चंडीगढ़। दो-चार दिन पहले ही मैं अपनी अम्मा की स्क्रेप बुक देख रही थी। उसमें मुझे मेरे पिता फैज साहिब के बारे में लिखा अखबार का दो कॉलम का आर्टिकल दिखा। उसमें पत्रकार और अखबार का नाम नहीं था। खबर में पत्रकार ने फैज साहिब की शायरी की धज्जियां उड़ाई हुई थीं कि इन्हें लिखना नहीं आता। उस पढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि वक्त तय करता है किसका काम जीता है। फैज की बड़ी बेटी प्रो. सलीमा हाशमी ने ऑनलाइन कार्यक्रम काव्यांजलि में पाकिस्तान में वर्तमान में कला और संस्कृति पर चर्चा के दौरान ये किस्सा सुनाया।
प्रो. सलीमा पेशे से पेंटर हैं। उन्होंने पाकिस्तान में वर्तमान में कला के संदर्भ में बताया कि वहां भी फन (कला) का संरक्षण नहीं है। इसके बावजूद पिछले लगभग 15 वर्षों में कला के क्षेत्र में बहुत काम हुआ है चाहे वह साउंड-वीडियो से जुड़ा हो, स्कल्पचर हो या पेंटिंग। युवा बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। हालांकि उन्हें थोड़ी मदद कम है। एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि कभी-कभी सहरा में भी फूल खिलते हैं। इन कठिन हालातों में भी हर हफ्ते मुझे ऑनलाइन प्लेटफार्म फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिए कला से जुड़ी दिलचस्प चीजें देखने को मिलती हैं। युवा वर्ग की रचनात्मकता, सृजनशीलता और चीजों को लेकर उनकी समझ काबिलेतारीफ है। कलाकार के लिए तो ये ही है ‘ कुछ इश्क किया कुछ काम किया।’
नहीं रिसा शहर लाहौर दियां
ऑनलाइन कार्यक्रम में वक्ताओं ने शहर लाहौर घूमने की इच्छा जताई तो प्रो. सलीमा ने कहा पंजाबी में बोला जाता है- नहीं रिसा शहर लाहौर दियां। वे अभी लाहौर में ही रह रही हैं। उन्होंने कहा मेरी दुआ है जल्दी हम संकट के दौर से निकलें। मैं सरहद पार से आपके देश की सलामती का पैगाम भेजती हूं। उम्मीद है जल्दी रास्ते खुलेंगे तो शहर लाहौर आप सब की राह तक रहा होगा।
चंडीगढ़ की आती है बहुत ज्यादा याद
लगभग 15 वर्ष पहले प्रो. सलीमा ने किसी कार्यक्रम के सिलसिले में हरियाणा राजभवन में शिरकत की थी। उन्होंने बताया कि उन्हें और उनके बेटे को चंडीगढ़ बहुत ही ज्यादा पसंद है। चर्चा के दौरान कहा कि चंडीगढ़ की बहुत याद आ रही है। हालात बदलने पर जल्द ही चंडीगढ़ का रुख करेंगे। उन्होंने फैज की नज्म जश्न के दिन सुनाते हुए दुआ की कि जल्द ही कोरोना को हम मात देंगे और जश्न के दिन आएंगे, मुस्कुराने के दिन आएंगे। हम आपको अहसास दिलाते हैं कि इस संकट में हम आपके साथ है।