इटावा। सर्दी शुरू होने के साथ ही लोगों को अब रजाई व कंबल की याद आने लगी है। अब रजाइयों की जगह कंबलों ने ले ली है। यही कारण है कि अब रजाई बुनकर व रूई पिनाई का काम बहुत ही कम हो गया है। जहां एक रजाई बनाने में दो हजार रुपये तक लगात आती है, वहीं औसत कंबल 1200 तक में मिल जाता है।
बीते चार वर्षों में जिले में लगभग 350 रजाई बनाने की दुकानें बंद हो गई हैं। रजाई का धंधा मंदा होने से फिलहाल जनपद में लगभग 40 से 50 दुकानों पर ही इससे जुड़ा काम किया जा रहा है। कुछ वर्ष पहले जहां एक ओर हाथ से बनाई हुई रजाई का अपने आप में क्रेज था। वहीं दूसरी ओर इस व्यापार से जुड़े लोग नवंबर से ही रुई की धुनाई करने वाली मशीनों को तैयार करने में जुट जाते थे। उनका यह व्यापार नवंबर से शुरू होकर 15 फरवरी तक चलता था। रजाई-गद्दे बनाने वाले कारोबार से जुड़े इकरार बताते हैं कि कंबलों की वजह से दिन ब दिन बनीं हुई रजाई की मांग घटती जा रही है। आजकल लोगों को समय नहीं है, हाथ से बनी रजाई में समय लगता है। साथ ही सामान महंगा होने से लागत बढ़ गई है। यह भी रजाई की बिक्री पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है। लगभग चार वर्ष पहले तक जिले में लगभग 350 रजाई बनाने की मशीनें लगी थी। लेकिन धीरे-धीरे यह कारोबार ठंडा पड़ता जा रहा है। इससे जुड़े व्यवसाई अजीत बताते कि कंबल हल्का और लंबाई चौड़ाई में बड़ा मिलने के साथ ठंड में कारगर साबित होने से लोग अब कंबल की मांग अधिक कर रहे हैं। इससे रजाई का व्यापार घट रहा है जबकि कंबल मांग अधिक होने से जगह-जगह दुकानें भी सज रही हैं।