भाजपा ने प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं दिया है। भाजपा की सत्ता में वापसी पर डॉ. रमन सिंह फिर कमान संभालेंगे या फिर चुनाव मैदान में उतरे केंद्रीय मंत्री और सांसदों में से किसी को मौका मिलेगा। कांग्रेस ने भी कयासों को जन्म दे दिया है कि सत्ता में बने रहने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ही रहेंगे या नया चेहरा सामने आएगा। बालोद में शिक्षाकर्मी संतोष शर्मा मिले। वह भाजपा को जिता रहे हैं। वजह बताई, कांग्रेस पार्टी का बदला रुख।
‘भूपेश है तो भरोसा है’ की जगह ‘भरोसे की सरकार’ और ‘भरोसा बरकरार, फिर से कांग्रेस सरकार’ जैसे नारे आने लगे हैं। ऐसी पार्टी के साथ क्यों जाएं, जिसमें सब अनिश्चित नजर आए। संतोष का मानना है कि भाजपा आई तो बागडोर डॉ. रमन के हाथ ही होगी। किसान मानचंद पटेल कहते हैं, जिसने हमारा कर्ज माफ किया, हमें तो उसे देखना ही होगा। बघेल मुख्यमंत्री हैं तो वहीं बनेंगे।
कार्यकर्ताओं के कयास
पार्टी में भी नारा बदलने पर अटकलें भी लगाई जा रही हैं। कुछ कार्यकर्ता मानते हैं कि भितरघात को थामने के लिए यह बदलाव किया गया है। इससे सरकार विरोधी लहर भी थमेगी। वहीं सरगुजा में उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव, बिलासपुर में विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत और बस्तर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज के समर्थक अपने-अपने नेताओं के लिए उम्मीद भरी नजरों से देखने लगे हैं।
नाराजगी कम करने की कोशिश पर बढ़ सकता है भितरघात
वरिष्ठ पत्रकार शशांक शर्मा बताते हैं, कांग्रेस वादे पूरा करने में कामयाब नहीं रही। किसानों की कर्जमाफी को छोड़कर अन्य किसी वर्ग को कोई फायदा नहीं मिला। शराबबंदी का वादा किया पर अब ज्यादा बिकने लगी है। गांवों से शहरी क्षेत्रों का जुड़ाव अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुआ। जनता की नाराजगी को कम करने के लिए नए वादों के साथ पार्टी ने चुनावी नारा भी बदला है। हालांकि, इस बदलाव से खींचतान बढ़ सकती है।
भाजपा में आधा दर्जन चेहरे
भाजपा ने केंद्रीय राज्यमंत्री रेणुका सिंह सहित चार सांसदों को उतारा है। इनमें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष व सांसद अरुण साव, सांसद विजय बघेल, सांसद गोमती साय हैं। पूर्व सीएम रमन सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री विष्णुदेव साय भी मैदान में हैं। इन्हीं छह चेहरों में जनता मुख्यमंत्री पद के दावेदार की तलाश कर रही है।