वहीं, चंडीगढ़ में पांच किसान संगठन, पंजाब में पानी के संकट और चंडीगढ़ पर पंजाब के अधिकार के मुद्दे उठाएंगे। हालांकि ये सभी मुद्दे पुराने हैं और इन पर किसान संगठनों में एकता बनी थी लेकिन अब किसान संगठन अलग-अलग धड़े में बंटते दिखाई दे रहे हैं। राज्य के बड़े किसान संगठनों में मतभेद के बाद पंजाब के किसान चिंता में हैं। किसान संगठन खुद मानते हैं कि संगठनों के बीच दरार का फायदा सीधे तौर पर सरकारों को होने वाला है।
सरवन सिंह पंधेर का कहना है कि दिल्ली के खिलाफ भी युद्ध आसान नहीं है लेकिन सभी का मकसद एक ही है। पंजाब की धरती सभी किसानों को एक बार फिर इकट्ठा करेगी। हर संगठन का एजेंडा अलग हो सकता है लेकिन खेती-किसानी से जुड़े मुद्दे साझा हैं। पिछली बार दिल्ली में आंदोलन के समय किसी संगठन के पास केंद्र से बात करने का तजुर्बा नहीं था लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। किसानों की मांगों को जोरदार ढंग से केंद्र के सामने रखा जाएगा।
इधर, बलबीर सिंह राजेवाल का कहना है कि चंडीगढ़ में मोर्चे का फैसला पांच संगठनों का है फिर भी अगर कोई किसान संगठन समर्थन करता है तो उनका स्वागत है। भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) के नेता जोगिंदर सिंह उगराहां का कहना है कि उनके संगठन की तरफ से अभी किसी तरह के आंदोलन की घोषणा नहीं की गई है और न ही उनका संगठन दिल्ली में या चंडीगढ़ में शुरू किए जा रहे आंदोलनों में हिस्सा लेगा।