हड़प्पा में नगर किनारे करीब पचास से सत्तर फिट की ऊंचाई पर दुर्ग याने किले का भी अवशेष मिला था।
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किला, परकोटा और पक्की ईंटें
हड़प्पा में घर निर्माण में एक उल्लेखनीय परिवर्तन मिला था। मुअनजोदड़ो में कच्ची ईंटों का उपयोग किया गया था,पर हड़प्पा में पकाई गई ईंटों से घर बनाने का कौशल पाया गया था। ठीक वैसा ही जैसे आज के भारत में ईंटों को पकाया जाता है। इन ईंटों को चूने से जोड़ा गया था। इस जुड़ाई के बाद दो ईंटों के बीच चारकोल भरा गया था। इसका उद्देश्य संभवतया पानी के रिसाव को रोकना रहा होगा। इसके अलावा हड़प्पा में नगर किनारे करीब पचास से सत्तर फिट की ऊंचाई पर दुर्ग याने किले का भी अवशेष मिला था।
किले से शहर के चारों ओर परकोटा बनाया गया। किले के निर्माण और सड़कों पर पक्की ईंटें बिछाई गई थीं। परकोटे के भग्नावशेष वैसे ही हैं, जैसे हम आज के हिन्दुस्तान में ऐतिहासिक नगरों में देखते हैं। दिल्ली ,चंदेरी,आगरा,मांडू तथा अनेक नगरों में ये परकोटे टूटे -फूटे रूप में अपने अतीत की कहानी कहते हैं।
परकोटे की ऊंचाई लगभग 35 फिट ऊंची और 40 फिट चौड़ी थी। शायद यह किला उस समय के शासक या राजा का रहा होगा। ध्यान देने की बात है कि घर निर्माण में पत्थरों का इस्तेमाल नहीं मिला है। यहां तक कि घर से निकलने वाले पानी की नाली पर भी मिटटी की पकाई गई बड़े आकार की फर्शी या चीप जैसी ईंट होती थी।
सुहागन महिलाओं को दफनाने की परंपरा
हड़प्पा काल में शव जलाने की नहीं, बल्कि दफनाने की परंपरा थी। मृतक का सिर उत्तर की ओर और पांव दक्षिण की ओर रखे जाते थे। मृतक के साथ तरह-तरह के पात्रों में खाने-पीने वाली सामग्री रखी जाती थी। इन पात्रों की संख्या चालीस तक पाई गई थी।
एक कब्र में मृतक महिला शीशम की लकड़ी के ताबूत में दफनाई गई थी। इस ताबूत का ढक्कन देवदार का था। अब उस इलाके में देवदार के पेड़ रहे होंगे या मृतक महिला बेहद अमीर खानदान की रही होगी, जिसके घरवालों ने उसे दफनाने के लिए उदारतापूर्वक धन खर्च किया होगा।
जैसे कि आज के हिंदुस्तान में किसी सुहागिन महिला की मृत्यु पर पूर्ण श्रृंगार के साथ उसे विदा करने की परंपरा है, उस समय भी ऐसा ही था। मृतक महिला के शव के साथ अंगूठी, कानों की बाली, गले का हार, चूड़ी और तांबे के फ्रेम में जड़ा हुआ आइना भी रखा गया था। हड़प्पा में मिट्टी के बर्तन भी बनने लगे थे। मुअनजोदड़ो में इस तरह के अवशेषों के मिलने की जानकारी नहीं है।
इतिहासकार ए.एल. बाशम का दावा है कि संसार में सबसे पहले कपास का प्रयोग हड़प्पा के नागरिकों ने किया था।
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तमिल भाषा के करीब है वह लिपि
हड़प्पा काल में जो लिपि प्राप्त हुई है, उसे ब्राह्मी लिपि कहते हैं। इसमें पहली पंक्ति दाहिनी तरफ से बाएं तरफ लिखी जाती थी। पर जैसे ही वाक्य पूरा होता था तो, दूसरी पंक्ति बाएं से दाएं लिखी जाती थी। आज हम हिंदी बाएं से दाएं लिखते हैं और उर्दू दाहिने से बाएं। हालांकि, इस लिपि के बारे में पुरातत्वविद एच.हेरास ने बड़े भरोसे से लिखा था कि यह लिपि तमिल भाषा का आदम संस्करण है।
इतिहासकार ए.एल. बाशम का दावा है कि संसार में सबसे पहले कपास का प्रयोग हड़प्पा के नागरिकों ने किया था। यहां लोगों ने लकड़ी काटने की दांतेदार लोहे की आरी का आविष्कार कर लिया था। यानी लोहा और तांबा उनकी जिंदगी में दाखिल हो गया था। लिंग पूजा के भी प्रमाण यहां मिले हैं।
हड़प्पा की धार्मिक संस्कृति अनेक परिष्कृत रूपों में आज भी हिंदू धर्म की परंपराओं में पाई जाती है। दक्षिण भारत में भी यह मजबूत हाजिरी लगाती है। हड़प्पा की व्यवस्थित,विकसित और अनुशासित सभ्यता का समापन बाहरी आक्रमणकारियों से हुआ माना जाता है। उन हमलावरों ने इस सभ्यता के अंतिम चरण में घोड़ों का अस्तित्व भी शामिल कर दिया।
अफसोस है कि हिंदुस्तान के बंटवारे ने मुअनजोदड़ो और हड़प्पा काल के दरवाजे शोध करने वालों और इतिहासकारों के लिए बंद कर दिए। पाकिस्तान की हुकूमतों ने अतीत की साझा विरासतों की गहराई में जाने का प्रयास नहीं किया। आने वाली नस्लों को पुरखों से परिचित कराने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी।
जाहिर है संसार के किसी भी देश में अपने पुरातात्विक वैभव के साथ षड्यंत्र का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। उनके लिए मुअनजोदड़ो आज भी पुराने मुर्दों का एक टीला ही है। (जारी )
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