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धूप आने दो: इंद्रदेव के कोप से इस तरह बचा मैनाक पर्वत और चुका दिया वायुदेव का ऋण

सार

इंद्र पर्वतों के पंख काटने में व्यस्त थे, उसी बीच वायुदेव मैनाक पर्वत को शक्तिशाली वेग से उड़ाकर ले गए और दक्षिणी समुद्र में छिपा दिया। वह इंद्र के प्रहार से बच गया। इसीलिए मैनाक पर्वत, वायुदेव के प्रति कृतज्ञ था। 
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इंद्र देव - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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एक दिन देवराज इंद्र को उनके प्रहरी ने समाचार दिया कि कुछ पर्वतों को आकाश में उड़ते देखा गया है। उनकी गड़गड़ाहट लोगों में भय पैदा कर रही थी और उनके परस्पर टकराने से इमारत एवं भवन आदि को क्षति पहुंचने की संभावना बन गई थी।

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‘पर्वत उड़ रहे हैं?’ इंद्र ने चौंक कर पूछा। फिर उन्होंने गौतम मुनि से इसके विषय में जानकारी ली तो गौतम ने बताया: ‘आदिकाल में पर्वतों के पंख होते थे। किंतु हवाई-सुरक्षा, वर्षा और जल संचालन जैसे कुछ कारणों से पर्वतों के पंखों को निष्क्रिय कर दिया गया था। लेकिन अब वे फिर से पंख खोलकर आकाश में उड़ने लगे हैं। हालांकि पर्वतों का इस प्रकार आकाश में उड़ना, संपत्ति और प्राणियों की जान के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। इसलिए आपको इसका समाधान करना चाहिए।‘

इंद्र ने गौतम को आश्वासन दिया और यह प्रण किया कि वे जल्द ही उड़ने वाले पर्वतों के पंख काट डालेंगे जिससे उनके भविष्य में उड़ने की संभावना ही समाप्त हो जाए। फिर एक दिन अपने प्रण की पूर्ति करने के लिए इंद्र अपना शक्तिशाली वज्र उठाकर ऐरावत हाथी पर सवार हुए और बाहर निकल गए।
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इंद्र ने देखा कि एक विशाल पर्वत, नीले आकाश में मस्ती से उड़ता हुआ जा रहा था। इंद्र उसके पीछे चल पड़े। एक स्थान पर पहुंचकर इंद्र ने नीचे देखा कि वह निर्जन प्रदेश था। देवराज चुपचाप पर्वत के निकट गए और अपने वज्र से पर्वत के पंख पर जोरदार प्रहार किया। 

वज्र की चोट से पर्वत का पंख टूटकर नीचे गिर गया। उसका संतुलन बिगड़ने लगा और वह लड़खड़ा गया। फिर इंद्र ने पर्वत के दूसरे पंख पर प्रहार किया। उसकी चोट से पर्वत का दूसरा पंख भी चूर-चूर होकर नीचे गिर गया। पर्वत के दोनों पंख कट चुके थे। वह संभल नहीं पाया और जोरदार धमक के साथ धरती पर उस निर्जन प्रदेश में जा गिरा।

इंद्र को पहली सफलता मिल गई थी। इससे देवराज का साहस बढ़ गया। फिर उन्होंने आकाश में अद्भुत गति एवं दक्षता से वज्र द्वारा एक के बाद एक, आकाश में उड़ रहे पर्वतों के पंख काटने आरंभ कर दिए। कुछ ही देर में, आकाश पर्वतों से रिक्त हो गया और धरती के विभिन्न प्रांतों में पर्वतों के टुकड़े बिखरे पड़े थे। चारों ओर फिर पहले-सी शांति स्थापित हो गई थी। देवराज इंद्र प्रसन्न थे। हालांकि उन्हें पता नहीं चला कि एक पर्वत, इंद्र को धोखा देकर बच निकला था। वह था, मैनाक!

दरअसल, हुआ यह कि मैनाक नाम का एक पर्वत, वायुदेव का घनिष्ठ मित्र था। इंद्र ने ज्यों ही आकाश में उड़ रहे पर्वतों के पंख काटने आरंभ किए, वायुदेव को अपने मित्र मैनाक की चिंता सताने लगी। वे नहीं चाहते थे कि मैनाक को किसी तरह की क्षति पहुंचे। इसलिए वायुदेव ने मैनाक को इंद्र की मंशा बताई और फिर दोनों, इंद्र से बचने का उपाय सोचने लगे। आखिर वायुदेव को युक्ति सूझ गई।

जिस समय इंद्रदेव, पर्वतों के पंख काटने में व्यस्त थे, उसी बीच वायुदेव चुपचाप मैनाक पर्वत को अपने शक्तिशाली वेग से उड़ाकर साथ ले गए और उसे दक्षिणी समुद्र के गहरे पानी के अंदर छिपा दिया। इस तरह, मैनाक, इंद्र के प्रहार से बच गया और उसकी रक्षा हो गई।

मैनाक पर्वत, वायुदेव के प्रति कृतज्ञ था। उसने वायुदेव को धन्यवाद दिया और समुद्र में ही छिपकर रहने लगा। फिर कुछ समय बाद त्रेता युग में मैनाक को वायुदेव का ऋण चुकाने का अवसर मिला।

रावण, सीता का हरण करके उन्हें लंका ले जा चुका था। तब वायु के पुत्र हनुमान ने सीता की खोज में लंका जाते समय दक्षिणी समुद्र के ऊपर से छलांग लगाई। वायुदेव ने उसी समुद्र के अंदर मैनाक को छिपाया था। मैनाक को वायुदेव का उपकार याद था। 

उसने अपने मित्र वायुदेव के पुत्र हनुमान को जब ऊपर से जाते देखा, तो वह तुरंत हनुमान को विश्राम के लिए स्थान उपलब्ध कराने बाहर निकल आया। परंतु हनुमान को लंका पहुंचने की जल्दी थी, इसलिए वह मैनाक का आभार व्यक्त करते हुए उसे केवल स्पर्श करके लंका चले गए थे। हनुमान ने मैनाक पर विश्राम तो नहीं किया, किंतु मैनाक ने मित्र वायुदेव का ऋण अवश्य चुका दिया था।

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