आखिर एक लोकतांत्रिक देश में विरोध को कैसे अनुचित ठहराया जा सकता है। वहीं बलात बंदी और सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान को आखिर कैसे कोई जायज ठहरा सकता है।
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अपराध बोध से भरे इन बयानों में न्याय एवं लोकतंत्र की जगह मजहबी भाईचारे की अपील थी। जबकि वादी पक्ष ने न्यायालय से साक्ष्यों के आधार पर यथाशीघ्र निर्णय की गुजारिश की थी। इसके लिए इनकी मांग 1991 के पूजा अधिनियम की निरस्ती, न्यायालय द्वारा ऐसे सभी मामलों में सुनवाई और शीघ्र निपटारे की है। ऐसा ही कुछ कृषि सुधार कानून में भी हुआ। वर्षों से लंबित इस सुधार को लागू होना था।
इसके कई प्रावधान प्रसिद्ध कृषि विज्ञानी एम एस स्वामीनाथन समिति द्वारा सुझाए गए थे। किंतु महिनों के आंदोलन, हिंसा और पंजाब चुनाव की आहट के नाते इसे पूरी तरह वापस लिया गया। एनआरसी एवं सीएए का मामला भी अब तलक लंबित है। जबकि यह केवल देश के पूर्वी और उत्तर पूर्वी राज्यों की समस्या नहीं अपितु देश की सुरक्षा और मतांधो से मानवता की रक्षा का भी मसला है।
इसके बावजूद यह शाहीन बाग जैसे प्रदर्शन और प्रोपगंडा के नाते रुका पड़ा है। एससी एसटी एक्ट दुरुपयोग मामले मे तो सरकार सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय तक पलट चुकी है। पुरोधा संगठन के प्रमुख की आरक्षण पर पुनर्विचार के सोच से ही सरकार बहादुर की पेशानी पर बल पड़ने लगता है। जबकि इसका आधार एकात्म मानववाद रूपी समानता का सम्यक दर्शन से जुड़ा है। देशव्यापी संपर्क और करोड़ों सदस्यों के बावजूद भी ऐसे हर मसले पर अटकाव ही दिखता है।
अग्निवीरों के तीरों की तपिश मे हिंसा और विरोध प्रदर्शन जारी है। सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। वहीं युवाओं को विरोध प्रदर्शनों से दूरी बरतने अन्यथा भविष्य में सरकारी सेवाओं से मरहूम रहने का संदेश दिया जा रहा है।
आखिर एक लोकतांत्रिक देश में विरोध को कैसे अनुचित ठहराया जा सकता है। वहीं बलात् बंदी और सार्वजनिक संपत्तियों के नुकसान को आखिर कैसे कोई जायज ठहरा सकता है। किंतु क्या बिन पूरी तैयारी के इसे स्थाई तौर पर लागू रखा जा सकता है? क्योंकि शंका एवं विरोध के नाते नित्य थोड़ी बहुत सुविधा घोषणा जारी है।
इससे संबंधित कई संजीदा सवाल है। सैन्य बल के रूप में मिलने वाली सेवा सुविधा सम्मान और बहाली के तौर तरीकों को लेकर युवाओं मे संदेह है। फिर एक ही सैन्य बल मे अधिकारी और जवानों के लिए अलग कानून जायज होंगे! फिलहाल तो इस मुद्दे पर सैन्य अधिकारियों के वक्तव्य से विशेषज्ञ भी हैरान हैं। वहीं अल्पावधि वाले प्रशिक्षण और अनुबंधों वाले सैनिकों के भरोसे देश की सुरक्षा छोड़ी जा सकती है?
अनुबंधों के आधार वाली सेना का विचार कोई नया नहीं है। दुनियाभर में ऐसी सेनाओं का चलन रहा है। आचार्य चाणक्य ने भी अपने सैन्य दल मे भृति सैनिकों को नियुक्त किया था। उन्होंने गुप्तचर सेवा में अनुबंधों के आधार पर बहुरुपिये संग विषकन्याओं का भी चलन था। किंतु तब इनके भरोसे ही राष्ट्र की सुरक्षा नहीं थी।
ऐसे में सरकार को हठधर्मिता छोड़ सोचने की जरूरत है। वैसे भी किसी मसले पर देश का मानस जानने और सर्वप्रथम योजनाओं को सीमित पैमाने पर लागू कर समझने की जरूरत है। अन्यथा देश सुलगता और विमर्श यू ही भटकता रहेगा।
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