नेहरू की आचार्य जी के प्रति सोच
देश में लोकसभा के पहले आम चुनाव (सन् 1952) में जवाहर लाल नेहरू ने मोरारजी देसाई को लिखे एक पत्र में अपनी मंशा जाहिर करते हुए लिखा कि-
मैं जानता हूं कि विपक्षी दल के उम्मीदवार को निर्विरोध चुनाव को स्वीकार करने में कठिनाई होगी, फिर भी मेरी सलाह है कि यदि नरेन्द्र देव चुनाव में खड़े होते है,तो उनके खिलाफ उम्मीदवार न खड़ा किया जाए।एक विद्वान और निश्छल व्यक्ति के रूप में उत्तर प्रदेश में उनकी इतनी प्रतिष्ठा है कि उनका विरोध करने से कांग्रेस की प्रतिष्ठा को ही धक्का लगेगा।
जवाहरलाल नेहरू के इस विचार से कांग्रेस के नेता सहमत नहीं हुए। आचार्य जी के विरुद्ध मदन गोपाल को खड़ा किया गया। आचार्य जी इस चुनाव में भी हार गए। जिस कांग्रेस का जवाहरलाल नेहरु नेतृत्व कर रहे थे और आचार्य जी के प्रति जवाहरलाल नेहरू इतनी अगाध श्रद्धा थी,उस कांग्रेस के प्रति आचार्य नरेन्द्र देव के मन में कम से कम नीतिगत सवालों को लेकर कभी दुविधा नहीं रही।
सोशलिस्ट पार्टी के नासिक अधिवेशन में ही अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए कहा कि-
कांग्रेस छोड़ना कोई खुशी की बात नहीं है। हमें कांग्रेस छोड़ने की जल्दी नहीं हैं। कांग्रेस हमें छोड़ देने के लिए बाध्य कर रही है। मैं अच्छे मित्रों को छोड़ रहा हूं। राजनीति भी अजीब चीज है। राजनीति में मित्र दुश्मन बन जाते हैं। मैं तो सन् 1934 से कह रहा हूं कि कांग्रेस समाजवाद का अस्त्र नहीं बन सकती।
राजनीति में मित्र दुश्मन बन जाते हैं इसकी एक मिशाल सन् 1947 में सामने आया। कांग्रेस के नए अध्यक्ष का चुनाव होना था। महात्मा गांधी इस पद के लिए आचार्य नरेन्द्र देव को इस पद का सर्वथा उपयुक्त उम्मीदवार मानते थे। कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में महात्मा गांधी उपस्थित होकर जे बी कृपलानी से एक नोट के जरिए आचार्य नरेन्द्र देव का नाम प्रस्तावित करते है। पहले तो जवाहरलाल नेहरू गांधी जी के प्रस्ताव से सहमत हुए, पर बाद में पलट गए। वे राजेन्द्र प्रसाद को समर्थन करने लगे।
महात्मा गांधी ने गोविंद बल्लभ पंत के जरिए राजेन्द्र प्रसाद के पास यह संदेश भेजवाया कि वे कांग्रेस का अध्यक्ष पद स्वीकार न करें। पर सवाल है कि क्या इसे महज संयोग कहा जा सकता है कि महात्मा गांधी का सन्देश राजेन्द्र प्रसाद तक पहुंच ही नहीं पाया। आज आप कल्पना करें कि तब कांग्रेस का नेतृत्व अचार्य नरेन्द्र देव जैसे कुशल हाथों में होता, तो आजादी के बाद भारत में सरकार और कांग्रेस संगठन की दशा-दिशा कैसी होती? तब शायद आचार्य जी के जरिए महात्मा गांधी की आत्मा भी कांग्रेस में जीवित रहती,और कांग्रेस को विर्सजित कर लोक सेवक संघ बनाने का सुझाव भी महात्मा गांधी को नहीं देना पड़ता।
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