पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि यदि सशस्त्र बलों की सेवा के दौरान कोई स्टेज-1 के उच्च रक्तचाप की बीमारी का शिकार होता है, तो वह विकलांगता पेंशन के लिए पात्र माना जाएगा। हाईकोर्ट ने आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ भारत सरकार की अपील को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया है।
धीरज कुमार ने एएफटी में याचिका दाखिल करते हुए बताया था कि उन्होंने 2002 में सैन्य सेवा में प्रवेश किया था। सेवा आरंभ करते हुए वह चिकित्सकीय रूप से स्वस्थ था। सेवा अवधि के दौरान के दौरान वह स्टेज-1 उच्च रक्तचाप (1-10) की विकलांगता से ग्रस्त हो गया। 31 अक्टूबर 2019 को उसे सेवा मुक्त कर दिया गया। सेवा मुक्त होने के दौरान मेडिकल बोर्ड ने याची की विकलांगता 30 प्रतिशत मानी थी। याची ने विकलांगता पेंशन के लिए दावा किया लेकिन इसे केंद्र सरकार ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि उसे हुई विकलांगता न तो सैन्य सेवा के कारण थी और न ही उससे बढ़ी थी। एएफटी ने अधिकारी के हक में फैसला सुनाते हुए उसे पेंशन के लिए पात्र माना था। इसी आदेश को केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
केंद्र ने इस फैसले के खिलाफ अपील दाखिल करते हुए दलील दी कि मेडिकल बोर्ड की राय के अनुसार विकलांगता न तो सैन्य सेवा के कारण थी और न ही उससे बढ़ी थी। केंद्र ने कहा कि मेडिकल बोर्ड की राय का सम्मान होना चाहिए। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने माना कि सशस्त्र बलों में अपनी सेवा के दौरान स्टेज-1 उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्ति विकलांगता पेंशन का हकदार होगा। इस मामले में सैन्य अधिकारी लगभग 17 वर्षों तक सशस्त्र बलों में सेवा की है।
सेवा में प्रवेश के समय ऐसी कोई बीमारी या विकलांगता नहीं थी। इसलिए सैन्य अधिकारी की विकलांगता/बीमारी सैन्य सेवा के कारण है और उससे बढ़ गई है। सेना रिकार्ड पर कोई भी ऐसा दस्तावेज लाने में विफल रही जो साबित करे कि अधिकारी वंशानुगत रूप से ऐसी बीमारी से पीड़ित है। हाईकोर्ट ने कहा कि सशस्त्र बल न्यायाधिकरण का आदेश उचित है और अधिकारी विकलांगता पेंशन का हकदार है।