पीजीआई में कैंसर पेशेंट के लिए आने वाली प्राइवेट ग्रांट में गड़बड़ियों की जांच प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) की दखल के बाद विजिलेंस ने शुरू कर दी है। पीजीआई मेडिकल टेक्नोलॉजिस्ट्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी अश्विनी मुंजाल ने पीएम, पंजाब के सीएम बादल और सेंट्रल विजिलेंस कमीशन का पत्र लिखकर गड़बड़ियों की सीबीआई जांच की मांग की थी।
धानमंत्री कार्यालय से पत्र केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग को ट्रांसफर किया गया और वहां से पीजीआई को पत्र भेजा गया। जांच के बाद पता चलेगा कि ग्रांट से खरीदी जाने वाली दवाएं पीजीआई के बाहर स्थित केमिस्ट शॉप से खरीदी गई मेडिसिन से क्यों महंगी थी।
ग्रांट देरी से आई तो खुली पोल
मुंजाल ने पीएमओ व सीवीओ को भेजी शिकायत में बताया कि पंजाब की रहने वाली इंदिरा कुमारी को कैंसर की बीमारी थी। उनकी कीमोथैरेपी होनी थी, लेकिन इंदिरा कुमारी के पास रुपये नहीं थे। उन्होंने इलाज के लिए पंजाब सरकार से आर्थिक मदद मांगी। पंजाब सरकार कैंसर मरीजों के इलाज के लिए ग्रांट जारी करती है।
दिरा की कीमोथैरेपी जल्द से जल्द होनी थी, लेकिन उसकी ग्रांट में देरी हो गई। इसलिए उसने 3 सितंबर को 2015 को अपने रुपयों से चंडीगढ़ सेक्टर-11 स्थित एक केमिस्ट शॉप से 13 हजार 200 रुपये की दवाएं खरीद लीं। एक अक्तूबर को दोबारा इंदिरा ने अपने रुपयों से कीमोथैरेपी के लिए दवाएं खरीदीं।
ग्रांट सेल ने पांच गुना महंगी खरीदी दवाएं
पीजीआई के डॉक्टरों ने इंदिरा कुमारी की छह कीमोथैरेपी के लिए 80 हजार रुपये का एस्टीमेट बनाया था। दो कीमोथैरेपी के बाद पंजाब सरकार की ओर से इंदिरा कुमारी के लिए 80 हजार रुपये की ग्रांट पीजीआई के प्राइवेट ग्रांट सेल में आ गई। उसके बाद इंदिरा की 29 अक्तूबर, 27 नवंबर और 28 दिसंबर को कीमोथैरेपी हुई। लेकिन इस बार कीमोथैरेपी का सामान पीजीआई की प्राइवेट ग्रांट सेल से खरीदा।
जब छठी बार कीमोथैरेपी होनी थी तो इंदिरा व उसके परिजन प्राइवेट ग्रांट सेल पहुंचे तो वहां बैठे कर्मचारियों ने बताया कि उसके खाते में सिर्फ 3,181 रुपये बचे हैं। जब इंदिरा ने पीजीआई के बाहर से दवाएं खरीदीं तो उसका खर्च 27 हजार 216 रुपये आया। जबकि प्राइवेट ग्रांट सेल से खरीदीं गईं दवाओं का खर्च 77 हजार रुपये आया। यानी मरीजों को प्राइवेट ग्रांट सेल की ओर से दी जा रहीं दवाएं बाहर की केमिस्ट शॉप के मुकाबले पांच गुना महंगी पड़ रही हैं।
प्राइवेट ग्रांट सेल खरीदता है दवाएं
पंजाब के कैंसर पेशेंट को पंजाब सरकार आर्थिक मदद करती है। पीजीआई के डाक्टर पेशेंट का जो एस्टिमेट बनाएंगे, उस के आधार पर सरकार ग्रांट जारी करती है। ग्रांट आने पर प्राइवेट ग्रांट सेल के कर्मचारी दवाएं मरीज को दे देते हैं। दरअसल ग्रांट सेल कोटेशन मंगवाकर कुछ सस्ते रेट पर मरीजों के लिए दवाएं और सामान मंगवाती है। लेकिन ये दवाएं मरीजों को बाहर की दुकानों से भी महंगी पड़ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हो सकता है कि ग्रांट सेल 25 प्रतिशत डिस्काउंट पर दवाएं दे रहा हो, जबकि बाहर मरीजों को 50 प्रतिशत डिस्काउंट पर दवाएं मिल रही हों। पीजीआई एमटीए जनरल सेक्रेटरी अश्विनी मुंजाल का आरोप है कि प्राइवेट ग्रांट सेल की जांच होनी चाहिए। महंगी दवाएं देकर मरीजों को लूटा जा रहा है।