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शख्सियत: सरहद पर देश की रक्षा करते खो दिया था पांव, आज स्काई डाइवर बनकर दुनिया में भर रहे जोश

Sun, 11 Dec 2022 09:20 AM IST
निवेदिता वर्मा नवदीप मिश्रा, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

48 वर्षीय डीपी सिंह ने कहते हैं कि 13 जुलाई 1999 को मैंने साथियों संग जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर में बनी एक पोस्ट को संभाला था। दो दिन बाद ही 15 जुलाई को अचानक गोलीबारी शुरू हो गई। हम कुछ समझ पाते तब तक दुश्मनों ने अचानक मोर्टार दाग दिए।
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मेजर डीपी सिंह। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सरहद पर दुश्मनों से लड़ते हुए मेजर डीपी सिंह ने अपना एक पैर गंवा दिया, पर हौसला नहीं। कभी हार नहीं मानने वाले जज्बे और हिम्मत की बदौलत वह फिर मैदान में उतरे और देश के पहले ब्लेड रनर का खिताब अपने नाम किया। यही नहीं सोलो स्काई डाइविंग करने वाले एशिया के पहले दिव्यांग भी बने। आज वह दुनिया भर के लोगों में जोश भर रहे हैं। उनके जीवन पर ‘ग्रीट द मेजर स्टोरी’ नाम से एक किताब भी लिखी गई है। 

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48 वर्षीय डीपी सिंह ने कहते हैं कि 13 जुलाई 1999 को मैंने साथियों संग जम्मू-कश्मीर के अखनूर सेक्टर में बनी एक पोस्ट को संभाला था। दो दिन बाद ही 15 जुलाई को अचानक गोलीबारी शुरू हो गई। हम कुछ समझ पाते तब तक दुश्मनों ने अचानक मोर्टार दाग दिए। एक मोर्टार मेरे पास आकर गिरा। मैं कुछ करता तब तक फट गया। धमाके साथ ही सबकुछ सुन्न हो गया। लहूलुहान हालत में मुझे सेना के अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने मुझे लगभग मृत घोषित कर दिया था लेकिन मेरी अंतरात्मा ने कहा अभी तेरे अंदर आग बाकी है। जब आंख खुली तो पता चला एक पैर कटेगा। यह एक बड़ा झटका था लेकिन इस चुनौती को मैंने स्वीकार किया और इस पर विजय प्राप्त कर अपने लिए नई राह तलाशी। उन्होंने बताया कि वर्ष 2011 में उन्होंने द चैलेंजिंग वंस नामक सामाजिक संस्था की शुरुआत की। इसमें देश भर से लगभग 2700 सदस्य हैं। यह सदस्य आज लोगों के अंदर साहस भरते हैं। 

परिस्थितियों से भागेंगे तो जीवन को अंधकार की ओर ले जाएंगे
मेजर डीपी सिंह कहते हैं कि परिस्थितियों की चुनौती को स्वीकार कर उन पर विजय पाना ही सफलता की पहली सीढ़ी है। एक किस्सा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि उनका बचपन दादा-दादी के साथ गुजरा। दादा जितने अनुशासित थे, दादी उससे भी ज्यादा सख्त थीं। मुझे दोनों का अनुशासन तानाशाही लगता था। वहीं, नाना-नानी के यहां इसके उलट बहुत प्यार मिलता था। ऐसे में एक दिन गुस्से में घर से पैदल ही नाना-नानी के घर भाग निकला। एक जानकार ने शहर की सीमा के पास देखा तो साइकिल पर बैठाकर बिना कुछ कहे घर के दरवाजे पर लाकर छोड़ दिया। तब मैं 12 वर्ष का था। मन में बस यही चल रहा था कि जहां से चला वहीं लौट आया इसलिए अब जो भी परिस्थिति हो खुद को बेहतर बनाऊंगा।
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आज समझ आता है कि आप परिस्थितियों से भागेंगे तो जीवन को अंधकार की ओर ले जाएंगे। मेजर डीपी सिंह ने बताया कि वह रुड़की में रहते थे। पिता की नौकरी लगी तो अटारी चले गए लेकिन जल्द ही पिता की नौकरी चली गई। घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई। पिता मानसिक रूप से परेशान रहने लगे। आठवीं पास मेरी मां ने मुझे दादा-दादी के पास रुड़की भेज दिया और जैसे-तैसे दसवीं पास कर एएनएम का कोर्स किया और निजी अस्पताल में काम करने लगीं। दादा-दादी के साथ पूरे अनुशासन में मुझे तराशा जा रहा था। घर से भागकर पैदल ही रास्ता तय करने का जज्बा मुझे आर्मी की तरफ ले गया।

लोगों ने तोड़ने के लिए खूब लालच दिया, लेकिन मेरा लक्ष्य स्पष्ट था
मेजर डीपी सिंह ने बताया कि आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और एनडीए में चयन नहीं हो पाया। मुझे आर्मी में अफसर बनना था। इसके लिए स्नातक तक जरूरी था। बैंक में क्लर्क की जगह निकली तो फॉर्म भर दिया। चयन हुआ तो नौकरी के साथ बीए भी कर ली। उसके बाद सभी को बताकर एसएसबी की परीक्षा के लिए निकल गया। अतिउत्साह में फेल हो गया। वापस लौटा तो लोगों ने कहा आर्मी छोड़ो इसी ओर ध्यान दो, अच्छा भविष्य है तुम्हारा लेकिन मन में लक्ष्य तय था। दोबारा एसएसबी की परीक्षा दी और पास की। इस दौरान बस भगवत गीता के शब्द कर्म करो फल की चिंता मत करो याद रहे।

मन पर काबू पा लिया तो सफलता आपके कदम चूमेगी
डीपी सिंह ने कहा कि घर में सख्ती के कारण कोई विकल्प नहीं होता था इसलिए मन मारकर जो तय हुआ है वही करना पड़ता था। गुरुद्वारे जाना अनिवार्य था। वहां पाठ चलता रहता था। इससे मेरी इतिहास की जानकारी मजबूत हुई। यहां से मेरे मन में बीज बोया गया कि लक्ष्य तय करना बहुत जरूरी है नहीं तो आप भटकते रहेंगे। जब मेरा पैर खराब हुआ तो मुझे दुख नहीं हुआ क्योंकि पाठ में सुना था कि गुरुओं ने तो अपना सर्वस्व न्योछावर किया था मैंने तो केवल पैर गंवाया है। यहां से मन पर काबू करना आया। अभाव की जिंदगी में भी जो प्रसन्न रहे, सच्चे मायने में वही सर्वगुण संपन्न है। जीवन में विकल्प मिलते हैं तो मन पर काबू नहीं पाया जा सकता है। गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि मन जीते, जग जीते।

42वें जन्मदिन पर लगाई 42 किमी की मैराथन दौड़
डीपी सिंह ने बताया कि वह 2007 में वह सेना से बाहर आ गए थे। 2009 में उन्होंने दौड़ना शुरू किया। 2011 में वह देश के पहले ब्लेड रनर बने। अपने 42वें जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए उन्होंने 42 किलोमीटर की फुल मैराथन में हिस्सा लिया। वे सांगला, लेह और कारगिल में हुई मैराथन में भी दौड़ चुके हैं। इसके अलावा चार बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, 2018 में भारत सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय प्रेरक व्यक्तित्व का सम्मान दिया है। अब तक वह 26 से ज्यादा हाफ मैराथन में भाग ले चुके हैं। पूरी तरह से दिव्यांग घोषित होने के बावजूद डीपी सिंह ने बोन मैरो दान का संकल्प लिया है। डीपी सिंह ने बताया कि चलने, दौड़ने और साइकिल चलाने के लिए अलग कृत्रिम पैर लगे हैं। इन्हें पहनने में ही 30 मिनट तक का समय लगता है।

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