क्रांति धरा से अब वैचारिक तौर पर बलूचिस्तान आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी। इसके लिए मेरठ, बागपत समेत आसपास के जिलों के कुछ गांवों में रह रहे बलूच समाज से जुड़े लोगों का सहारा लिया जाएगा। बागपत स्थित शहजाद राय शोध संस्थान में उपलब्ध दस्तावेजों से इन लोगों के बलूच संस्कृति से जुड़े होने की जानकारी मिली है। इसे देखते हुए कनाडा से आए एक प्रमुख बलूच नेता के बेटे ने इस सप्ताह इन गांवों का दौरा किया। इसके बाद वह भारतीय बलूचिस्तान मुक्ति मोर्चा का गठन कर बलूच आंदोलन को धार देने की तैयारी में जुट गए हैं।
शहजाद राय शोध संस्थान के मुताबिक मुगल काल में हिंदुस्तान आए बलूच संस्कृति के लोग यहीं के होकर रह गए। इसे लेकर संस्थान की तरफ से किए गए शोध में यह बात सामने भी आई, जिसमें पाया गया कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई गांवों में ऐसे लोग रह रहे हैं, जिनके पूर्वजों का संबंध बलूचिस्तान से रहा है। यह बात भी स्पष्ट हुई है कि इन लोगों के रीति-रिवाजों पर आज भी बलूच संस्कृति का असर है। सैकड़ों साल बाद भी उनके वैवाहिक संबंध अपने से जुड़े लोगों में ही हैं। इसे देखते हुए बलूचिस्तान मुक्ति आंदोलन के प्रमुख नेता पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी जड़ों से जुड़े लोगों को तलाश रहे हैं। वह पश्चिम यूपी के कई गांवों में लोगों से संपर्क कर हिंदुस्तान में अपने पक्ष में माहौल बनाने की तैयारी में कर रहे हैं।
तीन जिलों में गए मजदक बलूच पिछले दिनों जब बलूचिस्तान आंदोलन तेज हुआ, तो शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन और बलूच नेता नायला खान के बीच संस्थान के पास उपलब्ध दस्तावेजों के संबंध में फोन पर बातचीत हुई। नायला ने इसे अहम मानते हुए अपने बेटे को हिंदुस्तान भेजने की बात कही। इसके बाद उनके बेटे मजदक बलूच इसी सप्ताह कनाडा से भारत आए और मेरठ एवं बागपत का दौरा किया।
बागपत स्थित शोध संस्थान पहुंचकर बलूच संस्कृति से जुड़े गांवों के बारे में जानकारी हासिल की। इसके बाद उन्होंने बागपत के बिलोचपुरा, तिलपनी, और मेरठ के मदारपुरा, खेड़ी, कुलंजन समेत मुजफ्फरनगर के बाड़ा बस्ती गांवों के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। मजदक ने यहां बताया कि पश्चिम यूपी को केंद्र में रखते हुए बलूच संस्कृति से जुड़े और गांवों को जोड़ा जाएगा। इसी क्रम में भारतीय बलूचिस्तान मुक्ति मोर्चा गठित कर वैचारिक तौर पर बलूच आंदोलन को मजबूत किया जाएगा। काफी मेल खाती है संस्कृति संस्थान के निदेशक अमित राय जैन का कहना है कि बलूचिस्तान की संस्कृति सीधे तौर पर भारत से मिलती-जुलती है। प्राचीन समय में बलूचिस्तान हिंदुस्तान का अहम हिस्सा रहा है। बलूचिस्तान भारत की एक अति विशिष्ट संस्कृति से जुड़ा हिस्सा है। बलूच नेताओं ने हमसे जानकारी मांगी है और हमनेउन्हें हरसंभव मदद का भरोसा दिया है।
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- फोटो : अमर उजाला
आजाद बलूचिस्तान आंदोलन की चिंगारी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांवों में वर्षों से सुलग रही है। मेरठ और आसपास के जिलों में रह रहे बलूच मूल के लोगों का कहना है कि अब जैसा माहौल बन रहा है, उससे पाकिस्तान से आजादी मिलने की उम्मीद जगी है। गांवों में वैचारिक तौर पर बलूच आंदोलन को सहयोग देने के लिए बैठकों का दौर चल रहा है। जल्द ही दिल्ली में एकत्र होकर प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है।
बागपत के गांव बिलौचपुरा को तो लोग मिनी बलूचिस्तान ही कहते हैं। खास बात यह है कि 50 के दशक में ही मेरठ के गांव कुलंजन में अंजुमन-बलूचान-ए-हिंद के नाम से संगठन बनाया गया था।
मेरठ के सरधना स्थित कुलंजन गांव को बलूच मूल के लोगों के लिए ही जाना जाता है। केंद्र सरकार द्वारा बलूचिस्तान की आजादी के मुद्दे को उठाने के बाद गांव के लोगों ने अपने स्तर से भी तैयारी शुरू कर दी है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव के अब्दुल मामूद खान ने 50 के दशक में ही बलूचों की मदद के लिए अंजुमन-बलूचान-ए-हिंद संगठन की स्थापना की थी।
बलूचिस्तान के नेता नवाब अकबर बुगती की मौत के बाद यहां के लोगों में रोष फैला था। वर्ष 2006 में कुलंजन और बलूच मूल के दूसरे गांवों के लोगों ने मिलकर दिल्ली में आंदोलन की योजना बनाई थी। अब्दुल माबूद खान के बेटे मुजाहिद खान का कहना है कि उन्होंने इस लड़ाई को निर्णायक दौर में ले जाने का फैसला लिया है। जल्द ही दूसरे गांवों के लोगों के साथ मिलकर दिल्ली में बड़ा प्रदर्शन किया जाएगा, ताकि केंद्र सरकार इस मसले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठा सके।
बड़े आंदोलन की रणनीति
बागपत के गांव बिलौचपुरा निवासी इरफान पठान का कहना है, उनके पूर्वजों ने देश की आजादी के लिए खूब संघर्ष किया और कुर्बानियां दीं। हम लोग वतनपरस्त हैं। हमारा दिल हिंदुस्तान के लिए धड़कता है। हम चाहते हैं कि हमारे मूल से जुड़े बलूचिस्तान के लोगों को न्याय मिलना चाहिए। इरफान ने बताया कि ईद के बाद वह मेरठ, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर और बिजनौर में अपने लोगों से मुलाकात करेंगे। इसके बाद बड़े आंदोलन की रणनीति पर काम किया जाएगा।
15वीं शताब्दी में आए थे बलूच
वेस्ट यूपी के करीब 30 गांवों में बलूच मूल के लोग रहते हैं। इसमें बागपत, मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर और मुजफ्फरनगर के गांव शामिल हैं। गांव के लोगों का कहना है कि बलूचिस्तान से उनके पूर्वज 15वीं शताब्दी में गुजरात के रास्ते हिंदुस्तान आए थे। इनमें तीन प्रमुख कबीलों लाशारी, जत्तोई और रिहंद से जुड़े लोग यहां आकर बस गए थे। कुलंजन गांव के लोगों ने पांच साल पहले बलूचिस्तान से जुड़े कुछ दस्तावेज भी अपने गांव मंगवाए थे। इन दस्तावेजों के सहारे बलूचों के साथ अपने संबंधों को और पुख्ता दर्शाने की कोशिशें की गई हैं।