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Womens Day: 'अपराजिता' बोलीं- कहने से नहीं करने से होगा, सोच बदलोगे तो सम्मान दे पाओगे

Sun, 08 Mar 2020 10:53 AM IST
खुशबू गोयल अमर उजाला नेटवर्क, चंडीगढ़
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संवाद कार्यक्रम में हिस्सा लेने आईं महिलाएं - फोटो : अमर उजाला
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मैं उसे सम्मान देता हूं, कदम से कदम मिलाकर साथ लेकर चलता हूं। वो और मैं समान हैं, कहने से नहीं होगा कुछ। पुरुषों की सोच बदलेगी, तो महिलाओं को सम्मान मिलेगा। महिलाओं पर पुरुषों से ज्यादा इस सृष्टि को चलाने की जिम्मेदारी है। वे सृष्टि की सृजनकर्ता हैं। पुरुष का अस्तितव उन्हीं से हैं। पुरुषों का नाम उन्हीं से है। उसे सशक्त होने की जरूरत नहीं, बल्कि पुरुषों को संस्कारी बनाने की आवश्यकता है। शनिवार को अमर उजाला कार्यालय में 'अपराजिता' मुहिम के तहत आयोजित संवाद में महिला शक्ति ने कुछ ऐसे ही विचार रखे और महिलाओं को समानता का अधिकार विषय पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। पढ़िए किसने क्या कहा...
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तुलना की बजाय समानता की बात हो
गवर्नमेंट पीजी कॉलेज सेक्टर- 1 पंचकूला के अंग्रेजी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर हरप्रीत कौर बवेजा ने कहा कि अगर बात महिला समानता की हो तो उसे सीधे तौर पर शिक्षा से जोड़ना होगा। इसमें किताबी ज्ञान से ज्यादा संस्कार और सोशल मीडिया अहम रोल अदा करता है। महिला-पुरुष में तुलना की बजाय समानता की बात होनी चाहिए।

कुछ विशेष दिन ही महिलाओं की चर्चा क्यों?
डीएवी कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. कवलप्रीत ने कहा कि मदर्स-डे, डॉटर्स-डे और वूमेन्स-डे पर ही महिला सम्मान की बात क्यों की जाती है? महिलाओं केलिए साल के 365 दिन सम्मान और स्वाभिमान से जुड़े हैं। जब पुरुष कभी असमानता का दुखड़ा नहीं रोता तो महिलाएं क्यों इस पर बात करें।
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घर से ही शुरू होती है नारीत्व की बात

डेंटिस्ट डॉ. अमिका तुल्ला ने कहा कि नारीत्व की बात घर से ही शुरू होती है। इसकेलिए सड़क पर उतरकर या बड़े-बड़े मंच पर घोषणाएं करने से कुछ नहीं होने वाला। याद रखना होगा कि महिला हिंसा केसबसे ज्यादा मामले घर के ही होते हैं। इसलिए सबसे ज्यादा सम्मान की अपेक्षा भी वहीं से की जाएगी।

सुधर रही है महिलाओं की दशा
एसडी कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. मनी परती ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पिछले 45 सालों से विश्वभर में मनाया जा रहा है। इन सालों में महिलाओं की दशा व दिशा में काफी सकारात्मक बदलाव हुए हैं। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, उज्जवला योजना, नारी सशक्तिकरण इसका अच्छा उदाहरण हैं,  लेकिन इसी तुलना में महिला अपराध की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।

स्त्री-पुरुष में तुलना करना ठीक नहीं
मोटिवेशनल स्पीकर भावना गर्ग ने कहा कि स्त्री-पुरुष में कभी तुलना नहीं की जा सकती। जब प्रकृति ने उन दोनों को अलग-अलग बनाया है तो हम उसे एक समान कैसे कर सकते हैं। जहां तक समानता की बात है तो उसकेलिए गुस्सा और दु:ख बयां करने से बेहतर होगा हम अपने गुणों  के आधार पर खुद को बेहतर साबित करें।

महिला की सूझबूझ ही समस्या का बेहतर निराकरण
नारी जागृति मंच की अध्यक्ष नीना तिवारी ने कहा कि असमानता हमारे घर से ही शुरू होती है। इसलिए समझदारी दिखाते हुए अपने घर की बात को अपने बीच ही समझबूझ से सुलझाना चाहिए। जिस घर की महिला प्रताड़ित होती है उस घर के संस्कार और परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगते देर नहीं लगता। इसलिए बेटी और बहू दोनों को सम्मान और समान अधिकारी दीजिए।

गांव में अब भी नारी की स्थिति ठीक नहीं

डीएवी कॉलेज की छात्रा अदिति सुमन ने कहा कि नारी की बेहतर स्थिति दिखाने के लिए हम शहरों का उदाहरण पेश करने लगते हैं, लेकिन गांव में नारी की स्थिति अभी भी ठीक नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा का स्तर वहां अब भी बहुत नीचे हैं। अगर नारी सशक्तीकरण और नारी सम्मान की बात सच होती तो निर्भया केस में इतना समय न लगता।

बाल विवाह के अभिशाप अभी भी कायम
समाजसेवी खुशबू जैन ने कहा कि बाल विवाह जैसा अभिशाप अब भी देश में खत्म नहीं हुआ है। तमाम प्रयास और कानून बनाये जाने के बावजूद बेटियों से उनका बचपन छीना जा रहा है। कानून बनाने केसाथ ही उसकी सख्ती से पालन किया जाना चाहिये।

आंकड़े बयां करते हैं, नारी किसी से कम नहीं
डीएवी कॉलेज की छात्रा हिमानी शर्मा ने कहा कि आंकड़े बयां कर रहे हैं कि नारी अब किसी स्तर पर कमजोर नही है। जल, थल, नभ सभी स्थानों पर नारी ने परचम लहराया है। अब बात समानता की नहीं आगे निकलने की होनी चाहिए। हर बात के लिए सरकार को दोष देने के बजाय अपने स्तर पर बेहतरी का प्रयास करना होगा, तभी नारी की समझदारी दुनिया को नजर आयेगी।

समानता और तुलना दो अलग-अलग विषय
शिक्षक डॉ. अमृता भुल्लर ने कहा कि जब स्त्री-पुरुष की संरचना ही समान नहीं है तो उसमें समानता और तुलना की परिकल्पना कैसे की जा सकती है। हमें समानता केविषय पर चर्चा करने की बजाय आगे निकलने की बात पर मंथन करना होगा। हम केवल कही सुनी बातों को लेकर बैठ जाते हैं, जबकि हमें बेहतर कर मिसाल कायम करने पर सोचना चाहिए।

पति के सहयोग से ही आगे बढ़ती है नारी

समाजसेवी सोनिया मनचंदा पति-पत्नी एक-दूसरे के सहयोग के बिना सफल नहीं हो सकते। एक सफल पुरुष के पीछे एक नारी के होने की बात तो सभी कहते हैं। लेकिन हमें यह कहने में गुरेज क्यों होता है कि एक नारी अपने पति के सहयोग से ही घर से बाहर निकलती है।

बेटे-बेटी को समान दर्जा देना चाहिए
शिक्षक जैसमीन कौर ने कहा कि जो सम्मान देता है, वह भी सम्मान का हकदार है। लेकिन बात विरोध की ज्यादा होती है। नतीजन नकारात्मक परिणाम हावी होने लगते हैं। हमें अपने घर में बेटे-बेटी को समान दर्जा देना होगा। ठीक वैसे ही बेटा और बहू को भी समान नजरिये से देखा जाना चाहिए।

बच्चे का बेहतर दिशा देती है मां
गृहिणी पूनम ने कहा कि महिला-पुरुष के बीच असमानता की भावना घर से ही शुरू होती है। फिर बदलाव की बयार भी घर से ही बहानी होगी। ऐसे में एक मां की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। एक मां ही बच्चे को बचपन से सही और गलत के बारे में बता सकती है। कहते भी हैं कि जो ज्ञान बचपन में मिलता है उसे पूरी उम्र याद रखा जाता है।

महिलाएं खुद को किसी से कम न समझें
इवेंट ऑर्गेनाइजर प्रीति अरोड़ा ने कहा कि महिलाओं को खुद को किसी से कम नहीं समझना चाहिए। महिलाएं सम्मान में लिए किसी विशेष दिन की मोहताज नहीं। उनका तो हर दिन सम्मान व स्वाभिमान का दिन है। महिलाएं हर क्षेत्र में पुरूषों से ज्यादा काम करती हैं। महिलाओं को हर रोज खुद के लिए समय निकालने की जरूरत हैं।

भारतीय संस्कृति को पुन: अपनाने की जरूरत

मनोनीत पार्षद शिप्रा बंसल ने कहा कि महिला समाज की आर्किटेक्ट है। हर कार्य में महिलाएं अपना योगदान देती हैं। बस जरूरत है महिलाएं खुद इस चीज को स्वीकार करें। समाज को दिशा देने के लिए हमें भारतीय संस्कृति को पुन: अपनाने की जरूरत है। क्यों पुरातन संस्कृति महिलाओं को उनकी ताकत बताती है।

महिलाएं खुद के लिए समय निकालें
एमसीएम कॉलेज की प्रोफेसर डॉ. गीता मेहरा ने कहा कि महिलाएं शुरू से ही सशक्त होती हैं। वो दो घर की जिम्मेदारी संभालती है, लेकिन इन सब के बीच वह खुद को भूल जाती है। महिलाओं को खुद के लिए समय निकालने की जरूरत हैं। वे अपने स्वास्थ्य और खानपान को प्राथमिकता दें।

महिलाओं का शोषण बंद हो
डीएवी कॉलेज की छात्रा प्रकृति ने कहा कि समाज में हर लिंग को हमें समानता देनी चाहिए। जब महिला शोषण बंद होगा तो महिला रिजर्वेशन की भी जरूरत ही नहीं रहेगी। जितनी ज्यादा महिलाएं बाहर काम करने के लिए आगे आएंगी, उतना ही महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस करेंगी। क्यों कि आज महिलाएं कहीं भी अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं।

केवल शादी के लिए लड़कियों को पढ़ाना ठीक नहीं
डीएवी कॉलेज की छात्रा मुस्कान ने कहा कि अभी लोग अपनी बेटियों को इसलिए पढ़ाते हैं ताकि उनके सर्टिफिकेट देखकर अच्छे घर में शादी हो सके। यह सोच बदलनी होगी। वहीं पढ़ी-लिखी महिलाओं की शादी में दहेज के खिलाफ आवाज उठाना होगा। महिलाएं को सशक्त बनाने के लिए पढ़ाया जाए।

हर इंसान एक-दूसरे का साथ दें

डीएवी कॉलेज की छात्रा वंशिका ने कहा कि समाज में समानता लाने के लिए जरूरी है हर इंसान एक-दूसरे का साथ दे। अगर ऐसा होगा, तब हर महिला व पुरुष में खुद ही समानता भाव पैदा हो जाएगा। उसके लिए अलग से कानून बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। बस इसके लिए जागरूकता जरूरी है।

महिलाएं खुद को समाज में आगे लाएं
डीएवी कॉलेज की छात्रा शगुन ने कहा कि महिलाएं हर क्षेत्र में अच्छा काम कर रही हैं। इसके बावजूद वो खुद को कहीं ना कहीं कमजोर मानती हैं। महिलाओं को खुद को समाज में आगे लाने की जरूरत हैं। इसकेसाथ ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए कानूनों को सख्ती से लागू करने की जरूरत है।

समाज के हर वर्ग को समानता मिले
डीएवी कॉलेज की छात्रा अनिशा शर्मा ने कहा कि समाज ने सिर्फ उच्च वर्ग और शिक्षित वर्ग को ही सम्मान दिया जाता है। अन्य वर्ग का हर क्षेत्र में किसी ना किसी रूप में शोषण हो रहा है। हमें समाज के हर वर्ग में महिला और पुरुषों को समानता के आधार पर सम्मान देना होगा। तब नारी साशक्तिकरण के नारे की जरूरत नहीं होगी।

सकारात्मक शब्दों का हो ज्यादा इस्तेमाल
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में वकील सगीना वालयात ने कहा कि समाज में हर जेंडर के लिए बातचीत और मीडिया में सकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल होना चाहिए। शब्दों का इंसान के दिमाग पर काफी गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा समाज, प्रशासन व लोगों को एक साथ मिलकर कानून का पालन करना होगा। इसको लागू करने के लिए एकजुट होना होगा। 
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घर में खुशियां लेकर आएं

मॉडल शालू गुप्ता ने कहा कि महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने के लिए समाज के हर लिंग में आपसी समझ को बढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ ही घर में खुशी का माहौल बनाए रखना चाहिए जिससे इंसान में नकारात्मक भाव कम से कम पैदा हों। सकारात्मक ऊर्जा दोहरी शक्ति के साथ काम करने के लिए प्रेरित करती है।

जेंडर के आधार पर भेदभाव खत्म हो
गृहिणी गीतू जैन ने कहा कि समाज में जेंडर और सामाजिक आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करने की जरूरत है। यह नकारात्मक और हिंसात्मक प्रवृति को बढ़ावा देता है। समाज में समानता आएगी तो अपराधों में भी कमी आएगी। साथ ही महिलाओं को एक बेहर माहौल मिल सकेगा।

महिलाएं खुद का सम्मान करना सीखें
आईटी कंपनी में मैनेजर कविता अरोड़ा ने कहा कि यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमंते तत्र देवता अर्थात जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं। इसके साथ ही महिलाओं को खुद भी अपना सम्मान करना सीखना होगा। महिलाओं खुद को किसी से कम नहीं समझे, खुद में बदलाव लेकर आएं।
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