फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सरहदों के बंटवारे ने घर छीना, 1971 के युद्ध ने बदल दी रोजी-रोटी

विज्ञापन
-फोटो 94 : मेन बाजार स्थित हार्डवेयर की दुकान पर मौजूद अशोक पुरुथी और ग्राहक। संवाद 
विज्ञापन
पंकज रोहिल्ला
विज्ञापन


बहादुरगढ़। शहर के बाजार में 54 वर्ष पुरानी हार्डवेयर की दुकान सिर्फ कारोबार नहीं बल्कि संघर्ष, मेहनत और सरहदों के बंटवारे की कहानी है। अशोक पुरुथी बताते हैं कि इस दुकान की नींव उनके पिता अमृतलाल ने रखी थी। आज यह कारोबार शहर में परिवार की पहचान बन चुका है।

अशोक बताते हैं कि उनके पिताजी अमृतलाल मूल रूप से पाकिस्तान के झंग क्षेत्र के रहने वाले थे। बंटवारे के समय उनका परिवार भारत आ गया और बहादुरगढ़ के धर्मपुरा में बस गया। शुरू में परिवार के सामने रोजी-रोटी का बड़ा संकट था लेकिन पिताजी ने हार नहीं मानी। उन्होंने मेहनत-मजदूरी से शुरुआत की और बाद में राज मिस्त्री का काम करने लगे।अपनी मेहनत, ईमानदारी के दम पर उन्होंने बहादुरगढ़ में अच्छी पहचान बना ली। कम मेहनताना के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी।
विज्ञापन




1971 के युद्ध के दौरान सीमेंट की कमी से बदलना पड़ा रोजगार
अशोक बताते हैं कि 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान देश में सीमेंट की कमी हो गई थी। निर्माण कार्य से जुड़े लोगों को काम नहीं मिल पा रहा था। ऐसे में परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया। पिता अमृतलाल ने परिस्थितियों के आगे झुकने की बजाय नया रास्ता चुना।



वर्ष 1972 में शुरू की हार्डवेयर की दुकान
अशोक बताते हैं कि 1972 में हार्डवेयर की दुकान की नींव रखी जो आज भी परिवार की पहचान बनी हुई है। वे सात भाई-बहन हैं। परिवार बड़ा था इसलिए पिता पर जिम्मेदारियां भी थीं। बावजूद इसके उन्होंने मेहनत और संघर्ष से अपने बच्चों को बेहतर जीवन देने का प्रयास किया। वर्ष 2007 में पिता अमृतलाल का निधन हो गया लेकिन उनके द्वारा शुरू किया गया कारोबार आज भी परिवार संभाल रहा है।
विज्ञापन

वे स्वयं अब दुकान को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि पिता ने हमेशा मेहनत और ईमानदारी का रास्ता अपनाने की सीख दी। बंटवारे के दर्द, मजदूरी, संघर्ष और छोटे स्तर से शुरू हुए इस सफर ने आज एक ऐसी पहचान बना दी है जो बहादुरगढ़ के पुराने व्यापारिक इतिहास का हिस्सा बन चुकी है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें