पिताजी की उम्र 18-20 वर्ष के बीच रही होगी। एक दिन वह खेतों में काम कर रहे थे। इसी बीच किसी ने बताया कि तुम्हारी लंबाई काफी अच्छी है। छह फुट के हो फौज में क्यों नहीं चले जाते। फिर क्या था पिताजी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में भर्ती होकर सिंगापुर चले गए। परिवार को इसका पता भी नहीं चला। वह जंगलों में रहे, नदियों का पानी पिया। जंगल में जो कुछ मिला उसे ही खाकर जिंदा रहे। फिर एक दिन अंग्रेजी सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। देश की आजादी के बाद उन्हें रिहाई मिली। जब पिताजी गांव पहुंचे तो लोग पहचान नहीं सके। ये बातें स्वतंत्रता सेनानी चंद्र सिंह के बेटे आनंद सिंह ने बताईं।
सेक्टर-43 निवासी डीएस नाहर कहते हैं कि मेरे ससुर हरभजन सिंह हांगकांग में बिजनेस करते थे। जब जापानियों ने वहां कब्जा किया तो वह नेताजी की आजाद हिंद फौज से जुड़ गए। नेताजी के फौज में भर्ती होकर उन्होंने बर्मा में लड़ाई लड़ी। इसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें बंगाल के नीलगंज के शिविर में रखा गया। नवंबर 1945 में उन्हें वहां से छोड़ा गया। उन्हें विदेश नहीं भेजा जा सकता था इसलिए वे अमृतसर में अपनी बहन के पास आ गए। उस समय फोन नहीं था। लौटने पर परिवार के लोग भी नहीं पहचान सके थे। नाहर ने बताया कि वे देशभक्ति की कई कहानियां सुनाया करते थे। उनके बेटे नहीं थे, दो बेटियां ही थीं। देश की आजादी के बाद उन्होंने अपना कई काम करना चाहा लेकिन काम नहीं चला, उसके बाद उन्होंने कोल इंडिया में ज्वाइन किया। उनका सारा परिवार हांगकांग में रहता था। अच्छा बिजनेस था लेकिन जंग में बहुत नुकसान हुआ। साल 2008 में उनकी मृत्यु हुई थी।
सेक्टर-43 निवासी एसआर शर्मा के बेटे अनिल शर्मा ने बताया कि देश की आजादी की लड़ाई में पिताजी ने खूब संघर्ष किया। पिता एसआर शर्मा लाहौर के गारडॉन कॉलेज में पढ़ते थे। वर्ष 1937 में वह स्टूडेंट्स यूनियन में शामिल हो गए। वह वर्ष 1939 में महासचिव बन गए थे और देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। कक्षाओं का बहिष्कार किया। इस्लामिया हाईस्कूल में राष्ट्रीय झंडा फहराया गया। इसके लिए 18 नवंबर 1939 को उन्हें डेढ़ वर्ष की सजा सुनाई गई। इसके साथ 250 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। उसके बाद इंडियन नेशनल कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। अक्तूबर 1942 में दोबारा गिरफ्तार हुए। वे एक वर्ष तक भूमिगत रहे। उन्होंने बताया कि हाल यह था कि वे अपने भाई की शादी में भी घर पर नहीं आए। देश की आजादी के बाद गांव आए। उसके बाद उनकी शादी हुई। बाद में वह पंजाब विश्वविद्यालय में सहायक लाइब्रेरियन रहे। वह लाहौर, शिमला और चंडीगढ़ में पीयू में काम किया। वर्ष 2003 में उनकी मृत्यु हो गई। मुझे अपने पिता पर गर्व है। पिताजी सोशलिस्ट विचारधारा के थे।
स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी एसोसिएशन के अध्यक्ष केके शारदा ने बताया कि महात्मा गांधी के एक भाषण ने पिता एमके शारदा के मन में इतना गहरा प्रभाव डाला कि उनका जीवन बदल गया। असर यह हुआ कि उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़ दी और उनके आश्रम में चले गए। आश्रम में उन्होंने अपने हाथों से मैला उठाया। गांधीजी ने कहा कि तुम अब पास हो गए हो। जाकर देश की सेवा करो। पिताजी ने आजीवन चरखा से काते सूत से तैयार कपड़ा पहना। सुबह चार से पांच बजे तक चरखा कताई करते थे। यह उनका नियम था। गांधीजी और बिनोवा भावे को वह बहुत पसंद करते थे। सुबह उठकर दोनों को नमन कर अपनी दिनचर्या शुरू करते थे। सारी उम्र सादगी से रहे। वर्ष 2009 में निधन के बाद तिरंगा में लिपटकर उनकी अंतिम यात्रा पूरी हुई। भारत छोड़ो आंदोलन के समय में वह सितंबर 1942 से नवंबर 1943 तक जालंधर, सरगोधा ओर मानीवाला जेल में रहे।
पिता से दादी ने कहा था- बेटा मर जाना मगर अंग्रेजों माफी मांगकर जेल से बाहर मत आना : अश्वनी मेहरा
सेक्टर-43 निवासी स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय वेद प्रकाश मेहरा के बेटे अश्वनी मेहरा कहते हैं कि ‘सरफरोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर...’ यह नज्म पढ़ने पर पिताजी को जेल हुई थी। तब उनकी उम्र 18 वर्ष थी। वह तीन साल जेल में रहे। यह नज्म पिताजी के लिए जैसे मंत्र बन गई थी। वह मरते दम तक इस नज्म को हर रोज दिन में कई बार गुनगुनाते थे।