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आपदा में अवसर, कोरोना काल में वर्चुअल इलाज बना ऑस्टियो ऑर्थराइटिस के मरीजों के लिए वरदान

Sat, 26 Dec 2020 01:13 PM IST
निवेदिता वर्मा वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
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ऑस्टियोआर्थराइटिस के मरीजों का वर्चुअल इलाज संभव - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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कोरोना महामारी ने अस्पतालों की ओपीडी को बेहद प्रभावित किया। लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इस आपदा में भी अवसर ढूंढ लिया।  पीजीआई के हड्डी रोग विभाग, सामुदायिक स्वास्थ्य और फिजिकल रिहैबिलिटेशन एंड मेडिसिन के विशेषज्ञों ने घुटने के ऑस्टियो ऑर्थराइटिस के मरीजों के लिए वर्चुअल माध्यम की परिकल्पना को साकार कर एक सफल शोध किया। इसे 'ई नी स्कूल' नाम दिया। शोध में यह बात सामने आई कि वर्चुअल तरीके से जिन मरीजों को इलाज दिया गया, उन्हें अच्छा लाभ मिला। इस शोध को स्प्रिंग नेचर डॉट कॉम में प्रकाशित किया गया।
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इन्होंने किया शोध
पीजीआई हड्डी रोग विभाग के प्रमुख डॉ. एमएस ढिल्लों, सामुदायिक स्वास्थ्य की डॉ. मीनाक्षी शर्मा और डॉ. अमरदीप सिंह फिजिकल रिहैबिलिटेशन एंड मेडिसिन के वाईबिक आद्या, अर्चित चलाना और संदीप नेगी ने मिलकर यह शोध किया है।

लॉकडाउन के बाद शुरू हुई प्रक्रिया
कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए 24 मार्च को अस्पतालों की ओपीडी बंद कर दी गई। इस दौरान पीजीआई के हड्डी रोग विभाग में ऑस्टियो ऑर्थराइटिस के मरीजों की ओपीडी भी 2 हफ्ते के लिए बंद रही। इन मरीजों की परेशानी को दूर करने के लिए उनके व्हाट्सएप नंबर पर उनका फॉलोअप किया गया। इससे वर्चुअल स्कूल बन गया। इसके बेहतर परिणाम को देखते हुए विशेषज्ञों ने इस पर शोध करने का निर्णय लिया, ताकि वर्चुअल क्लीनिक की भविष्य की संभावनाओं का आकलन किया जा सके।
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11 सेशन के बाद आया सकारात्मक परिणाम
इस दौरान शोध में शामिल 25 में से 18 मरीजों को एक साथ एक वर्ग में शामिल करा कर वर्चुअल तरीके से उनका इलाज किया गया। इसमें उन मरीजों को अलग-अलग समय में कुल 11 सत्र दिए गए। इसमें पहला ट्रायल, चार फिजियोथैरेपी, एक योग, दो मेडिटेशन, एक प्रश्नोत्तरी ,1 न्यूट्रीशन और एक फीडबैक का सत्र था। प्रत्येक सत्र 30 से 45 मिनट के बीच का था।
 
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ऐसे पूरा किया गया शोध

चयन की प्रक्रिया में 18 मरीजों के मिलने के बाद उनका अलग वर्ग बनाया गया। उन्हें प्रत्येक सत्र के बारे में कुछ दिन पहले से ही मैसेज से तय समय पर वर्ग में शामिल होने की जानकारियां दी गईं। मरीजों की सुविधा के लिए अंग्रेजी, हिंदी और पंजाबी भाषा का प्रयोग किया गया। शोध में जिन तकनीकों का प्रयोग किया गया, उससे जुड़े प्रत्येक सेशन में उनके विशेषज्ञ के दिशा-निर्देश में मरीजों का फॉलोअप लिया गया। इसके बाद उन मरीजों का एक साथ अनुभव भी साझा किया गया। मरीजों को मिले आराम की गणना उनके लॉग बुक में नोट किए गए दर्द के अलग-अलग स्तर और विशेषज्ञों द्वारा तय किए गए स्केल से की गई। इसमें विशेषज्ञों द्वारा तय किए गए 6 प्वाइंट के स्केल में मरीजों का स्कोर 5.8 रहा। विशेषज्ञों के अनुसार यह बेहतर परिणाम रहा। क्योंकि उन मरीजों को यूजर फ्रेंडली और वर्चुअल क्लीनिक के माध्यम से किए गए इलाज से बहुत आराम मिला।

75 में से 25 मिले योग्य
विशेषज्ञों ने शोध के लिए 7 अप्रैल 2020 से पहले पंजीकृत घुटने के ऑर्थराइटिस के 75 मरीजों को चिह्नित किया। उनमें से 25 मरीज ही ऐसे मिले, जो इस शोध में शामिल होने के योग्य थे। उन 25 मरीजों से इस शोध में शामिल होने की रजामंदी ली गई, लेकिन 18 ही विशेषज्ञ द्वारा बनाए गए वर्ग में शामिल हो सके। शोध में शामिल मरीजों को शुरुआती दौर में अलग-अलग तरीके से वर्चुअल माध्यम से जरिए इलाज की तकनीक से जोड़ा गया। उनका डाटा और जानकारियां गोपनीय रखी गईं। व्हाट्सएप के जरिए संदेश देकर जूम और यूट्यूब पर उन्हें संपर्क में लाया गया।

परिवार ने किया सहयोग
शोध में शामिल मरीजों को डॉक्टरों ने वर्चुअल तरीके से खानपान के साथ ही मेडिटेशन, वजन काउंसलिंग, योग, हंसने की थैरेपी के बारे में जानकारियां दीं और उसे करवाया। इस दौरान बताए गए फिजियोथैरेपी को कराने में उनके मरीजों के परिजनों का भी सहयोग लिया गया। क्योंकि इसमें खड़े होने के साथ ही लेट कर करने वाले कई तरह के व्यायाम शामिल थे। परिवार के बीच रहकर उनके सहयोग से किए व्यायाम का मरीजों पर तेजी से सकारात्मक परिणाम देखने को मिला।
 
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