ये शिक्षक नहीं, गुरु हैं ज्ञान के। इन्होंने नैतिक मूल्य, संस्कार और संस्कृति को शिक्षा में पिरोया है। शहर में कुछ ऐसे ही गुरु हैं, जिन्होंने शिक्षा के माध्यम से अपने शिष्यों की मानो जिंदगी बदल दी, तो वहीं कुछ युवा भी ऐसे गुरु बन रहे हैं, जो अब शिक्षा के प्रसार में लगे हुए हैं, ताकि वे युवाओं को नशे से बचाकर एक बेहतर जिंदगी दे सकें। शहर के कुछ गुरु-शिष्यों ने शिक्षक बनने का सफर मैदान में पढ़ाने से शुरू किया और कुछ ने कालोनी के बच्चों को उनके मां-बाप से लड़कर पढ़ाना शुरू किया।
यूनिवर्सिटी में जब किरण बेदी मेरी कक्षा में आईं, तो वह काफी होशियार थीं। हर चीज में अव्वल रहती थी। शिक्षक दिवस के मौके पर किरण से मिलकर मेरा जोश दोगुना हो गया है। आज वह पुडुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर हैं, लेकिन मेरे लिए यह आज भी वहीं किरण है, जो मेरी क्लास में पढ़ती थी। मैंने इसको शिक्षा नहीं संस्कार दिए। शिक्षा का मतलब सिर्फ पढ़ाना नहीं, उनको जिंदगी के हर सफर के प्रति मजबूत बनाना है।
- प्रोफेसर प्रेम राजपूत पंजाब यूनिवर्सिटी की फाउंडर डायरेक्टर कम चेयरपर्सन
सेक्टर 15 के छोटे से मैदान से की शुरूआत
टीचर्स डे 2018
शारदा सर्वहितकारी मॉडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल सेक्टर-40 डी के निदेशक बीएस कंवर का कहना है कि 1984 में सेक्टर-15 के एक छोटे से मैदान में कुछ बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था। पहले पढ़ाने के लिए न तो मेरे पास पैसे थे आर न ही कोई साधन, लेकिन मैंने हार नहीं मानीं। मैं रोजाना सेक्टर-15 के छोटे से मैदान में आसपास के बच्चों को पढ़ाता था।
धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ी और मैंने कुछ स्टाफ रखा, लेकिन उनको सैलरी देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। मैंने बच्चों की 50 रुपये की फीस से उन्हें पैसे दिए, लेकिन आर्थिक तंगी के बावजूद मैंने यह सफर कभी रोका नहीं। इसी की बदौलत सर्वहितकारी शारदा पब्लिक स्कूल सेक्टर-40 की नींव रखी गई। यहां के खाली मैदान पर हमने फंड से स्कूल बनाया।
आज मेरे स्टूडेंट आईपीएस, आर्मी ऑफिसर, जज, वकील से लेकर उच्च प्रशासनिक पद पर कार्यरत है। मेरा सिर्फ एक ही शिक्षा का मंत्र रहा है कि शिक्षा के साथ नैतिक मूल्य, संस्कार, संस्कृति और सम्मान दो। तभी हम शिक्षा के साथ बच्चों को संस्कार देंगे।
युवाओं को नशे से दूर रखा मेरा लक्ष्य
टीचर्स डे 2018
20 साल के छात्र मोहिंदर मिश्रा का कहना है कि मैं एक एनजीओ के साथ जुड़ना चाहता था। हालांकि उन्होंने मुझे मौका भी दिया, लेकिन वहां फंड को लेकर हेरफेर होती थी, जिसे देख कर मुझे काफी बुरा लगा और मैने एनजीओ को छोड़ दिया। मैं काफी समय से समाज के गरीब युवाओं के लिए कुछ करना चाहता था। इसलिए मैने बडहेड़ी कालोनी से शुरूआत की। लोगों से घर-घर जाकर मिला। बच्चों को अपने साथ जोड़ा और उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
आज मेरी टीम में 50 युवा शामिल हैं, जो शहर के स्लम एरिया के बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। वह न केवल शिक्षा बल्कि उनको नैतिक मूल्यों एवं कैरियर के लिए भी मोटिवेट कर रहे हैं। हम गरीब बच्चों के लिए किताबें एवं अन्य चीजें एकत्रित करते हैं। मैंने अपने दोस्तों एवं परिवार की मदद से 2016 में अपनी एनजीओ वे (वट अबाउट यूथ ) को ओपन किया।
हमारा मकसद शिक्षा के जरिए युवाओं को नशे से दूर करना है। आज इस ग्रुप में 50 युवा शामिल हैं, जो शहर के स्लम एरिया एवं कालोनी के बच्चों को नशे से दूर रखकर शिक्षा की ओर ले जा रहे हैं।
बिना किसी फीस के रोज करती है सौ से अधिक बच्चों को शिक्षित
टीचर्स डे 2018
जो शिक्षक हमारी जिंदगी बदल दे वह टीचर न केवल हमारे मार्गदर्शक बन जाते हैं, बल्कि हम उन्हें अपना आदर्श भी मानने लगते हैं, क्योंकि बिना किसी स्वार्थ के कोई शिक्षक गरीब बच्चों का जीवन संवारें तो वह किसी का आदर्श क्यों ना हो। उसका साक्ष्य यह है कि स्लम एरिया, पूअर क्लास व भीख मांगना छोड़ चुके बच्चे भी अब बिना रुके वैदिक मंत्र, महा मृत्युंजय मंत्र जैसे कठिन मंत्र का सही उच्चारण करते हैं। ऐसे ही अनाथ व सड़कों के किनारे भीख मांगने वाले बच्चों की जिंदगी संवार रही है। पंचकूला सेक्टर-20 निवासी अंजू अहुजा। जो पेशे से गृहणी है।
अमर उजाला से बातचीत करते हुए अंजू अहुजा ने बताया कि वह पिछले दो सालों से पंचकूला के बच्चों को शिक्षित कर रही है। उनके पति नरेंद्र अहूजा विवेक प्रदेश में स्टेट कंट्रोलर आफिसर के पद पर कार्यरत है। जो पहले गुरुग्राम में कार्यरत थे। अंजू के अनुसार पहले वे गुरुग्राम में आर्य समाज मंदिर में गरीब बच्चों को पढ़ाती थी। उनके पति का 2011 में पंचकूला में तबादला हो गया। जिस कारण उन्हें शिफ्ट करना पड़ा। जिसके बाद उन्होंने दो साल पहले पंचकूला में फिर से बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।
ऐसे आया विचार
टीचर्स डे 2018
अंजू ने बताया कि उनके दो बच्चे हैं जिन्हें उन्होंने 8वीं तक पढ़ाया। घर पर बैठी रहती तो बोर हो जाती थी फिर सोचा कि क्यों न उन बच्चों को शिक्षित करूं जो स्कूल नहीं जा पाते। इस विषय में उनके पति ने सहयोग किया जो आर्य समाज मंदिर कमेटी के सदस्य थे उन्होंने बच्चों को पढ़ाने के लिए मंदिर में ही जगह का बंदोबस्त कर दिया। अब सेक्टर-20 स्थित काली माता मंदिर में ‘प्रयास एक कोशिश’ संस्था के अंदर 100 बच्चों व सेक्टर-21 गुरुकुल स्कूल में आर्य समाज संस्था के साथ मिलकर ‘अहसास’ स्कूल चला रहे हैं। जहां 150 के करीब बच्चे आते हैं। नरेंद्र अहुजा इन दोनों स्कूल में मैनेजमेंट संभालते हैं।
छह महीने में होता हैं मेडिकल टेस्ट
अंजू अहुजा के पति नरेंद्र अहुजा विवेक ने बताया कि वह अपनी पत्नी के साथ मिलकर हर छह माह में बच्चों का मेडिकल टेस्ट करवाते हैं। ताकि उनका उचित रूप से शारीरिक विकास हो सके। अंजू के अनुसार सेक्टर-14 कॉलेज मधु, ममता, हरदीप से ग्रेजुएट स्टूडेंट्स आकर शाम चार से छह बजे तक बच्चों को पढ़ाती है। अंजू के अनुसार उन्होंने आर्किटेक्ट की पढ़ाई की है।
नैनी रही अंजू अहुजा की बेस्ट स्टूडेंट
फतेहपुर निवासी नैनी अभी सार्थक स्कूल में 12वीं की पढ़ाई कर रही है। अंजू के अनुसार वह उनकी फेवरेट स्टूडेंट रही है। नैनी के पापा दुकानदार व माता गृहणी है। नैनी ने बताया कि उन्हें यहां से बहुत स्पोर्ट मिला है। जो उन्हें स्कूल में समझ नहीं आता वह उसे मंदिर में जाकर अंजू अहुजा से पूछ लेती थी। नैनी का कहना है वह भी बड़ी होकर अंजू मैडम की तरह बनना चाहती है।
रंजना बनना चाहती डॉक्टर
हैप्पी टीचर्स डे
रंजना कुडी के गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ती थी जिन्होंने 5वीं कक्षा में ‘प्रयास एक कोशिश’ स्कूल में आना शुरू किया। रंजना का एडमिशन डीसी पब्लिक स्कूल सेक्टर-7 में हो चुका है। वह 7वीं में पढ़ती है। रंजना के पापा वर्कर है और माता आया। रंजना बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती है।
रिटायर होने के बाद भी दी निशुल्क शिक्षा
मुंशी राम दिल्ली में अध्यापक रह चुके हैं जो अभी रिटायर होने के बाद भी नि:शुल्क सेवा दे रहे हैं। मुंशी पिछले दो साल से बच्चों की पढ़ाई को शिक्षित कर रहे हैं। उनका मानना है कि बच्चों को शिक्षित करना उनका कर्तव्य है और उन्हें यह करके अच्छा लग रहा है। उनके अन्य सहयोगियों में संजीता, दिनेश, मधु, ममता, हरदीप के नाम शामिल है।
सरकारी स्कूल दे छुट्टी के बाद बच्चों को पढ़ाने की जगह
संस्था के प्रधान संदीप बी सिंघला ने अपील की है कि सरकारी स्कूल उन्हें छुट्टी के बाद अपने स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए जगह दे ताकि वह और भी बच्चों को शिक्षित कर सके। इसके लिए वह स्कूल परिसर का किराया, स्कूल के कमजोर बच्चों को पढाने के साथ-साथ मेंटेन्स चार्जेस देने को भी तैयार है।