उस समय 540 मेगावॉट सामर्थ्य वाला गोइन्दवाल पावर प्लांट का एमओयू सहीबद्ध किया और दूसरे फैसले के अनुसार कोयला भी झारखंड के पछवाड़ा स्थित अपनी कोयले की खान से खरीदा जाएगा। उन्होंने कहा कि 2007 के बाद अकाली दल की सरकार ने 4000 मेगावॉट के समझौते सहीबद्ध कर लिए।
राज्य को दूसरी बड़ी मार कोयला अपनी खान की बजाय कोल इंडिया से खरीदने के फैसले से पड़ी। रंधावा ने कहा कि अकाली नेता बिजली समझौतों के पीछे यूपीए सरकार के दिशा-निर्देशों पर आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूपीए सरकार की तरफ से जारी दिशा-निर्देशों के अंतर्गत गुजरात की तरफ से बिजली नीति बनाई गई और अकाली सरकार ने गुजरात की नीति को ही अपनाया।
उन्होंने कहा कि गुजरात की नीति में धारा 9 और 11 के अंतर्गत राज्य को फायदा पहुंचाने वाली मदों को पंजाब ने निजी फायदों के लिए बाहर रख दिया। उन्होंने कहा कि धारा 9 के अनुसार बिजली खरीदने से मना किया जा सकता था लेकिन पंजाब ने यह मद शामिल नहीं की। इसी तरह धारा 11 ही खत्म कर दी गई जिसके अंतर्गत 100 प्रतिशत बिजली खरीदने की जिम्मेदारी पंजाब ने अपने ऊपर ले ली और न खरीदने की सूरत में फिक्सड चार्ज देने होंगे। उन्होंने कहा कि मार्च 2017 तक अकाली सरकार ने फिक्सड चार्ज के रूप में 6553 करोड़ रुपए पावर प्लांटों को दिए।
उन्होंने कहा कि 25 सालों के लिए हुए समझौतों के बदले 65 हजार करोड़ फिक्सड चार्ज देने होंगे जबकि पावर प्लांटों पर कुल 25 हजार करोड़ रुपए का निवेश हुआ है। रंधावा ने कहा कि पूर्व उप मुख्यमंत्री निजी पावर प्लांट से 2.80 रुपए प्रति यूनिट बिजली खरीदने की बात कर रहे हैं जबकि अकाली दल अपनी सरकार की प्राप्तियों में पंजाब के लोगों को 6.39 रुपए प्रति यूनिट देने की बात करती है।
उन्होने 3.60 रुपए प्रति यूनिट फर्क पर अकालियों को जवाब देने को कहा। रंधावा ने आगे कहा कि 2014 से सितंबर 2016 तक अकाली सरकार के समय बिजली की पूरी मांग के दौरान पंजाब ने बाहर से 13,822 करोड़ रुपए की बिजली खरीदी जोकि 3.34 रुपए से 3.41 रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से पड़ी। उन्होंने कहा कि अपने राज्य के निजी पावर प्लांटों से 5.18 रुपए से 6 रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली खरीदी गई। इस तरह सुखबीर बादल को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें निजी पावर प्लांट बनाने का क्या फायदा हुआ जबकि बाहर के राज्यों से सस्ती बिजली खरीदी जा रही थी।