मनीमाजरा। कलाग्राम के राष्ट्रीय शिल्प मेले में इस वर्ष जिस कला ने सबसे अधिक दर्शकों का ध्यान खींचा है, वह है दक्षिण भारत की प्राचीन और प्रसिद्ध तंजावुर पेंटिंग्स। भारतीय देवी-देवताओं की भव्य, अलंकारिक और भावपूर्ण छवियों से सजी यह कला अपने स्वर्णिम सौंदर्य और उत्कृष्ट हस्तकौशल के लिए जानी जाती है।
स्टाल पर मौजूद चेन्नई के वरिष्ठ चित्रकार लोगानाथन चेट्टियार ने इसकी परंपरा, तकनीक और आध्यात्मिकता को विस्तार से समझाया। उनके अनुसार तंजोर पेंटिंग “भक्ति, कौशल और सांस्कृतिक विरासत का अद्वितीय संगम” है, जिसकी पहचान विश्वभर में बनी हुई है। इसमें सोने की पतली पन्नी का उपयोग होता है, जिससे वर्षों तक चमक बरकरार रहती है
इनका निर्माण प्रायः मजबूत लकड़ी के तख्तों पर प्राकृतिक चिपकने वाले पदार्थों की सहायता से किया जाता है जिससे इनकी आयु दशकों से लेकर सदियों तक बनी रहती है। इनमें मुख्यतया कृष्ण, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश, शिव-पार्वती और मुरुगन जैसे देवताओं की छवियां प्रमुखता से उकेरी जाती हैं।