इस सामान को फिर खेतों में फेंक कर रोते-बिलखते बच्चों को चुप कराने की कोशिश में जुट गए। एक ही रात में सब कुछ राख होते देखती आंखें बाहर आने तक खौफ में थीं। और जब लोग घरों से बाहर आकर सुरक्षित दूरी पर पहुंचे तो उन्हीं आंखों में बेबसी के आंसू छलक रहे थे।
रोते बच्चे, सिर पीटते परिजन इस आपदा की घड़ी का कैसे सामना करें, उन्हें समझ नहीं आ रहा था। दर्जनों परिवारों के सामने एक जैसे हालात और दर्द था, जिसे वे एक दूसरे को ढांढस बंधाकर सहारा देते रहे।
रात के अंधेरे में तबाही की रोशनी में सब कुछ गंवाने वालाें का दर्द सुबह होने पर और भी बढ़ गया। आग की लपटें कुछ थम चुकी थीं, लेकिन मलबे से उठते धुएं से उनकी टीस और भी गहरी हो गई।
दिन चढ़ने पर रात की तबाही के मंजर देख आंखों से आंसू रोके नहीं रुक रहे थे। इस बीच नेता, रिश्तेदारों की भीड़ भी बढ़ती गई। पीड़ित परिवाराें के लिए प्रशासन ने लंगर लगा दिया लेकिन कई लोगाें के गले से निवाला उतरना भी मुश्किल था।
अधिकांश लोगों को गांव के ही लोगों ने अपने घरों में पनाह दे दी, लेकिन उनके चेहरों पर नया आशियाना बनाने, दो वक्त की रोटी, तन के कपडे़ और बच्चों की पढ़ाई से जुड़े सवालों की फिक्र साफ झलकती रही।
कशैणी गांव में आग पर काबू पाने के लिए और राहत के लिए प्रशासन की ओर से उठाए गए कदम की लोगों में सराहना हो रही है। अग्निशमन विभाग के प्रयासों से कशैणी का आधा गांव आग की चपेट में आने से बचा है।
एसडीएम रोहड़ू बीआर शर्मा को सुबह करीब तीन बजे अग्निकांड की सूचना मिली। सूचना के बाद उन्होंने सुबह होने से पहले अपने स्टाफ के साथ राशन, कंबल, तंबू, लाखों रुपये घटना स्थल तक पहुंचाए। रोहड़ू उपमंडल मुख्यालय से कशैणी गांव करीब 30 किलोमीटर दूर है। दमकल वाहन सूचना के बाद एक घंटे में मौके पर पहुंच गया।
स्थानीय लोगों का भी आग पर काबू पाने में भारी योगदान रहा। पुजारली चार, थाना, टिक्कर, खंगटा, नरैण शरौंथा सहित आसपास के गांवों से सैकड़ों लोगों ने आग पर काबू पाने में सहयोग किया।
सिविल अस्पताल रोहड़ू से प्रभारी चिकित्सक डॉ. रविंद्र शर्मा भी अपनी पूरी टीम के साथ मौके पर दिन भर प्राथमिक उपचार के लिए डटे रहे। डीसी, एसपी भी कुछ घंटों के भीतर मौके पर पहुंच कर आग बुझाने के लिए दिशा-निर्देश देते रहे। खाद्य आपूर्ति निरीक्षक लीली ठाकुर अपनी टीम के साथ सुबह से ही रसोई गैस व राशन लेकर मौके पर पहुंच गईं।