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Chandigarh News: ईयू-भारत एफटीए से खुला बड़ा बाजार, बांग्लादेश समेत कई देशों को पछाड़ने का मौका

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-जीरो ड्यूटी का रास्ता साफ, 263 अरब डॉलर के ईयू टेक्सटाइल बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने का सुनहरा अवसर
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-2030 तक भारत बन सकता है ईयू का बड़ा सप्लायर, टेक्सटाइल उद्योग में आएगी नई तेजी-
राजीव शर्मा
लुधियाना। अमेरिका के साथ चल रहे टैरिफ विवाद के बीच भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) भारतीय टेक्सटाइल और अपैरल उद्योग के लिए गेम चेंजर साबित होने जा रहा है। इस समझौते के लागू होते ही भारतीय टेक्सटाइल एवं रेडीमेड गारमेंट्स ईयू बाजार में शून्य शुल्क (जीरो ड्यूटी) पर पहुंच सकेंगे। इससे चीन, बांग्लादेश, वियतनाम और तुर्किये जैसे बड़े निर्यातक देशों के साथ सीधी प्रतिस्पर्धा संभव होगी।
वर्तमान में 263 अरब डॉलर के ईयू टेक्सटाइल और अपैरल बाजार में भारत की हिस्सेदारी बेहद सीमित है। भारत अभी केवल सात अरब डॉलर का निर्यात करता है, जबकि बांग्लादेश अकेले करीब 30 अरब डॉलर का माल ईयू को भेज रहा है। एफटीए के बाद यह समीकरण बदलने की पूरी संभावना है। निर्यातकों का मानना है कि वर्ष 2030 तक भारत इस अंतर को काफी हद तक पाट सकता है।
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अब तक क्यों पिछड़ा
भारत?

ईयू बाजार में अब तक भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति कमजोर रही है। इसका प्रमुख कारण आयात शुल्क था। एफटीए से पहले भारतीय टेक्सटाइल उत्पादों पर 9 से 12 प्रतिशत तक ड्यूटी लगती थी, जबकि बांग्लादेश को लीस्ट डेवलप्ड नेशन (एलडीएन) का दर्जा मिलने के कारण चालू वित्त वर्ष तक शुल्क में पूरी छूट मिली हुई है। इसी तरह वियतनाम और तुर्किये भी ईयू को ड्यूटी फ्री निर्यात करते रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए कीमतों के मोर्चे पर मुकाबला करना मुश्किल था।
बदलता निर्यात समीकरण
-भारत का ईयू को मौजूदा निर्यात: 7 अरब डॉलर
-बांग्लादेश का ईयू को निर्यात: 30 अरब डॉलर
-ईयू का कुल टेक्सटाइल बाजार: 263 अरब डॉलर
-2030 तक भारत का संभावित निर्यात: 30–40 अरब डॉलर

2030 तक बांग्लादेश को पीछे छोड़ने की संभावना
विशेषज्ञों के अनुसार बांग्लादेश को मिलने वाली जीरो ड्यूटी की सुविधा चालू वित्त वर्ष के बाद समाप्त हो सकती है। इसके बाद उस पर 12 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगने की संभावना है। इसके उलट भारत एफटीए के तहत शून्य शुल्क के दायरे में आ जाएगा। इसके चलते अगले तीन से चार वर्षों में भारत का ईयू निर्यात सात अरब डॉलर से बढ़कर 30 से 40 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसके अलावा बांग्लादेश में राजनीतिक और औद्योगिक अस्थिरता के कारण कई विदेशी खरीदार वहां से दूरी बना रहे हैं। बांग्लादेश की एक और कमजोरी यह है कि वहां यार्न का अभाव है और उसे भारत व चीन से आयात करना पड़ता है, जबकि भारत के पास फाइबर से लेकर फैब्रिक और परिधान तक पूरी वैल्यू चेन मौजूद है।
रोजगार और औद्योगिक क्लस्टरों को मिलेगा बूस्ट
टेक्सटाइल निर्यात में तेजी का सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि एक अरब डॉलर के अतिरिक्त निर्यात से एक से डेढ़ लाख नए रोजगार सृजित होते हैं। इससे देश में बेरोजगारी कम करने में भी मदद मिलेगी। इस समझौते से देश के प्रमुख टेक्सटाइल क्लस्टरों को भी मजबूती मिलेगी। लुधियाना का वूलन गारमेंट और यार्न क्लस्टर, तिरुपुर का निटवियर हब, सूरत का मैनमेड फाइबर उद्योग और पानीपत का होम टेक्सटाइल सेक्टर नई संभावनाओं से प्रफुल्लित होगा।
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उद्योग जगत की राय
निटवियर अपैरल एक्सपोर्टर्स ऑर्गनाइजेशन के अध्यक्ष हरीश दुआ ने एफटीए को भारत सरकार का मास्टर स्ट्रोक बताया। उनका कहना है कि इससे अमेरिकी टैरिफ की अनिश्चितता का असर कम होगा और भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को स्थायी गति मिलेगी। उद्योगपति अब विस्तार योजनाओं और ईयू के खरीदारों से संपर्क बढ़ाने में जुट गए हैं। निटवियर अपैरल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ लुधियाना (कमल) के प्रधान सुदर्शन जैन के अनुसार, नई संभावनाओं को भुनाने के लिए एसोसिएशन स्तर पर रणनीति तैयार की जा रही है। विदेशी बायर्स से सीधा संवाद बढ़ाकर निर्यात को नई ऊंचाई दी जाएगी।
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