मंत्रियों ने कहा कि राज्य के जनजातीय और दुर्गम क्षेत्रों में सेवारत अधिकारियों व कर्मचारियों के सामान्य सेवाकाल की अवधि पूरी होने पर उनका तबादला किया जा सकता है। चिकित्सा आपात या अन्य प्रकार के मानवीय आधार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
यही नहीं, एक ही स्थान पर कई वर्षों से कार्यरत अधिकारियों का तबादला करना प्रशासनिक आवश्यकता है और जनहित में भी अनिवार्य है। न्यायालयों से जुड़े मामलों और दिव्यांगजनों के तबादलों संबंधी आदेशों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सेवानिवृत्ति की दहलीज पर अधिकारियों और कर्मचारियों को यथासंभव उनके जिले में रिक्त पद पर समीपवर्ती स्टेशन उपलब्ध करवाना और दंपती मामले में तबादलों पर सकारात्मक रवैया अपनाना भी दिशा-निर्देशों और नीति का हिस्सा है।
ऐसा पिछली सरकार के समय में भी होता रहा है। सामान्य तबादले नहीं किए जा रहे हैं और अति आवश्यक वाले मामलों में प्रशासनिक सचिवों को मुख्यमंत्री से संस्तुति लेना अनिवार्य है।
सरकारी कर्मचारियों और अफसरों के तबादलों में राजनीतिक दखल कम होता नहीं दिख रहा है। राजनीतिक रसूखदार अपने रिश्तेदारों के तबादलों को लेकर सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं।
रोजाना हर विभाग में तबादलों के दर्जनों मामले आ रहे हैं, जिसमें सर्वाधिक शिक्षा, स्वास्थ्य, लोक निर्माण, सिंचाई आदि महकमों के कर्मचारियों के हैं। तबादलों पर रोक लगाने के बाद सरकार ने मंगलवार को तबादलों के लिए पात्र श्रेणियां घोषित कर विकल्प खुला रखा है।
पुरानी सरकार की तरह मुख्यमंत्री की संस्तुति अनिवार्य कर दी है, जिससे अब मुख्यमंत्री कार्यालय में तबादले करवाने वालों की बाढ़ आ गई है। भले ही सामान्य तबादलों पर रोक का एलान बरकरार है, लेकिन विशिष्ट मामलों की आड़ तबादलों का खेल रोकना आसान नहीं है।