के साथ रह रहे हैं। लेकिन आपको यह जानकर हैरत होगी कि चूहे भी संगीत की समझ रखते हैं। हां, वह जिन आवृत्तियों में गा रहे होते हैं, वे मनुष्य के सुनने की सीमा से परे जरूर होती हैं।
2012 में ड्यूक यूनिवर्सिटी में न्यूरोबायोलॉजिस्ट एरिक जार्विस के नेतृत्व में एक प्रयोग किया गया। उन्होंने शल्य चिकित्सा द्वारा पांच चूहों को बहरा कर दिया और उनके गीतों को इंफ्रारेड कैमरों और माइक्रोफोन की मदद से एक साउंड स्टूडियो में रिकॉर्ड किया। उन्होंने बहरे चूहों के गाने की तुलना सुनने वाले चूहों के गानों से की। अगर चूहों के गाने की क्षमता जन्मजात होती, जैसा कि लंबे समय से माना जाता रहा है, तो सर्जिकल बदलाव से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए था। जार्विस और उनकी टीम ने चूहों के गीत की पिच की आवृत्ति को बदल दिया, ताकि शोधकर्ता अपने कानों से वह संगीत सुन सकें। यह पाया गया कि जो चूहे सुन सकते थे, उनके गीत पक्षियों की आवाजों की तरह थे। जबकि बहरे चूहों की आवाज पहचानने योग्य नहीं थी।
शोध का निष्कर्ष यह निकला कि चूहों की आवाज खुद की और दूसरों की आवाज सुनने की उनकी क्षमता पर निर्भर करती है। यानी चूहे जो सुनते हैं, उसकी मिमिक्री करने की कोशिश करते हैं। नकल करने की चूहों की इस योग्यता में एक पहेली छिपी है, जिसे विज्ञान की सबसे मुश्किल समस्या कहा जाता है, और वह है कि भाषाओं की उत्पत्ति आखिर होती कैसे है? बच्चे बोलना कैसे सीखते हैं? बोलना एक कौशल है, जो बच्चे अपने आसपास के माहौल से सीखते हैं।
शोधकर्ताओं ने मनुष्यों के अलावा, हमिंग बर्ड, तोता, डॉल्फिन, हाथी और चमगादड़ जैसी प्रजातियों की आवाजों को दोहराने की क्षमता पहले ही खोज ली है। हालांकि सदियों से यह माना जाता रहा है कि मनुष्य की भाषा जानवरों से अलग तो होती ही है, उनकी आवाज सीखने की क्षमता भी अलग होती है। लेकिन अनुभव कुछ और ही कहता है। जब ड्यूक शोधकर्ताओं ने सुनने वाले और बहरे चूहों पर प्रयोग किया, तो उन्होंने पाया कि चूहों की तंत्रिकाओं में ऐसी व्यवस्था होती है, जो मनुष्यों और सॉन्गबर्ड की तरह उनके अग्र मस्तिष्क को सीधे मुखर अंगों को नियंत्रित करने की क्षमता देती है
केन्या के त्सावो में एक दस वर्षीय हथिनी नजदीकी नैरोबी-मोम्बासा राजमार्ग पर चलने वाले ट्रकों की आवाज निकालती है। न्यू इंग्लैंड एक्वेरियम में एक सील अंग्रेजी लहजे में बोलती है। चूहे ऐसा नहीं कर सकते। भाषा सीखने में चूहों का प्रारंभिक कौशल भाषा सीखने की क्षमता में एक तरह की निरंतरता का संकेत जरूरत देता है। जैसे कि कोई जलमग्न पुल यह संकेत देता है कि वर्तमान में पृथक दिखने वाले दो प्रायद्वीप कभी जुड़े हुए थे। जानवरों की भाषा पर हुए हालिया शोध कई तरह के संकेत देते हैं। मिसाल के तौर पर अंडे के भीतर मौजूद कछुआ न सिर्फ आवाज निकालता है, बल्कि बाहर से आ रही आवाजों पर प्रतिक्रिया करते हुए अपने जन्म के समय का संतुलन बनाता है। विभिन्न प्रजातियों में भाषा की जो संरचना है, वह कुछ नियमों पर आधारित होती है। यह सामाजिक ढांचे और कोई सूचना भेजने की जरूरत पर निर्भर है।
1649 में प्रसिद्ध दार्शनिक रेने देकार्ते ने लिखा कि मनुष्य और पशुओं के मध्य सैकड़ों वर्षों से प्रमुख फर्क उनकी भाषा का रहा है। लेकिन 1959 में भाषाविद् नोम चॉम्स्की ने, जो तब 30 वर्ष के थे, तर्क दिया कि किसी भी प्रजाति के लिए भाषा मौखिक व्यवहार का एक रूप मात्र है। सदियों से यह माना गया कि बोलकर खुद को अभिव्यक्त करने की ताकत ने, जिसकी बदौलत मनुष्य ने महाकाव्य रचे, चंद्रमा की यात्रा की, उसे पशुओं से आगे करते हुए महाशक्तिवान बनाया है। लेकिन, मनुष्यों में ऐसी कोई शारीरिक, न्यूरोलॉजिकल या आनुवंशिक व्यवस्था पाने में सफलता नहीं मिली है, जो उन्हें बोलने की क्षमता देती हो, और जो पशुओं में न हो। भाषाविद् भाषा को ऐसा कौशल मानते रहे, जो विकसित नहीं किया जा सकता। वह या तो होता है या फिर नहीं। मनुष्यों में वह है, और पशुओं में नहीं।
लेकिन, शोध बताते हैं कि बोलने की क्षमता के कई घटक होते हैं, जिनमें मनोवैज्ञानिक घटक भी शामिल हैं। अब विवाद इस पर जारी है कि भाषा के कौन-से घटक मनुष्य ने पशुओं से साझा किए हैं और कौन से घटक सिर्फ मनुष्यों के पास हैं। हालांकि पशुओं के बोलचाल और मनुष्य की भाषा के बीच निरंतरता के प्रमाण मिलते रहे हैं। निएंडरथल जीन के एक अध्ययन और जार्विस के शोध से पता चलता है कि चिड़ियाएं जो आवाजें निकालती हैं, और मनुष्य की आवाजों के पीछे एक ही तरह के जीन काम करते हैं, और इनका विकास भी एक ही क्रम में हुआ है। बोलने की क्षमता और मानव जीव विज्ञान के बीच का संबंध तोड़े जाने से पशुओं की भाषा समझने की दिशा में एक क्रांति आई है।
हर जानवर बोलकर अपनी भावनाएं व इरादे व्यक्त करता है। लेकिन मुश्किल यह है कि हमें उनके द्वारा दिए जा रहे संकेतों और उनके अर्थों को समझना होगा, जिसमें अभी तक ज्यादा सफलता नहीं मिली है। सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयॉर्क के जीवविज्ञानी डेविड ग्रुबर द्वारा स्थापित प्रोजेक्ट सीईटीआई नामक एक अंतरराष्ट्रीय पहल, व्हेल की आवाज की रिकॉर्डिंग, जिसे कोडा के रूप में जाना जाता है, को कंप्यूटर मॉडल में फीड करके इस समस्या से निपटने की उम्मीद करते हैं, जैसे चैटजीपीटी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कॉन्टेंट का विश्लेषण करके मानव भाषा में शब्दावली और व्याकरण को समझने में सक्षम होता है।
नए शोध स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य की तरह अन्य प्रजातियां भी शब्द जैसे संकेतों का उपयोग करती हैं। हालांकि इस संबंध में अनुसंधानों की काफी गुंजाइश है। दरअसल बोलने की क्षमता के आधार पर मनुष्यों को जानवरों से श्रेष्ठ मानना एक तरह का भाषा-अभिजात्यवाद है। शोधों से यह स्पष्ट हो चला है कि जानवरों के पास मनुष्य की तरह भाषा का पूरा सेट नहीं है, इसलिए उनका संचार अधूरा लगता है। लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह बात नहीं करते। पशुओं से बातें करना अब सिर्फ काल्पनिक कहानियों तक सीमित नहीं है। पशु हमसे सीख भी रहे हैं, और हमसे कुछ कह भी रहे हैं। उनकी भाषा गूढ़ हो सकती है, लेकिन वे नासमझ नहीं, विचारवान हैं। अगली बार जब आप ऑफिस या कॉलेज की ओर भागते जा रहे हों, तब थोड़ा ठहर कर महसूस कीजिए कि जैविक विकास की दौड़ में कुछ पीछे रह गए आपके साथी कहीं आपसे कुछ कह तो नहीं रहे।