अनाज पीसने की ठीक वैसी ही चक्कियां भी मोहनजोदड़ो में मिली थीं। वे कपड़े पहनते थे। हमारी तरह। एक देह का ऊपरी हिस्सा ढकने के लिए।
- फोटो : P K Mishra
महिलाओं का मेकअप आज की तरह
अब हम आते हैं मोहनजोदड़ो के निवासियों के खानपान पर। गेंहूं,धान और जौ के जो नमूने वहां मिले,वे आज की तरह ही हैं। उनका भण्डार करके लोग रखते थे ,जैसा हम लोग आज भी करते हैं। मैनें अपने बचपन में देखा है कि गांव के घरों में मिट्टी के बड़े-बड़े कुठार होते थे,जिनमें अनाज भंडारण किया जाता था। मेरे संयुक्त परिवार में दादियां पीढ़ी पर बैठकर इन अनाजों को पीसती थीं।
अनाज पीसने की ठीक वैसी ही चक्कियां भी मोहनजोदड़ो में मिली थीं। वे कपड़े पहनते थे। हमारी तरह। एक देह का ऊपरी हिस्सा ढकने के लिए। दूसरा नीचे का भाग ढकने के लिए। महिलाएं भी अपने बदन ढांक कर रखती थीं। वे सोने-चांदी, तांबा, शंख और मणि वाले आभूषण पहनते थे।
इन ज़ेवरों में हार, बिंदी, अंगूठी, बाली, कंगन, चूड़ी, करधनी और पैरों में कड़े शामिल थे। वे मेकअप भी करती थीं। कांसे के आईने, हाथी दांत के कंघे ,बालों में खोंसने वाली सलाइयां भी उनके मेकअप बॉक्स का हिस्सा थे। वे लिपस्टिक और काजल या सुरमा लगाती थीं।
मोहनजोदड़ो के लोग पीपल के पेड़ , आग और पानी की पूजा भी करते थे। ज़ाहिर है कि वे ज़िंदगी में इनकी उपयोगिता समझते थे।
- फोटो : P K Mishra
पीपल ,आग और पानी की पूजा
मोहनजोदड़ो के लोग रसोईघर में वैसे ही बर्तन इस्तेमाल करते थे, जैसे हम लोग इन दिनों करते हैं। अलबत्ता उनकी शैली और डिज़ाइन अलग-अलग है। फर्नीचर में लकड़ी की कुर्सियाँ, चारपाई, स्टूल, बेंत की चटाई भी बनती थी। वे नागरिक हथियार भी रखते थे। इनमें बरछी, छुरे, कुल्हाड़ी, धनुषबाण, गदा, गुलेल, तलवार, ढाल और कवच पहनना भी वे जानते थे। याने इस्पात उद्योग भी समृद्ध था। आने-जाने के लिए वे बैलगाड़ियों का ही उपयोग करते थे। वे कपड़े रंगते थे।
रंगने के जो बर्तन मिले हैं, वे वैसे ही हैं,जैसे हम लोगों ने रंगरेजों के यहां बचपन में देखे हैं। कारोबारी लेन-देन के लिए वर्गाकार या आयताकार मुहरों का प्रचलन था। मोहन जोदड़ोमें क़रीब 2000 मुहरें मिली हैं। उन पर कोई 400 चिह्न हैं। पर वे पढ़े नहीं जा सके हैं।
मेरा अनुमान है कि मूल्य के हिसाब से मुहरों पर चिह्न भी अलग-अलग थे। मुहरों पर स्त्री -पुरुष के अलावा बैल, हाथी ,बाघ ,गेंडा,घड़ियाल और हिरन जैसे प्राणियों के चित्र बने हैं। आज़ादी के बाद भारत में हमारी पीढ़ी ने ऐसे सिक्के देखे हैं ,जिन पर पशु पक्षी बने हैं। मोहनजोदड़ो के लोग पीपल के पेड़ , आग और पानी की पूजा भी करते थे। ज़ाहिर है कि वे ज़िंदगी में इनकी उपयोगिता समझते थे।
(जारी)
धौलावीरा की कहानी दूसरे भागों को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-
75वां स्वतंत्रता दिवस विशेष, धौलावीरा की कहानी-1 : देश का वह तीर्थ जिसकी स्मृतियों को हमें दुनिया याद दिला रही है..!
75वां स्वतंत्रता दिवस विशेष, धौलावीरा की कहानी-2: जब मोहनजोदड़ो की बस्तियां आज की तरह ही थीं
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।