दुष्कर्म जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी केवल सरकार पर अकेले छोड़ना गलत होगा। आखिर समाज के भी अपने कुछ दायित्व हैं।
- फोटो : Istock
जो अपराधी पकड़े भी जाते हैं, वो लंबी कानूनी लड़ाई में पीड़ित पक्ष का हौसला तोड़ देते हैं। दिल्ली की निर्भया के केस में देश ने यह देखा भी है। कैसे वकील बार-बार दलीलों से केस को लटकाते रहे और सारे सबूत होने के बावजूद 7 साल तक दोषी अपराधी फांसी के फंदे को धोखा देते रहे। हालांकि मीडिया, समाज और विपक्षी दलों के दबाव चलते इस मामले की सीबीआई जांच की मांग पर सरकार झुकती नजर आ रही है और जल्द ही सरकार जांच के लिए कह सकती है।
नाबालिग बच्चियों के खिलाफ यौन अपराधों को लेकर तो पॉक्सो एक्ट में भी एक वर्ष में ट्रायल पूरा करने का प्रावधान है, लेकिन अकेले राजस्थान में पॉक्सो कोर्ट में 7000 केस लटके हुए हैं। कुछ-कुछ जिलों में तो 7-8 सालों से केसों का ट्रायल चल रहा है। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी कुछ-कुछ ऐसी ही स्थितियां हैं।
हालांकि, दुष्कर्म जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी केवल सरकार पर अकेले छोड़ना गलत होगा। आखिर समाज के भी अपने कुछ दायित्व हैं। बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो दुष्कर्म जैसी घटनाओं पर मौन धारण कर लेते हैं। खुलकर कभी विरोध में नहीं आते। कुछ तो अपनी बेटियों के साथ घटी दुष्कर्म की घटनाओं को इसलिए छिपा लेते हैं, ताकि समाज में बदनामी न हो।
चुप्पी का एक और कारण संभवतः लंबी और जटिल कानूनी प्रक्रिया भी है। पिछले दिनों कई प्रदेशों में तो अपराधियों के दुष्कर्म के बाद पीड़िता या उसके परिवार को ब्लैकमेल करने और फिर नाजायज मांगें न मानने पर सोशल मीडिया पर घटना की वीडियो या फोटो वायरल करने के बाद वारदात सामने आई हैं।
वर्ष 2012 में निर्भया कांड के समय देश खड़ा हो गया था, तब सरकार को झुकना पड़ा था। जरूरत आवाज बुलंद करते रहने की है। यदि सभी मिलकर ऊंची आवाज करेंगे तो सरकार भी जागेगी और अपराधियों के हौसले भी पस्त होंगे।
एक और बात। दशकों से स्कूली पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा को लेकर देश में बहस जारी है। जब घटनाएं होती हैं, तब सभी पार्टियां मिलकर हल्ला मचाती हैं, लेकिन जब मुद्दा पॉलिसी बनाने का आता है तो विरोध के सुर उठने लगते हैं। न केवल राजनीतिक पार्टियां, बल्कि धार्मिक संगठन अड़ जाते हैं। वर्ष 2007 में केंद्र सरकार ने किशोर शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की थी, लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया।
यौन शिक्षा समय की मांग है, यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि जब बच्चे किशोरावस्था में प्रवेश करते हैं तो रिश्तों और सेक्स के विषय में उन्हें बेहद भ्रमित और आधी-अधूरी जानकारी होती है। इनदिनों तो ओटीटी प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, इंटरनेट भी युवाओं में सेक्स को लेकर खूब भ्रम फैला रहा है।
यौन शिक्षा निश्चित ही उस टूल की तरह काम कर सकती है, जो यौन अपराधों में कमी ला सकता है। स्कूल में शिक्षक ही नहीं, घरों पर माता-पिता को भी अपने बच्चे से यौन विषयों पर बात करने की जरूरत है। यदि सभी अभिभावक बच्चों की परवरिश करते समय उन्हें यौन विषयों के साथ नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ाएं तो ऐसे अपराधों में निश्चित ही कमी लाई जा सकती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।