अक्सर लोगों की ख्वाहिश होती है कि वे सुबह-सुबह पार्क में दौड़ लगाएं। लेकिन अगले दिन मैदान में दिखने के बजाए वे बिस्तर में ही लेटे मिलते हैं। दौड़ने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति और जुनून की जरूरत पड़ती है, जो बहुत कम लोगों में देखने को मिलती है। इसके उलट कुछ ऐसे भी हैं, जो सबके सामने मिसाल बने हैं। सिटी के कुछ ऐसे रनर हैं, जो रनिंग के लिए न तो मौसम देखते हैं और न ही देश की सीमाएं। जब से उन्होंने दौड़ना शुरू किया है, तब से उनके जिंदगी कई सारे सकारात्मक बदलाव आए हैं। एक नजर डालते हैं सिटी के धावकों पर।
पांच साल पहले शुरू की रनिंग, फिर नहीं रुके
आईटी कंपनी के डायरेक्टर मुनीश जौहर ने बताया कि पांच साल पहले जब पता चला कि लिवर में फैट बढ़ रहा है तो फिटनेस की ओर रुख किया। चाहता तो जिम ज्वाइन कर सकता था, लेकिन मुझे दौड़ से प्रेम है, इसलिए रनिंग शुरू की। साल 2017 में 100 डे रन का एक चैलेंज चल रहा था। उसे स्वीकार किया और लगातार 600 दिन दौड़ा। रोजाना से दो से तीन किमी। उसके बाद हाफ मैराथन (21 किमी), फुल मैराथन (50 किमी) और वर्ल्ड अल्ट्रा मैराथन (80 किमी से ज्यादा) में भी हिस्सा लिया। अब वे विदेश में होने वाली मैराथन में हिस्सा लेते हैं।
क्यों शुरू की : वजन कम करने के लिए।
हेल्थ पर असर : काम पर ज्यादा फोकस और सहनशीलता बढ़ गई है।
कितनी रनिंग : हफ्ते में चार से पांच बार। वीकेंड पर ज्यादा रनिंग।
वजन कम करने के लिए दौड़े, बना डाले रिकार्ड
मोहाली के मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले अमित कुमार का वजन लगातार बढ़ रहा था। ड्रिंक भी करते थे। जिंदगी में क्या चल रहा है, कुछ भी पता नहीं था। फिर एक दिन वॉक पर निकल गए। धीरे-धीरे रनिंग करने लगे। फिर ऐसी आदत पड़ी कि उन्होंने रनिंग में ही कई रिकार्ड बना डाले। उन्होंने लेह लद्दाख में होने वाली 222 किमी की मैराथन पूरी की।
इस दौड़ को जीतने वाले पहले भारतीय बने। इसके बाद वे 24 घंटे वर्ल्ड चैंपियन टीम में सेलेक्ट हो गए। उन्होंने बताया कि रनिंग के बाद उनकी जिंदगी में ऐसा बदलाव आया है कि अब वे बता सकते हैं कि अगले महीने उनके क्या-क्या प्लान हैं। अमित को देखते-देखते उनकी पत्नी भी हाफ मैराथन में हिस्सा लेने लगी हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत वॉक से करें। प्रकृति से लगाव बढ़ेगा और फिर रनिंग भी शुरू कर देंगे।
क्यों शुरू की : वजन कम करने के लिए।
हेल्थ पर असर : पूरी जिंदगी सेट हो गई। हर वक्त ऊर्जावान महसूस करता हूं। लाइफ अनुशासित हो गई।
कितनी रनिंग : रोजाना 8 से दस किमी।
मैराथन से मजबूत होती है विल पावर
पीजीआई के फार्माकोलॉजी डिपार्टमेंट के वैज्ञानिक डा. सुबोध कुमार यादव ने बताया कि जब वे स्कूल में पढ़ते थे तो 100 मीटर दौड़ के चैंपियन होते थे। नौकरी के दौरान उनकी रनिंग छूट गई। साल 2014 में उन्होंने दोबारा से मैराथन शुरू की। नोएडा की हाफ मैराथन के लिए उन्होंने तैयारी शुरू की और पहले ही प्रयास में सफल रहे।
तय समय से पहले उन्होंने मैराथन को कंप्लीट कर लिया। उसके बाद वे फुल मैराथन और अल्ट्रा मैराथन में हिस्सा लेने लगे। उन्होंने बताया कि छोटी दौड़ में तो स्टेमिना काम आता है, जबकि मैराथन में आपकी विल पावर। लंबी दौड़ में एक वक्त के दौरान शरीर साथ छोड़ने लगता है, लेकिन विल पावर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है और लक्ष्य को हासिल करते हैं। दौड़ कभी भी शुरू कर सकते हैं।
क्यों शुरू की : बचपन से ही शौक था।
हेल्थ पर असर : मानसिक रूप से मजबूत होते हैं। जिंदगी में भी अनुशासन आता है।
कितनी रनिंग : हफ्ते में 50-60 किमी की रनिंग। संडे को 21 किमी।
30 से ज्यादा देशों की मैराथन में हिस्सा ले चुके हैं
पेशे से चार्टड अकाउंटेंट और टेरिटोरियल आर्मी में कैप्टन योगेश गेरा ने बताया कि वे दस साल से रनिंग कर रहे हैं। 30 से ज्यादा देशों में होने वाली बड़ी मैराथन का हिस्सा रहे हैं। जब भी उन्हें मौका मिलता है तो वे रनिंग के लिए निकल पड़ते हैं। उन्होंने बताया कि रनिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे कोई भी कर सकता है।
मैंने कई लोगों को देखा है, जो कई गंभीर बीमारी से पीड़ित थे, जब से उन्होंने रनिंग शुरू की है, उनकी दवाई छूट गई है। उन्होंने कहा कि जब से उन्होंने दौड़ शुरू की है, तब से उनकी जिंदगी में कई अहम बदलाव आए हैं। पीजीआई में 60 फीसदी वे आते हैं, जो अपनी लाइफ स्टाइल खराब होने से बीमार होते हैं।
क्यों शुरू की: डाक्टर के पास नहीं जाना था।
हेल्थ पर असर: प्रोडक्टिविटी बढ़ती है। तनाव खत्म होता है और अच्छी नींद आती।
कितनी रनिंग: हफ्ते में 50-70 किमी की रनिंग।