मौत के करीब पहुंच चुकी 22 वर्षीय गर्भवती महिला को एसपीएस अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने बचा लिया। 8 माह की गर्भवती महिला के पेट में मरे हुए जुड़वां
बच्चे थे और उसका दिल सिर्फ 25 फीसदी ही काम कर रहा था। वह सांस भी सही ढंग से नहीं ले पा रही थी। जिस कारण उसे सिजेरियन के लिए भी जिंदा रख
पाना एक बड़ी चुनौती थी।
शहर के एक नर्सिंग होम से रेफर होकर एसपीएस अस्पताल पहुंची उक्त महिला लगभग मृतप्राय थी। उसके पेट में दोनों बच्चे तीन दिन पहले ही मर चुके थे। उसका
पीएच (पोटेंशियल हाइड्रोजन ) 6.9 था, जबकि 7 पीएच पर ब्रेन डेड मान लिया जाता है। नार्मल तौर पर यह कम से कम 7.35 पीएच होना चाहिए।
वह प्रेगनेंसी के दौरान होने वाली दुर्लभ बीमारी डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी से ग्रस्त थी। अल्ट्रासाउंड कराने पर पता चला कि उसके गर्भ में पल रहे दोनों बच्चे 3
दिन पहले ही मर चुके हैं। कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. रवनिंदर सिंह कूका ने उसका चेकअप किया तो ऐसा लगा कि उसे सीजेरियन के लिए जीवित रख पाना भी बड़ी चुनौती थी।
अस्पताल की गाइनोकोलॉजिस्ट डॉ. गुरसिमरन कौर ने चुनौती को स्वीकार करते हुए तुरंत सीजेरियन की तैयारी की। प्रोसीजर के दौरान एनासिथिस्ट डॉ. नरेश आनंद
लगातार उसकी कंडीशन पर निगरानी रख रहे थे। जब उसे सीजेरियन के बाद आईसीयू में शिफ्ट किया गया तो यहां डॉ. समता गोयल ने मरीज की कंडीशन पर
नजर रखी। कम समय में सीजेरियन करके और लगातार उसकी स्थिति पर नजर रखकर डॉक्टरों ने उसकी कंडीशन में रिकीवरी को तेज किया और महिला की जान
बच गई।
एसपीएस अस्पताल के सीओओ डॉ. अजय अंगरीश ने कहा कि डॉक्टरों की टीम ने इस चुनौतीपूर्ण केस को सफलतापूर्वक महिला की जान बचाकर सराहनीय कार्य
किया है। मरीज के परिजनों ने भी अस्पताल का धन्यवाद दिया है। डॉ. गुरसिमरन ने बताया कि यह बीमारी प्रेगनेंट महिलाओं में बहुत दुर्लभ होती है। इसमें महिला
का हार्ट फेल होने लगता है और उसे बचाने के चांस 50 फीसदी ही होते हैं। क्योंकि इसमें महिला का ब्रेन डेड हो जाता है।