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SYL: सरकारें आती जाती रहीं, पर एसवाईएल सूखी ही रही... छह दशक से हर चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा

Mon, 25 Mar 2024 02:39 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

हरियाणा के गठन के बाद से ही एसवाईएल का विवाद शुरू हो गया था। समझौते के तहत ब्यास और रावी में बहने वाले 4.22 मिलियन एकड़ फीट(एमएएफ) पानी पंजाब को, 3.5 एमएएफ हरियाणा को और 8.6 एमएएफ राजस्थान को देना तय हुआ। इसके बाद हरियाणा में चौधरी देवीलाल ने नहर बनाने का कार्य शुरू करवाया। 
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विस्तार
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करीब छह दशक से पंजाब और हरियाणा के बीच चले आ रहे सतलुज यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) विवाद का अब तक हल नहीं निकल पाया है। हरियाणा में जितनी भी सरकारें बनी हैं, कोई भी पानी लाने में सफल नहीं हुईं। 
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यह अलग बात है कि राजनीतिक दलों ने एसवाईएल को हरियाणा की जीवनरेखा बता मतदाताओं से सहानुभूति वोट जरूर बटोरे। इससे वे सत्ता में भी आए। कई बार डबल इंजन सरकार भी बनीं, मगर जनता को नहरी पानी की एक बूंद भी नसीब नहीं हुई।

चुनाव के समय सियासी फसल काटने के लिए कांग्रेस व भाजपा एक दूसरे पर दोष मढ़ते रहे हैं। वे हरियाणा की जनता से एसवाईएल में पानी लाने का दावा करते हैं मगर पंजाब जाते ही उनके सुर बदल जाते हैं। वोट के खातिर राजनीतिक दल पंजाब व हरियाणा में अलग-अलग स्टैंड रखते है। जनता की अदालत के बाद यह मुद्दा देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 
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सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के पक्ष में दो बार फैसला सुनाया। केंद्र से मध्यस्थता करवा दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्री के बीच तीन बार बैठक करवाई, मगर पंजाब के अड़ियल रवैये की वजह से आज तक इसका समाधान नहीं निकल सका। हरियाणा को एसवाईएल पानी नहीं मिलने से दक्षिण हरियाणा के जिले पानी को तरस रहे हैं। लोग खेती छोड़ने तक को मजबूर हैं। 

हरियाणा सरकार के मुताबिक, समझौते के तहत यदि राज्य को पानी मिलता तो करीब 10.08 लाख एकड़ जमीन की सिंचाई हो सकती थी। यह जमीन करीब 42 लाख टन खाद्यान्न का उत्पादन करती। इस अनाज के नहीं होने से दक्षिण हरियाणा के किसानों को सालाना 19 हजार 500 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान पहुंच रहा है। नहरी पानी आवश्यकताओं की पूर्ति करता तो भूजल भी नीचे नहीं जाता।अब फिर से लोकसभा चुनाव आ गए हैं तो एसवाईएल का जिन बाहर आएगा और सभी राजनीतिक दल इसे मुद्दा बनाएंगे।

केंद्र और राज्य में सरकारें रहीं, फिर भी हल नहीं निकला
भाजपा और कांग्रेस की सरकारें केंद्र के साथ राज्यों में भी रहीं, लेकिन दोनों ही राजनीतिक दल इसका हल नहीं निकाल पाए। 1981 में हरियाणा पंजाब और राजस्थान की सरकारों ने पानी के समझौते को लेकर हस्ताक्षर किए थे। उस दौरान तीनों प्रदेशों और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। इसके बावजूद कांग्रेस इसका हल नहीं निकाल पाई। 2014 से लेकर 2024 तक केंद्र और हरियाणा में भाजपा की सरकारें रहीं। इस दौरान भी एसवाईएल में पानी नहीं पहुंचा। अब आम आदमी पार्टी के हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष डाॅ. सुशील गुप्ता कहते हैं कि केंद्र और राज्य में जब उनकी सरकार होगी तो एसवाईएल का हल जरूर निकालेंगे। पर पंजाब में उन्हीं की पार्टी के मुख्यमंत्री पानी देने से साफ मना कर चुके हैं।

क्या है एसवाईएल विवाद
हरियाणा के गठन के बाद से ही एसवाईएल का विवाद शुरू हो गया था। समझौते के तहत ब्यास और रावी में बहने वाले 4.22 मिलियन एकड़ फीट(एमएएफ) पानी पंजाब को, 3.5 एमएएफ हरियाणा को और 8.6 एमएएफ राजस्थान को देना तय हुआ। इसके बाद हरियाणा में चौधरी देवीलाल ने नहर बनाने का कार्य शुरू करवाया। 1980 में नहर खोदने का काम पूरा भी कर लिया गया। पंजाब ने नहर बनाने का कार्य 1982 में शुरू किया मगर शिरोमणि अकाली दल के विरोध की वजह से इसे रोक लिया गया। 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शिअद प्रमुख हरचंद सिंह लोंगोवाल के साथ समझौता कर पानी के बंटवारे को लेकर नया ट्रिब्यूनल स्थापित करने पर सहमति बनाई। इस समझौते के एक महीने बाद ही आतंकियों ने लोगोंवाल की हत्या कर दी। 1988 में मजत गांव के पास परियोजना पर काम कर रहे 30 मजदूरों की हत्या कर दी गई। 1990 में आतंकवादियों ने चीफ इंजीनियर एमएल सेखरी और अधीक्षण अभियंता अवतार सिंह औलख को भी मार डाला। 1996 में हरियाणा सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई।

रोपड़ से करनाल तक जानी है नहर...इस बजट में भी 100 करोड़ का प्रावधान
212 किलोमीटर लंबी एसवाईएल का 91 किलोमीटर हिस्सा हरियाणा में पड़ता है। पंजाब में यह रोपड़ के नंगल डैम से शुरू होती है। कीरतपुर साहिब से यह फतेहगढ़ साहिब और फिर मोहाली के रास्ते पटियाला के गांव कपूरी तक जाती है और वहां से आगे इसे अंबाला से करनाल के मुनक तक जाना है। हरियाणा ने अपने हिस्से का निर्माण तो कर लिया है। एसवाईएल के रखरखाव के लिए मनोहर सरकार ने 2024 के बजट में भी 100 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया है। मगर पंजाब ने अपने हिस्से की नहर का निर्माण नहीं किया है। यहां तक कुछ हिस्से में नहर का निर्माण करने के बाद उसे समतल कर दिया और जमीन भी किसानों को वापस कर दी गई।

पंजाब का दावा...हमारी नहरें, नाले, माइनर सब सूखे पड़े
पिछले दिनों पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने दावा किया कि उनके पास किसी भी राज्य को देने के लिए पानी नहीं है। पंजाब के 159 ब्लॉकों में से 117 (78 प्रतिशत) डार्क जोन में हैं। केंद्र नहरों के लिए एक भी रुपया नहीं देता। वे हमसे पानी मांगते रहते हैं, हम पानी कैसे दे सकते हैं, जबकि हमारी नहरें, नाले, माइनर सब सूखे हैं। हमें फंड दिया जाए ताकि हम इनमें पानी चला सकें। उनका कहना है कि पानी का आकलन करने वाला ट्रिब्यूनल 33 साल पुराना है। अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक हर 25 साल में पानी की उपलब्धता की समीक्षा की जानी चाहिए। उनका कहना है कि सतलुज के 12.24 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) में से 8.02 एमएएफ पंजाब के हिस्से में आता है और 4.33 एमएएफ हरियाणा को जाता है। वहीं पंजाब को यमुना से एक बूंद भी नहीं मिल रही है जबकि हरियाणा को यमुना से 4.65 एमएएफ मिल रहा है। इसी तरह पंजाब को शारदा से एक बूंद नहीं मिल रही है जबकि हरियाणा को 1.62 एमएएफ मिल रहा है।

मोदी नहीं दिलवा सके पानी... हम लेकर आएंगे : कांग्रेस
सुप्रीम कोर्ट हरियाणा के हक में फैसला दे चुका है। अब पीएम मोदी को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए था। मगर उन्होंने इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है। हरियाणा पानी के गंभीर संकट से गुजर रहा है। हमने पूर्व सीएम मनोहर लाल से भी विधानसभा के सत्र के दौरान कहा था कि सभी लोग प्रधानमंत्री से मिलते हैं और उनसे एसवाईएल पर पानी लाने की मांग करेंगे। मनोहर लाल ने दावा किया था कि वह पीएम से जल्द ही टाइम लेंगे। मगर आज तक उन्होंने टाइम नहीं लिया। केंद्र में हमारी सरकार आती है तो हम हरियाणा को एसवाईएल का पानी लेकर देंगे। साथ ही राजस्थान के समझौते को रद्द भी करवाएंगे। - रघुवीर कादियान, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व मंत्री और पूर्व स्पीकर।

हमने प्रयास किए, मामला कोर्ट में है : भाजपा
हरियाणा सरकार न्याय पर विश्वास रखती है। सुप्रीम कोर्ट में पूर्व सीएम मनोहर लाल के नेतृत्व में हमारी सरकार ने हरियाणा का मजबूत पक्ष रखा। अच्छी पैरवी की वजह से ही सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के हक में फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब को सहयोग करने को कहा, मगर पंजाब सरकार सहयोग नहीं कर रही। मामला कोर्ट में है। आगे देखते हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का क्या रुख होता है। एसवाईएल का मुद्दा हमारी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। इस साल के बजट में भी 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। - कंवरपाल गुर्जर, कृषि मंत्री, हरियाणा।
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